संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
४४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
श्रीसूतजी ने कहा—व्यक्त के आत्मा में अवस्थित होने पर और विकार के प्रति संहृत हो जाने पर उस समय में प्रधान और पुरुष सहकर्मता के साथ अवस्थित हुआ करते हैं ।१। तमोगुण और सत्वगुण ये दोनों समता से व्यवस्थित हुआ करते हैं । उसके साथ ये उद्रिक्त नहीं होते हैं और परस्पर से उसके अनुगामी रहा करते हैं ।२। जब इन गुणों की समता होती है तो उस समय में लय जान लेना चाहिए और जब इनमें किसी भी अधिकता अर्थात् परस्पर में विषमता होती है तो उस अवस्था में सृष्टि कही जाया करती है सत्व की वृद्धि में स्थिति हुई थी और ध्रुव पद्म शिखा में होता है और वह बीजों में जल के ही समान प्रवर्त्तक होता है ।४। ये गुण विषमता की दशा को प्राप्त करके प्रसङ्ग से प्रतिष्ठित होते हैं । गुणों के क्षोभ्यमाण होने से ये तीनों गुण बड़े आदर में जानने के योग्य होते हैं ।५। ये शाश्वत अर्थात् नित्य रहने वाले हैं—परमगुह्य हैं—सबकी आत्मा है और शरीरधारी है । सत्वगुण विष्णु हैं—रजोगुण प्रजापति ब्रह्मा है और तमोगुण साक्षात् रुद्र देव हैं ।६। रजोगुण के प्रकाशक विष्णु ब्रह्मा के स्रष्टा होने की अवस्था को प्राप्त किया करते हैं । जिस महान् ओज वाले से यह विचित्र प्रकार की सृष्टि समुत्पन्न हुआ करती है ।७।
तमः प्रकाशको विष्णुः कालत्वेन व्यवस्थितः ।
सत्त्वप्रकाशको विष्णुः स्थितित्वेन व्यवस्थितः ॥८
एत एव त्रयो लोका एत एव त्रयो गुणाः ।
एत एव त्रयो वेदा एत एव त्रयोऽग्नयः ॥९
परस्परान्वया ह्येते परस्परमनुव्रताः ।
परस्परेण वर्तंते प्रेरयति परस्परम् ॥१०
अन्योन्यं मिथुनं ह्येते अन्योन्यमुपजीविनः ।
क्षणं वियोगो न ह्येषां न त्यजंति परस्परम् ॥११
प्रधानगुणवैषम्यात्सर्गकाले प्रवर्त्तते ।
अदृष्टाऽधिष्ठितात्पूर्वे तस्मात्सदसदात्मकात् ॥१२
ब्रह्मा बुद्धित्वमिथुनं युगपत्संबभूव ह ।
तस्मात्तमौव्यक्तमयं क्षेत्रज्ञो ब्रह्मसंज्ञकः ॥१३
कपिल आश्रम में अश्वानयन ] [ ४५
अर्थों के तत्त्वों का ज्ञाता होगा ।४८। वह अपने पितरों के गौरव से सुसमन्वित होगा और महान यत्न से परम घोर तप करके निश्चय ही स्वर्ग से यहाँ पर गङ्गा को लावेगा ।४९।
तदंभसा पावितेषु तेषां गात्रास्थिभस्मसु ।
प्राप्नुवंति गतिं स्वर्गे भवतः पितरोऽखिला ॥५०
तथेति तस्या माहात्म्यं गंगाया नृपनन्दन ।
भागीरथीति लोकेऽस्मिन्सा विख्यातिमुपेष्यति ॥५१
यत्तोयप्लावित्तेष्वस्थिभस्मलोमनखेष्वपि ।
निरयादपि संयाति देही स्वर्लोकमक्षयम् ॥५२
तस्मात्त्वं गच्छ भद्रं ते न शोकं कर्तुं महंसि ।
पितामहाय चैवैनमश्वं संप्रतिपादय ॥५३
जैमिनिरुवाच-
ततः प्रणम्य तं भक्त्या तथेत्युक्त्वा महामतिः ।
ययौ तेनाभ्यनुज्ञातः साकेतनगरं प्रति ॥५४
सगरं स समासाद्य तं प्रणम्य यथाक्रमम् ।
न्यवेदयच्च वृत्तांतं मुनेस्तेषां तथात्मनः ॥५५
प्रददौ तुरगं चापि समानीतं प्रयत्नतः ।
अतः परमनुष्ठेयमब्रवीत्किं मयेति च ॥५६
उस पतित पावनी गङ्गा के पुनीत जल से उन सबके गात्र-अस्थि और भस्म के पवित्र हो जाने पर वे समस्त आपके पितृगण स्वर्ग में गति को प्राप्त करेंगे ।५०। हे नृपनन्दन उस गङ्गा का माहात्म्य ही ऐसा अद्भुत है । राजा भगीरथ के द्वारा यहाँ लाने से इस लोक में उसका नाम भागीरथी प्रसिद्ध होगा ।५१। गङ्गा का बड़ा अद्भुत माहात्म्य होता है कि उसके जल में किसी भी प्राणी की अस्थि-भस्म-नख आदि कोई भी भाग जब प्लावित हो जाता है तो वह प्राणी नरक की यातनाओं से भी मुक्त होकर अक्षय स्वर्गलोक में चला जाया करता है ।५२। इस कारण से अब आप यहाँ से चले जाइए—आपका कल्याण होगा—आपको कुछ भी शोक नहीं करना चाहिए । अपने पितामह को यह अश्व ले जाकर दे दो ।५३। जैमिनि मुनि
