संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलोक-वर्णनम् (२) ] | ४३
अबुद्धिपूर्व्वः प्रथमः प्रादुर्भू तस्तडिद्यथा ।
एतद्धिरण्यगर्भस्य जन्म यो वेत्ति तत्त्वतः ।
आयुष्मान्कीर्त्तिमान्धन्यः प्रज्ञावांश्च न संशयः ॥३८॥
इस प्रकार से परस्पर में एक दूसरे को धारण किया करते हैं। ये विकार वालों में आधार और आधेय के भाव से वे सब विकार होते हैं। ।३६। इस अव्यक्त को ही क्षेत्र कहा जाता है और ब्रह्म क्षेत्रज्ञ कहा जाया करता है। इस रीति से यह प्राकृत सर्ग है और वह क्षेत्रज्ञ से अधिष्ठित होता है। ३७। प्रथम अबुद्धि पूर्वक होता है जिस तरह से तड़ित होती है। हिरण्यगर्भ का जन्म तो तात्विक रूप से जानता है वह आयु वाला-कीर्ति से समन्वित-धन्य और प्रज्ञा वाला होता है—इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं हैं ।३८।
॥ लोक-वर्णन (१) ॥
सूत उवाच—आत्मन्यवस्थिते व्यक्ते विकारे प्रतिसंहृते ।
साधर्म्येणावतिष्ठेते प्रधानपुरुषौ तदा ॥१
तमः सत्त्वगुणावेतौ समत्वेन व्यवस्थितौ ।
अनुद्रिक्तावनुचरौ तेन प्रोक्तौ परस्परम् ॥२
गुणसाम्ये लयो ज्ञेय आधिक्ये सृष्टिरुच्यते ।
सत्त्ववृद्धौ स्थितिरभूद् ध्रुवं रत्नशिखास्थितम् ॥३
यदा तमसि सत्त्वे च रजोप्यनुगतं स्थितम् ।
रजः प्रवर्त्तक तच्च बीजेष्विव यथा जलम् ॥४
गुणा वैषम्यमासाद्य प्रसंगेन प्रतिष्ठिताः ।
गुणेभ्यः क्षोभ्यमाणेष्यस्त्रयो ज्ञेया हि सादरे ॥५
शाश्वताः परमा गुह्याः सर्वात्मानः शरीरिणः ।
सत्त्वं विष्णु रजो ब्रह्मा तमो रुद्रः प्रजापतिः ॥६
रजः प्रकाशको विष्णु र्ब्रह्मात्रस्रष्टुत्वमाप्नुयात् ।
जायते च यतश्चित्रा लोकसृष्टिर्नहौजसः ॥७