भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

लिंगमात्रं समुत्पन्नं क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं महत् ॥१५ संकल्पोऽध्यवसायश्च तस्य वृत्तिद्वयं स्मृतम् । महासृष्टिं च कुरुते वीतमानः सिसृक्षया ॥१६ धर्मादीनि च भूतानि लोवतत्वार्थहेतवः । मनो महात्मनि ब्रह्म दुर्बुद्धिख्यातिरीश्वरात् ॥१७ प्रज्ञासंधिश्च सर्वस्थं संख्यायतनरश्मिभिः । मनुते सर्वभूतानां तस्माच्चेष्टफलो विभुः ॥१८ भोक्ता त्राता विभक्तात्मा वर्त्तंनं मन उच्यते । तत्वानां संग्रहे यस्मान्महांश्च परिमाणतः ॥१९ शेषेभ्यो गुणतत्वेभ्यो महानिव तनुः स्मृतः । विभक्तिमानं मनुते विभागं मन्यतेऽपि वा ॥२० पुरुषो भोगसंबंधात्तेन चासौ संति स्मृतः । वृहत्त्वाद्वृंहणत्वाच्च भावानांमखिलाश्रयात् ॥२१

सत्र से वह महान् एक जानने के योग्य है। और एक ही कारण कहा गया है क्षेत्रज्ञ से अधिष्ठित महत् केवल लिङ्ग ही समुत्पन्न हुआ था ।१५। उसकी छै: प्रकार की वृत्ति बतायी गयी है—एक तो सङ्कल्प और दूसरी वृत्ति अध्यवसाय है । सृजन करने की इच्छा से वीतमान वह इस महती सृष्टि को किया करता है ।१६। और धर्म आदि भूत लोकतत्वार्थ के हेतु हैं । महान् आत्मा में मन ही ब्रह्म है और ईश्वर से इसकी दुर्बुद्धि यह ख्याति है ।१७। संख्यायत रश्मियों से सब भूतों की प्रज्ञा सन्धि सर्वस्व मानता है । इस कारण से विभु चेष्टा के वाला होता है ।१८। भोक्ता (भोगने वाला) परित्राण करने वाला-विभक्त आत्मा वाला बरतने वाला जो है वही मन कहा जाता है । जिसमें तत्वों के संग्रह में है और परिणाम से महान् है ।१९। शेष जो गुणों के तत्व हैं उनके महान की ही भाँति तनु कहा गया है । विभक्ति स युक्त को मानता है अथवा विभाग को मानता है ।२०। यह पुरुष उसके द्वारा अर्थात् शरीर के द्वारा भोगों का सम्बन्ध होने से सत् में कहा गया है । वृहत् होने से और वृंहणत्व होने से और भावों का पूर्ण आश्रय होने से पैदा होता है ।२१।