४६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
एकधा स द्विधा चैव त्रिधा च बहुधा पुनः । योगीश्वरः शरीराणि करोति विकरोति च ॥२१
वह प्रथम ही शरीर था जो कि धारणत्व से व्यवस्थित था। यहाँ पर अनुपम ज्ञान से और वैराग्य से सप्तति था। इसके अव्यक्तता के लिए उस मन से वह जो-जो भी इच्छा करता था वही करता था क्योंकि इसके तीनों गुण वश में किये हुए थे और भाव से वे एक दूसरे की अपेक्षा करने वाले थे ।१५-१६। चतुर्मुख ब्रह्मत्व को प्राप्त किया था और अन्त करनेवाले पुरुष हुए। इस प्रकार से स्वयम्भू की ही ये तीन अवस्थाएँ थीं। १७। ब्रह्मत्व की दशा में सब रजोगुण है और काल की अवस्था में रजोगुण और तमोगुण होता है। जब पुरुष की दशा में यह होते हैं तो तत्वगुण के युक्त होते हैं। इस प्रकार से स्वयम्भू में गुणों की वृत्ति होती है ।१८। जब ब्रह्मा की दशा में यह रहते हैं तो यह लोकों का सृजन किया करते हैं। जब काल का स्वरूप धारण किया करते हैं तो उन सभी लोकों का संक्षय करते हैं। जब केवल पुरुष की दशा में होते हैं तो यह उदासीन रहते हैं। ऐसे स्वयम्भू की ही ये तीन भिन्न-भिन्न अवस्थाएँ हुआ करती हैं ।१९। ब्रह्मा कमल के दलों के समान नेत्रों वाले होते हैं और काल का जब उनका स्वरूप होता है तो अञ्जन के समान कृष्ण वर्ण होता है। जब उदासीन पुरुष के रूप में होते हैं तो यह परमात्मा के स्वरूप से पुण्डरीकाक्ष होते हैं ।२०। एक प्रकार से—दो प्रकार से—तीन प्रकार से फिर बहुत प्रकार से योगीश्वर प्रभु अनेक शरीरों को बनाया करते हैं और बदलते रहा करते हैं ।२१।
नानाकृतिक्रियारूपमाश्रयंति स्वलीलया । त्रिधा यद्वर्त्तते लोके तस्मात्त्रिगुण उच्यते ॥२२ चतुर्द्धा प्रविभक्तत्वाच्चतुर्व्यूहः प्रकीर्तितः । यदा शेते तदार्धाते यद्भक्ते विषयान्प्रभुः ॥२३ यत्स्वस्थाः सततं भावस्तस्मादात्मा निरुच्यते । ऋषिः सर्वगतश्चात्र शरीरे सोऽभ्ययात्प्रभुः ॥२४ स्वामी सर्वस्य यत्सर्वं विष्णुः सर्वप्रवेशनात् । भगवानग्रसद्भावान्नागो नागस्वसंश्रयात् ॥२५ परमः संप्रहृष्टत्वाद्वैवतादोमिति स्मृतिः ।
लोक वर्णनम् (१) ] [ ४७
सर्वज्ञः सर्वविज्ञानात्सर्वः सर्वं यतस्ततः ॥२६ नराणां स्वापनं ब्रह्मा तस्मान्नारायणः स्मृतः । त्रिधा विभज्य चात्मानं सकलः संप्रवर्त्तते ॥२७ सृजते ग्रसते चैव पाल्यते च त्रिभिः स्वयम् । सोऽग्रे हिरण्यगर्भः सन् प्रादुर्भूतः स्वयं प्रभुः ॥२८
अनेक क्रिया-आकार और स्वरूप का आश्रय ग्रहण किया करते हैं और यह सब अपनी ही लीला से करते रहा करते हैं । लोक में यह तीन प्रकार वाले होकर रहते हैं इसी कारण से इनको त्रिगुण कहा जाता है ।२२। चार प्रकार से प्रविभक्त होने से यह चतुर्व्यूह कहा गया है । जिस समय में यह शयन किया करते हैं उस समय में बह अर्धन्त होते हैं प्रभु विषयों का भोग किया करते हैं ।२३। जो स्वस्थ होते हैं तब निरन्तर भाव होता है । इसी से आत्मा कहा जाता है और ऋषि इसमें सर्वगत हैं । वह शरीर में आते हैं ।२४। भगवान् विष्णु सबके स्वामी हैं क्योंकि विष्णु का सभी में प्रवेश होता है । भगवान् अप्रसद्भावसे नाग हैं और नाग का संश्रय नहीं होता है ।२५। संप्रहृष्ट होने से परम है और देवता होने से ओम् यह स्मृति है । सबके विज्ञान होने से यह सर्वज्ञ हैं क्योंकि यह सबमें हैं अतएव यह सर्व कहा जाता है ।२६। नरों में अर्थात् जलों में यह स्वपन किया करते हैं इस कारण से ब्रह्माजी नारायण कहे गये हैं और अपने आपके स्वरूप को तीन प्रकार से विभक्त करके यह सकल से संप्रवृत्त हुआ करते हैं ।२७। इन तीनों स्वरूपों से यह लोकों का सृजन पालन और क्रम से ग्रसन किया करते हैं । वही सबसे आगे हिरण्यगर्भ होते हुए स्वयं प्रादुर्भूत हुए हैं ।२८।
