संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
चन्द्रादित्यौ सनक्षत्रौ संग्रहः सह वायुना । लोकालोक च यत् किंचिदण्डे तस्मिन्प्रतिष्ठितम् ॥३१ आपो दशगुणे नैव तेजसा वाह्यतो वृताः । तेजो दशगुणेनैव वाह्यतो वायुना वृतम् ॥३२ वायुर्दशगुणेनैव बाह्यतो नभसा वृतः । आकाशमावृतं सर्वं बहिर्भूतादिना तथा ॥३३ भूतादिर्महता चैव प्रधानेनावृतो महान् । एभिरावरणेरंडं सप्तभिः प्राकृतैर्वृतम् ॥३४ इच्छया वृत्य चान्योन्यमरणे प्रकृतयः स्थिताः । प्रसर्गकाले स्थित्वा च ग्रसंतश्च परस्परम् ॥३५
जिस अण्ड में ये सात लोक संप्रतिष्ठित हैं। इनमें पृथिवी है जो सात द्वीपों से और सात समुद्रों से युक्त हैं इस पृथ्वी में महान् पर्वत है और सहस्रों नदियाँ भी विद्यमान है। अन्दर स्थित इसके ये सब लोक हैं और अन्दर में रहने विश्व में यह जगत रहता है ।२६-३०। समस्त नक्षत्रों के साथ चन्द्रमा और सूर्य है तथा वायु के साथ संग्रह है। और लोकालोक है। जो कुछ भी है। वह सब उस अण्ड में प्रतिष्ठित हैं अर्थात् विद्यमान रहा करता है ।३१। दश गुने तेज के साथ बाहिर की ओर जल आवृत रहते हैं। दश गुणित वायु के द्वारा वह तेज भी आवृत रहता है ।३२। दश गुने नभ (आकाश) से वह वायु वृत रहता है जोकि बाहिर की ओर है। फिर वह आकाश सम्पूर्ण बाहिर भूतादि से आवृत है ।३३। भूतादिक महान से समावृत है और महान प्रधान के द्वारा आवृत है। इन सात प्राकृत आवरणों के द्वारा यह अण्ड आवृत रहा करता है ।३४। एक दूसरे के मरण में परस्पर में इच्छा से आवृत प्रकृतियां स्थित हैं और प्रसर्ग के अर्थात् प्रसृजन के समय में स्थित होकर परस्पर में ग्रसन किया करती हैं ।३५।
एवं परस्परैश्चैव धारयंति परस्परम् । आधाराधेयभावेन विकारास्ते विकारिषु ॥३६ अव्यक्तं क्षेत्रमित्युक्तं ब्रह्म क्षेत्रज्ञमुच्यते । इत्येवं प्राकृतः सर्गः क्षेत्रज्ञाधिष्ठितस्तु सः ॥३७