भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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सर्ग वर्णन ] [ ४१

यस्माद्बृ ंहयत भावान् ब्रह्मा तेन निरुच्यते । आपूरयति यस्माच्च सर्वान् देहाननुग्रहैः ॥२२ बुध्यते पुरुषश्चात्र सर्वान् भावान्पृथक् पृथक् । तस्मिंस्तु कार्यकारणं संसिद्धं ब्रह्मणः पुरा ॥२३ प्राकृतं देवि वर्तं मां क्षेत्रज्ञो ब्रह्मसंमितः । स वै शरीरी प्रथमः पुरा पुरुष उच्यते ॥२४ आदिकर्त्ता स भूतानां ब्रह्माऽग्रे समवर्त्तिनाम् ॥२५ हिरण्यगर्भः सोऽण्डेऽस्मिन्प्रादुर्भूतश्चतुर्मुखः । सर्गे च प्रतिसर्गे च क्षेत्रज्ञो ब्रह्म संमितः ॥२६ करणैः सह पृच्छते प्रत्याहारैस्त्यजंति च । भजंते च पुनर्देहांस्ते समाहारसंधिषु ॥२७ हिरण्मयस्तु यो मेरुस्तस्योद्धर्तुं र्महात्मनः । गर्त्तोदकं संबुदास्तु हरेयुश्चापि पञ्चताः ॥२८

जिससे भावों का बृंहण करना है उसी से ब्रह्मा—इस नाम से कहा जाया करता है । और जिस कारण से समस्त देहों को अनुग्रहों के द्वारा आपूरित करता है ।२२। यहाँ पर पुरुष सब भावों को पृथक् पृथक् जानता है । उसमें तो पहले ब्रह्म का कार्य और करण से सिद्ध हुआ है ।२३। हे देवि ! मुझको प्राकृत समझकर बतलाया करो । जो क्षेत्रज्ञ है वह ब्रह्म से संमित है । वह शरीर धारी निश्चय ही पहिले पुरुष कहा जाया करता है ।२४। ब्रह्मा के आगे समवर्ती भूतों का वह आदि कर्त्ता है ।२५। वह हिरण्यगर्भ इस अण्ड में चार मुखों वाला प्रादुर्भूत हुआ था । सर्ग और प्रतिसर्ग में क्षेत्रज्ञ ब्रह्म संमित है ।२६। करणों के साथ पूछते हैं और प्रत्याहारों से त्याग करते और वे पुनः समाहार सन्धियों में देहों का सेवन करते हैं ।२७। हिरण्मय जो मेरु गिरि है उस महान् आत्मा वाले के गर्त्तोदक का उद्धार करने के लिये संबुद पञ्जला का भी हरण करते हैं ।२८।

यस्मिन्नंड इमे लोकाः सप्त वै संप्रतिष्ठिताः । पृथिवी सप्तभिर्द्दीपैः समुद्रैः सह सप्तभिः ॥२९ पर्वतैः सुमहद्भिश्च नदीभिश्च सहस्रशः । अन्तः स्थस्य त्विमे लोका अंतर्विश्वमिदं जगत् ॥३०