आद्यो हि स्ववशश्चैव अजातत्वादजः स्मृतः । तस्माद्धिरण्यगर्भश्च पुराणेषु निरुच्यते ॥२९ स्वयंभुवो निवृत्तस्य कालो वर्णग्रितस्तु यः । न शक्यः परिसंख्यातुं मनुवर्षशतैरपि ॥३० कल्पसंख्यानिवृत्तस्तु परार्धो ब्रह्मणः स्मृतः । तावत्त्वे सोऽस्य कालोऽन्यस्तस्यांते प्रतिबुद्ध्यते ॥३१ कोटिवर्षसहस्राणि गृहभूतानि यानि च । समतीतानि कल्पानां तावच्छेषात्परे तु ये ॥३२
४८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
यत्स्वयं वर्त्तते कल्पो वाराहस्तन्निबोधत ।
प्रथमं सांप्रतस्तेषां कल्पो वै वर्त्तते च यः ॥३३
पूर्णे युगसहस्रे तु परिपाल्यं नरेश्वरैः ॥३४
क्योंकि यह सबसे आदि काल में होने वाले हैं । अतएव यह स्ववशी हैं अर्थात् अपने ही वश में रहने वाले हैं ऐसा ही कहा गया है । उसी कारण से पुराणों में इनको हिरण्यगर्भ कहा जाया करता है ।२९। जो स्वयम्भुव है वह निवृत्त का वर्षों में अग्रकाल है । इसकी परिसंख्या मनु के सैकड़ों वर्षों में भी नहीं की जा सकती है ।३०। कल्पों की संख्या से निवृत्त ब्रह्मा का परार्ध कहा गया है । उतने ही में इसका वह काल है उसके अन्त में अन्य काल प्रतिबुद्ध होता है ।३१। करोड़ों सहस्र वर्ष जो कि इसके गृहभूत हैं । उतने कल्पों के समतीत हैं और जो शेष हैं वे दूसरे हैं ।३२। जो स्वयं कल्प है वह वाराह कल्प है—ऐसा ही समझ लो । प्रथम उनमें साम्प्रत है और जो कल्प होता है ।३३। एक सहस्र युगों के पूर्ण हो जाने पर नरेश्वरों के द्वारा परिपालन के योग्य है ।३४।
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॥ लोककल्पनम् (२) ॥
सूत उवाच—आपोऽग्रे सर्वगा आसन्नेतस्मिन्पृथिवीतले ।
शांतवातेः प्रलीनेऽस्मिन्न प्राज्ञायत किंचन ॥१
एकार्णवे तदा तस्मिन्नष्टे स्थावरजङ्गमे ।
विभुर्भवति स ब्रह्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥२
सहस्रशीर्षा पुरुषो रुक्मवर्णो ह्यतीन्द्रियः ।
ब्रह्म नारायणाख्यस्तु सुष्वाप सलिले तदा ॥३
सत्त्वोद्रेकान्निषिद्धस्तु शून्यं लोकमवेक्षत ।
इमं चोदाहरंत्यत्र श्लोकं नारायणं प्रति ॥४
आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः ।
अयनं तस्य ताः प्रोक्तास्तेन नारायणः स्मृतः ॥५
तुल्यं युगसहस्रस्य वसन्कालमुपास्यतः ।
लोककल्पनम् (२) ] [ ४६
स्वर्णपत्रे प्रकुरुते ब्रह्मत्वाददर्शकारणात् ॥ ६ ब्रह्मा तु सलिले तस्मिन्नवाग् भूत्वा तदा चरत् । निशायामिव खद्योतः प्रावृट्काले ततस्ततः ॥ ७
श्रीसूतजी ने कहा—इस पृथिवी तत्व में सबसे पूर्व जल ही जल सर्वत्र था और यह शील तथा प्रलीन था । इसमें उस समय कुछ भी नहीं जाना जाता था । १। केवल एक समुद्र ही था और उस सागर में सभी स्थावर (अचर) और जङ्गम (चर) नष्ट हो गये थे । विभु (व्यापक) वह ब्रह्मा जी उस समय में सहस्रों पादों और नेत्रों वाले हो जाया करते हैं । २। सहस्रों शीर्षों वाले, सुवर्ण के समान जिनका वर्ण था और जो इन्द्रियों की पहुँच से परे थे अर्थात् अप्रत्यक्ष थे ऐसे पुरुष नारायण नाम वाले ब्रह्मा उस समय में समुद्र में शयन कर रहे थे । ३। सत्व के उद्रेक से निषिद्ध होते हुए उन्होंने उस समय में इस लोक को शून्य देखा था । यहाँ पर भगवान् नारायण के विषय में इन निम्न लिखित श्लोक को उदाहृत किया करते हैं । ४। जलों को नारा कहा गया है और ये जल ही नर के आत्मज हैं । वे जल ही उन नारायण प्रभु के निवास स्थान है अतएव प्रभु का नाम नारायण कहा गया है । ५। सहस्रों युगों के तुल्य काल तक वे प्रभु वहाँ पर निवास करते हुए स्थित रहे थे । ब्रह्मत्व के अदर्शन के कारण से वे स्वर्ण पत्र किया करते हैं । ६। उस जल में ब्रह्माजी अवाक् होकर उस समय में विचरण कर रहे थे जिस तरह से वर्षा ऋतु में रात्रि में खद्योत चमकता हुआ यहाँ से वहाँ घूमा करता है । ७।
