भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

श्रीसूतजी ने कहा—व्यक्त के आत्मा में अवस्थित होने पर और विकार के प्रति संहृत हो जाने पर उस समय में प्रधान और पुरुष सहकर्मता के साथ अवस्थित हुआ करते हैं ।१। तमोगुण और सत्वगुण ये दोनों समता से व्यवस्थित हुआ करते हैं । उसके साथ ये उद्रिक्त नहीं होते हैं और परस्पर से उसके अनुगामी रहा करते हैं ।२। जब इन गुणों की समता होती है तो उस समय में लय जान लेना चाहिए और जब इनमें किसी भी अधिकता अर्थात् परस्पर में विषमता होती है तो उस अवस्था में सृष्टि कही जाया करती है सत्व की वृद्धि में स्थिति हुई थी और ध्रुव पद्म शिखा में होता है और वह बीजों में जल के ही समान प्रवर्त्तक होता है ।४। ये गुण विषमता की दशा को प्राप्त करके प्रसङ्ग से प्रतिष्ठित होते हैं । गुणों के क्षोभ्यमाण होने से ये तीनों गुण बड़े आदर में जानने के योग्य होते हैं ।५। ये शाश्वत अर्थात् नित्य रहने वाले हैं—परमगुह्य हैं—सबकी आत्मा है और शरीरधारी है । सत्वगुण विष्णु हैं—रजोगुण प्रजापति ब्रह्मा है और तमोगुण साक्षात् रुद्र देव हैं ।६। रजोगुण के प्रकाशक विष्णु ब्रह्मा के स्रष्टा होने की अवस्था को प्राप्त किया करते हैं । जिस महान् ओज वाले से यह विचित्र प्रकार की सृष्टि समुत्पन्न हुआ करती है ।७।

तमः प्रकाशको विष्णुः कालत्वेन व्यवस्थितः ।
सत्त्वप्रकाशको विष्णुः स्थितित्वेन व्यवस्थितः ॥८
एत एव त्रयो लोका एत एव त्रयो गुणाः ।
एत एव त्रयो वेदा एत एव त्रयोऽग्नयः ॥९
परस्परान्वया ह्येते परस्परमनुव्रताः ।
परस्परेण वर्तंते प्रेरयति परस्परम् ॥१०
अन्योन्यं मिथुनं ह्येते अन्योन्यमुपजीविनः ।
क्षणं वियोगो न ह्येषां न त्यजंति परस्परम् ॥११
प्रधानगुणवैषम्यात्सर्गकाले प्रवर्त्तते ।
अदृष्टाऽधिष्ठितात्पूर्वे तस्मात्सदसदात्मकात् ॥१२
ब्रह्मा बुद्धित्वमिथुनं युगपत्संबभूव ह ।
तस्मात्तमौव्यक्तमयं क्षेत्रज्ञो ब्रह्मसंज्ञकः ॥१३