ततस्तु सलिले तस्मिन् विज्ञायांतर्गते महत् । अनुमानादसंमूढो भूमेरुद्धरणं प्रति ॥ ८ ॐकाराष्टतनुं त्वन्यां कल्पादिषु यथा पुरा । ततो महात्मा मनसा दिव्यरूपमचिंतयत् ॥ ९ सलिलेऽवप्लुतां भूमिं दृष्ट्वा स समचिंतयत् । किं तु रूपमहं कृत्वा सलिलादुद्धरे महीम् ॥ १० जलक्रीडासमुचितं वाराहं रूपमस्मरत् । अदृश्यं सर्वभूतानां वाङ्मयं ब्रह्मसंज्ञितम् ॥ ११
५० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
दशयोजनविस्तीर्णमायतं शतयोजनम् । नीलमेघप्रतीकाशं मेघस्तनितनिःस्वनम् ॥१२ महापर्वतवर्ष्माणं श्वेततीक्ष्णोग्रदंष्ट्रिणम् । विद्युदग्निप्रतीकाशमादित्यसमतेजसम् ॥१३ पीनवृत्तायतस्कन्धं विष्णुविक्रमगामि च । पीनोन्नतकटीदेशं वृषलक्षणपूजितम् ॥१४
इसके उपरान्त उस जल में अन्तर्गत में महत् का ज्ञान प्राप्त किया था भूमिका उद्धारण करने के विषय में मूढ़ता से रहित उन्होंने अनुमान किया था ।८। इसके पश्चात् अन्य ओंकाराष्ट तनु का जैसे पहिले कल्पों के आदि में था उन महात्मा ने मन में ही उस दिव्य स्वरूप का चिन्तन किया था ।९। उस विशाल जल की राशि में उन्होंने डूबी हुई भूमि को देखकर भली भाँति चिन्तन किया था कि क्या स्वरूप धारण करके मैं इस भूमि का जल से उद्धार करूँ ।१०। जल में क्रीड़ा करना बहुत ही उचित है । इस तरह से उन्होंने वाराह के रूप का स्मरण किया था । जो कि समस्त प्राणियों के द्वारा न देखने के योग्य है और वाङ्मय ब्रह्म की संज्ञा वाला है ।११। उसका विस्तार दश योजन का था उसकी चौड़ाई अर्थात् फैलाव सौ योजन था । नीले मेघ के समान उसका वर्ण था और मेघ के गर्जन के सदृश ध्वनि थी ।१२। एक विशाल पर्वत के तुल्य उसका शरीर था और उसकी दाढ़ें श्वेत एवं उग्र और तीक्ष्ण थीं । बिजली की अग्नि जैसी होती है उसी प्रकार चमक थी तथा सूर्य के समान उसमें तेज था ।१३। मोटे और चौड़े स्कन्ध थे और भगवान् विष्णु के विक्रम से गमनशील थे । उसकी कटि का भाग स्थूल और ऊँचा था । वह वृष के लक्षणों से पूजित था ।१४।
आस्थाय रूपमतुलं वाराहममितं हरिः । पृथिव्युद्धरणार्थाय प्रविवेश रसातलम् ॥१५ दीक्षासमाप्तीष्टिदंष्ट्रः क्रतुदंतो जुहूमुखः । अग्निजिह्वो दर्भरोमा ब्रह्मशीर्षो महातपाः ॥१६ वेदस्कन्धो हविर्गन्धिर्हव्यकव्यादिवेगवान् । प्राग्वंशकायो द्युतिमान् नानादीक्षाभिरन्वितः ॥१७
लोककल्पनम् (२) ] [ ५१
दक्षिणा हृदयो तोगी श्रद्धासत्त्वमयो विभुः । उपाकर्मरुचिश्चैव प्रवर्ग्यावर्तभूषणः ॥१८ नानाछन्दोगतिपथो गुह्योपनिषदासनः । मायापत्नीसहायो वै गिरिशृङ्गमिवोच्छ्रयः ॥१९ अहोरात्रेक्षणधरो वेदांगश्रुतिभूषणः । आज्यगंधः स्रुवस्तुण्डः सामघोषस्वनो महान् ॥२० सत्यधर्ममयः श्रीमान् कर्मविक्रमसत्कृतः । प्रायश्चित्तनखो घोरः पशुजानुर्महामखः ॥२१
हरि भगवान् ने अमित वाराह के रूप को धारण किया था जो अतुल था और पृथिवी के जल से उद्धरण करने के लिए उन्होंने रसातल में प्रवेश किया था । अब वाराह भगवान के स्वरूप को यज्ञ का रूप देते हुए बताया जाता है दीक्षा की समाप्ति इष्टि के दाढ़ों वाले थे । उनके दांत क्रतु था और मुख में आहुति थी । जिह्वा अग्नि थी और उनके रोम दर्भों के समान थे । महान् तपस्वी ब्रह्म शीर्ष था ।१५-१६। वेदों के स्कन्धों वाले तथा हवि की गन्ध से युक्त और हव्य-कव्य आदि के वेग से संयुत है । प्राग्वंश के शरीर वाले—द्युति से युक्त हैं और नाना प्रकार की शिक्षाओं से समन्वित है ।१७। हृदय दक्षिणा है तथा श्रद्धा सत्त्व से परिपूर्ण विभु योगी हैं । उपाकर्म की रुचि वाले और प्रवर्ग्यावित्त भूषण वाले हैं ।१८। अनेक छन्द गति पथ है और गुह्य उपनिषद आसन है । मायारूपिणी पत्नी की सहायता वाले तथा पर्वत की शिखर के समान उच्च है ।१९। अहोरात्र अर्थात् दिन और रात्रि रूपी नेत्रों के धारण करने वाले हैं तथा वेदों के अङ्ग श्रुति वाले हैं । घृत गन्ध वाले हैं—तुण्ड ही स्रुव है तथा सामवेद का घोष ही ध्वनि है जो कि महान है ।२०। श्रीमान् सत्यधर्म से परिपूर्ण है और कर्मों के विक्रम से सत्कृत है । प्रायश्चित्तों के नखों वाले हैं और घोर पशु जानु हैं ऐसा यह महामख है ।२१।
उद्गातांत्रो होमलिंगः फलबीजमहौषधीः । वाय्वंतरात्मसत्रस्य नासिकासोमशोणितः ॥२२ भक्ता यज्ञराहांताश्चापः संश्राविशत्पुनः । अग्निसंछादितां भूमि समामिच्छन्प्रजापतिम् ॥२३
५२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
उपगम्या जुहावैता सद्यश्चाद्यसमन्वसत् ।
सामुद्राश्च समुद्रेषु नादेयाश्च नदीषु च ।
पृथक् तास्तु समीकृत्य पृथिव्यां सोऽचिनोद्गिरीन् ॥२४
प्राक्सर्गे दह्यमानास्तु तदा संवर्तकाग्निना ।
तेनाग्निना विलीनास्ते पर्वता भुवि सर्वशः ॥२५
सत्यादेकार्णवे तस्मिन् वायुना यत्तु संहिताः ।
निषिक्ता यत्रयत्रासंस्तत्रतत्राचलोऽभवत् ॥२६
ततस्तेषु प्रकीर्णेषु लोकोदधिगिरींस्तथा ।
विश्वकर्मा विभजते कल्पादिषु पुनः पुनः ॥२७
ससमुद्रामिमां पृथ्वीं सप्तद्वीपां सपर्वताम् ।
भूराद्यांश्चतुरो लोकान्पुनः पुनरकल्पयत् ॥२८
अन्त्र ही उद्गान्त हे—होमलिङ्ग और फलों के बीज महौषधि हैं। बाह्यन्तर आत्मसत्र के हैं तथा नासिका सोमशोणित है ।२२। यज्ञवराहान्त भक्त हैं और फिर जलों में प्रवेश किया था। अग्नि से संच्छादित भूमि को समा चाहते हुए प्रजापति को प्राप्त हुए और वहाँ पहुँच कर इनका हवन किया था तथा मद्य का अद्य सन्यास किया था और सामुद्र समुद्रों में तथा जो नादेय थे वे नदियों ने उन सबको पृथक् सभी कृत करके उन्होंने पृथिवी में गिरियों को चुना था ।२३-२४। पहिले सर्ग में प्रलय काल की संवर्तक अग्नि से जो उस समय में दह्यमान थे । उस अग्नि से सभी ओर भूमि में वे विलीन हो गये थे ।२५। उस एक मात्र रहने वाले समुद्र में सत्य से जो वायु के द्वारा संहित थे । जहाँ-जहाँ पर निषिक्त थे वहाँ-वहाँ पर अचल हो गया था ।२६। उसके अनन्तर उनके प्रकीर्ण होने पर लोक तथा अधि गिरियों को विश्वकर्मा ने कल्पादि में बार-बार विभाजित किया है ।२७। समुद्र से इस पृथ्वी को जो सातों द्वीपों से युक्त और पर्वतों के सहित है । भू आदि चारों लोकों को बार-बार कल्पित किया था ।२८।
लोकान्प्रकल्पयित्वा च प्रजासर्गं ससर्ज ह ।
ब्रह्मा स्वयंभूर्भगवान् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः ॥२६
ससर्ज सृष्टं तद्रूपं कल्पादिषु यथा पुरा ।
लोककल्पनम् (२) ] [ ५३
तस्याभिध्यायतः सर्गं तदा वै बुद्धिपूर्वकम् ॥ ३० प्रधानसमकाले च प्रादुर्भूतस्तमोमयः । तमो मोहो महामोहस्तामिस्रो ह्यन्धसंज्ञितः ॥ ३१ अविद्या पञ्चपर्वैषा प्रादुर्भूता महात्मनः । पञ्चधावस्थित चैव बीजकुम्भलतावृताः ।३२ सर्वतस्तमसा चैव बीजकुम्भलतावृताः । बहिरंतश्चाप्रकाशस्तथानिः संज्ञ एव च ॥ ३३ यस्मात्तेषां कृता बुद्धिर्दुःखानि करणानि च । तस्माच्च संवृतात्मानो नगा मुख्याः प्रकीर्तिताः ॥ ३४ मुख्यसर्गे तदोद्भूतं दृष्ट्वा ब्रह्मात्मसंभवः । अप्रतीतमनाः सोऽथ तदोत्पत्तिममन्मत ॥ ३५
अनेक प्रकार की प्रजाओं का सृजन करने की इच्छा वाले ब्रह्माजी ने जो स्वयम्भू भगवान् हैं अनेक लोकों की कल्पना करके उन्होंने प्रजाओं का सृजन किया था । २६। पहिले कल्प आदि में जो स्वरूप था उसी रूप की सृष्टि का सृजन किया था । उस सृजन का अभिध्यान करते हुए उन्होंने बुद्धि पूर्वक ही सर्ग किया था ।३०। प्रधान के समकाल में तम से पूर्ण प्रादुर्भूत हुआ था । उस तम का मोह-महामोह-तामिस्र और अन्ध-ये संज्ञाएं थीं ।३१। उन महान् आत्मा वाले को पञ्च पर्वा अविद्या प्रादुर्भूत हुई थी अत-एव उन अभिमानी और ध्यान करने वाले ब्रह्माजी का वह सर्ग भी पाँच प्रकार का व्यवस्थित हुआ था ।३२। सभी ओर बीज-कुम्भ और लताएँ तम से आवृत थे और बाहिर तथा अन्दर प्रकाश नहीं था तथा सब निःसंज्ञ था ।३३। जिससे उनकी बुद्धि की गयी थी और दुःख तथा करण हुए थे और उससे संवृत आत्मा वाले नगर मुख्य कहे गये हैं ।३४। अपने आप ही समु-त्पन्न हुए ब्रह्माजी ने उस समय में मुख्य सर्ग में उद्भूत को देखा था और अपने मन में अप्रतीति करने वाले उन्होंने उस समय में उत्पत्ति ही मान लिया था ।३५।
तस्याभिध्यायंतश्चान्यस्तिर्यक्स्रोतोऽभ्यवर्तत । यस्मात्तिर्यग्विवर्त्तत तिर्यक्स्रोतस्ततः स्मृतः ॥ ३६
५४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
तमोबहुत्वात्ते सर्वे ह्यज्ञानबहुलाः स्मृताः । उत्पाद्यग्राहिणश्चैव तेऽज्ञाने ज्ञानमानिनः ॥३७ अहंकृता अहंमाना अष्टाविंशद्विधात्मिकाः । एकादशेन्द्रियविधा नवधात्मादयस्तथा ॥३८ अष्टौ तु तारकाद्याश्च तेषां शक्तिविधाः स्मृताः । अंतः प्रकाशास्ते सर्वे आवृताश्च बहिः पुनः ॥३९ तिर्यक् स्रोतस उच्यंते वश्यात्मानस्त्रिसंज्ञकाः ॥४० तिर्यक् स्रोतस्तु वै द्वितीयं विश्वमीश्वरः । अभिप्रायमथोद्भूतं दृष्ट्वा सर्गं तथाविधम् ॥४१ तस्याभिध्यायतो योन्यः सात्त्विकः समजायतः । ऊर्ध्वस्रोतस्तृतीयस्तु तद्वै चोर्ध्वं व्यवस्थितम् ॥४२
अभिध्यान करने वाले उनका अन्य एक तिर्यक् स्रोत हुआ था । जिससे तिर्यक् विवर्त्तित होते थे इस कारण से वह फिर तिर्यक् स्रोत कहा गया था ।३६। उस तिर्यक् स्रोत में तमोगुण की अधिकता थी इस कारण से वे सभी बहुत अधिक अज्ञान से समन्वित कहे गये हैं । वे सब उत्पाद्य के ग्राही थे और उस अज्ञान में ही ज्ञान के मानने वाले थे ।३७। वे अहङ्कार से युक्त थे और आत्माहङ्कारी थे । ऐसे वे अट्ठाईस प्रकार के थे । इन द्वादश इन्द्रियों के भेद थे जो कि नेत्र, कान, नासिका, जिह्वा और त्वक्—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं और हाथ, पद, गुदा उपस्थ और जिह्वा—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं और एक मन है । तथा नौ प्रकार के आत्मा हैं ।३८। और आठ तारकादि हैं और उनकी शक्ति के प्रकार कहे गये हैं । वे सब अन्दर में प्रकाश वाले हैं फिर वे बाहिर से समावृत हैं ।३९। तिर्यक् स्रोत कहे जाया करते हैं और वश्यात्मा तीन संज्ञा वाले हैं ।४०। तिर्यक् स्रोत का सृजन करके ईश्वर ने दूसरे विश्व की रचना की थी । इसके अनन्तर उद्भूत अभिप्राय को देखकर अर्थात् उस प्रकार के सर्ग का अवलोकन किया था ।४१। इस तरह से अभिध्यान करने वाले उनके जो अन्त्य सात्त्विक सर्ग समुत्पन्न हुआ था । तीसरा तो ऊर्ध्व स्रोत था और वह निश्चित रूप से ऊपर की ही ओर व्यवस्थित था ।४२।
यस्मादूर्ध्वं न्यवर्त्तत तदूर्ध्वस्रोतसंज्ञकम् ।
लोककल्पनम् (२) ] [ ५५
ताः सुखं प्रीतिबहुला बहिरंतश्च वावृताः ॥४३ प्रकाशा बहिरंतश्च ऊर्द्ध्वंस्रोतः प्रजाः स्मृताः । नवधातादयस्ते वै तुष्टात्मानो बुधाः स्मृताः ॥४४ ऊर्द्ध्वंस्रोतस्तृतीयो यः स्मृतः सर्व्वः सदैविकः । ऊर्द्ध्वंस्रोतः सु सृष्टेषु देवेषु स तदा प्रभुः ॥४५ प्रीतिमानभवद्ब्रह्मा ततोऽन्यं नाभिमन्यत । सर्गमन्यं सिसृक्षुस्तं साधकं पुनरीश्वरः ॥४६ तस्याभिध्यायतः सर्गं सत्याभिध्यायिनस्तदा । प्रादुर्बभौ भौतसर्गः सोऽर्वाक् स्रोतस्तु साधकः ॥४७ यस्मात्तेर्वाक्प्रवर्त्तंते ततोर्वाक्स्रोतसस्तु ते । ते च प्रकाशबहुलास्तमस्पृष्टरजोधिकाः ॥४८ तस्मात्ते दुःखबहुला भूयोभूयश्च कारिणः । प्रकाशा बहिरंतश्च मनुष्याः साधकाश्च ते ॥४९
कारण यह है कि यह ऊर्ध्वं में रहा था । इसीलिए उसकी ऊर्ध्वं स्रोत संज्ञा होती है । वे सुख पूर्वक बहुत प्रीति पूर्ण थे और बाहर भीतर आवृत्त थे ।४३। बाहिर भीतर रहने वाले प्रकाश ऊर्ध्वं स्रोत प्रजा कहे गये थे । जो नौ धाता आदिक थे वे तुष्ट आत्मा वाले बुध कहे गये हैं ।४४। जो ऊर्ध्वंस्रोत तीसरा कहा गया है वह सब सदैविक है । उस समय में ऊर्ध्वं स्रोतों के सृजन किये जाने पर वह प्रभु प्रसन्न हुए थे ।४५। ब्रह्माजी का मन बहुत प्रीतियुक्त हो गया था और फिर अन्य को नहीं माना था । फिर ईश्वर ने अन्य साधक सर्ग के सृजन की इच्छा की थी ।४६। सर्ग की रचना का अभि-ध्यान करने वाले और उस समय में स्रोत अर्वाक् साधक था ।४७। कारण यह है कि वे अवाक् प्रवृत्त हुआ करते हैं इसी से वे अर्वाक् स्रोत होते हैं इसी से वे अर्वाक् स्रोत होते हैं और उनमें प्रकाश की बहुलता हुआ करती है और तम से स्पर्श किये हुए रजोगुण की अधिकता से युक्त होते हैं ।४८। इस कारण उनमें दुःखों की अधिकता है और पुनः पुनः करने वाले हैं । बाहिर और अन्दर प्रकाश होते हैं और वे मनुष्य साधना करने वाले हैं ।४९।
५६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
लक्षणैर्नारकाद्यैस्तैरष्टधा च व्यवस्थिताः । सिद्धात्मानो मनुष्यास्ते गन्धर्वैः सह धर्मिणः ॥५० पञ्चमोऽनुग्रहः सर्गश्चतुर्द्धा स व्यवस्थितः । विपर्ययेण शक्त्या च सिद्धमुख्यास्तथैव च ॥५१ निवृत्ता वर्तमानाश्च प्रजायंते पुनः पुनः । भूतादिकानां सत्त्वानां षष्ठः सर्गः स उच्यते ॥५२ स्वादनाश्चाप्यशीलाश्च ज्ञेया भूतादिकाश्च ते । प्रथमो महतः सर्गो विज्ञेयो ब्रह्मणस्तु सः ॥५३ तन्मात्राणां द्वितीयस्तु भूतसर्गः स उच्यते । वैकारिकस्तृतीयस्तु चैन्द्रियः सर्ग उच्यते ॥५४ इत्येते प्राकृताः सर्गा उत्पन्ना बुद्धिपूर्वकाः । मुख्यसर्गश्चतुर्थस्तु मुख्या वै स्थावराः स्मृताः ॥५५ तिर्यक्स्रोतः ससर्गस्तु तैर्यग्योन्यस्तु पञ्चमः । तथोर्द्ध्वस्रोतसां सर्गः षष्ठो दैवत उच्यते ॥५६
वे नारक आदि लक्षणों से आठ प्रकार से व्यवस्थित होते हैं । वे मनुष्य गन्धर्वोंके साथ धर्म वाले होते हुए सिद्ध आत्मा वाले हैं ।५०। पाँचवाँ अनुग्रह नामक सर्ग है जो चार प्रकार का व्यवस्थित है । विपर्यय से और शक्ति से और शक्ति से उसी भाँति सिद्ध मुख्य हैं ।५१। निवृत्त और वर्तमान बार-बार उत्पन्न हुआ करते हैं । भूतादिक सत्त्वों का जो सर्ग है वह छठा सर्ग कहा जाता है ।५२। और भूतादिक स्वादन और आया शील जानने के योग्य हैं । प्रथम महत् का सर्ग है वह ब्रह्मा का सर्ग तन्मात्राओं का होता है और भूतसर्ग कहा जाया करता है और भूतसर्ग कहा जाया करता है । तीसरा सर्ग वैकारिक है जो इन्द्रिय सर्ग के नाम से पुकारा जाता है ।५४। ये सभी प्राकृत सर्ग हैं जो बुद्धि पूर्वक समुत्पन्न हुए हैं । प्रमुख सर्ग चौथा है और निश्चय ही स्थावर मुख्य कहे गये हैं ।५५। त्रियक् स्रोत तो तिर्यग् योनियों वाला पाँचवां होता है । उसी भाँति ऊर्ध्व स्रोतों का सर्ग छठा है जो दैवत सर्ग के नाम से कहा जाया करता है ।५६।
तत्रोर्द्ध्वस्रोतसां सर्गः सप्तमः स तु मानुषः ।
लोककल्पनम् (२) ] [ ५७
अष्टमोनुग्रहः सर्गः सात्त्विकस्तामसश्च सः ॥५७
पंचैते वैकृताः सर्गाः प्राकृताद्यास्त्रयः स्मृताः ।
प्राकृतो वैकृतश्चैव कौमारो नवमः स्मृतः ॥५८
प्राकृता बुद्धिपूर्वास्तु त्रयः सर्गास्तु वैकृताः ।
बुद्धिपूर्वाः प्रवर्त्तेयुस्तद्वर्गा ब्राह्मणास्तु वै ॥५९
विस्तराच्च यथा सर्वे कीर्त्यमानं निबोधत ।
चतुर्द्धा च स्थितस्सोऽपि सर्वभूतेषु कृत्स्नशः ॥६०
विपर्ययेण शक्त्या च बुद्ध्या सिद्ध्या तथैव च ।
स्थावरेषु विपर्यासस्तिर्यग्योनिषु शक्तितः ॥६१
सिद्धात्मानो मनुष्यास्तु पुष्टिर्देवेषु कृत्स्नशः ।
अथो ससर्ज वै ब्रह्मा मानसानात्मनः समान् ॥६२
वैवर्त्येन तु ज्ञानेन निवृत्तास्ते महौजसः ।
संबुद्धय चैव नामाथो अपवृत्तास्त्रयस्तु ते ॥६३
वहीं पर ऊर्ध्व स्रोतों का सातवां सर्ग है वह मानुष सर्ग होता है। आठवां अनुग्रह नाम वाला सर्ग हैं ओर वह दो प्रकार का होता है—एक सात्त्विक सर्ग है और दूसरा तामस है ।५७। ये पांच वैकृत अर्थात् विकार से युक्त सर्ग होते हैं और जो प्राकृत सर्ग हैं वे तीन कहे गये हैं। प्राकृत और वैकृत दोनों प्रकार का जो सर्ग है वह नवम कौमार होता है ।५८। प्राकृत तीनों सर्ग बुद्धि पूर्वक हैं। वैकृत सर्ग बुद्धि पूर्व प्रवृत्त होते हैं और उसके वर्ग ब्राह्मण हैं ।५९। जिस प्रकार से ये सब हैं वे सब विस्तार से कीर्त्तित होने वाले हैं उनको समझ लीजिए। वह भी चार प्रकार से स्थित है और पूर्णरूप से समस्त भूतों में है ।६०। विपरीतता से शक्ति से बुद्धि से और सिद्धि से होते हैं। स्थावरों में तो विपर्यास होता है—तिर्यग् योनियों में सूक्ति से होता है ।६१। सिद्धात्मा मनुष्य पूर्णतया देवों में पुष्टि है। इसके उपरान्त ब्रह्माजी ने अपनी आत्मा के ही समान मानस अर्थात् मन से समुत्पन्नों का सृजन किया था ।६२। ये वैवर्त्य ज्ञान के द्वारा महान ओज वाले प्रवृत्ति के अर्थात् सृजन के कार्य से निवृत्त हो गये थे। नाम को भली भांति जानकर वे तीनों अपवृत्त हो गये थे ।६३।
५८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
असृष्ट्वैव प्रजासर्गं प्रतिसर्गं ततस्ततः । ब्रह्मा तेषु व्यरक्तेषु ततोऽन्यान्साधकान्सृजन् ॥६४ स्थानाभिमानिनो देवाः पुनर्ब्रह्मानुशासनम् । अभूतसृष्ट्यवस्था ये स्थानिनस्तान्निबोध मे ॥६५ आपोऽग्निः पृथिवी वायुरन्तरिक्षो दिवं तथा । स्वर्गो दिशः समुद्राश्च नद्यश्चैव वनस्पतीन् ॥६६ ओषधीनां तथात्मानो ह्यात्मनो वृक्षवीरुधाम् । लताः काष्ठाः कलाश्चैव मुहूर्ताः संधिरत्र्यहाः ॥६७ अर्द्धमासाश्च मासाश्च अयनाब्दयुगानि च । स्थाने स्रोतः स्वभीमानाः स्थानाख्याश्चैव ते स्मृताः ॥६८ स्थानात्मनः स सृष्ट्वा तु ततोऽन्यास तदाऽसृजत् । देवांश्चैव पितॄंश्चैव यैरिमा वर्द्धिताः प्रजाः ॥६९ भृगर्वंगिरा मरीचिश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । दक्षोऽत्रिश्च वसिष्ठश्च सोऽसृजन्नव मानसान् ॥७०
प्रजा की सृष्टि को न देखकर ही फिर ब्रह्माजी ने अनन्तर में प्रतिसर्ग की रचना की थी । उनके विरक्त हो जाने पर उन्होंने अन्य साधकों का सृजन किया था ।६४। देवगण अपने स्थान के अभिमान रखने वाले थे । ब्रह्माजी का अनुशासन हुआ । न हुई सृष्टि की अवस्था वाले जो स्थानी थे उनकी ज्ञान आप लोग मुझसे प्राप्त कर लेवें ।६५। जल—अग्नि—पृथिवी—वायु—अन्तरिक्ष—दिव—स्वर्ग—दिशा—समुद्र—नदियाँ—वनस्पति—ओषधियों की आत्मायें—वृक्षों और वीरुधों की आत्मायें—लता—काष्ठा—कला—मुहूर्त्त—सन्धि—रात्रि—दिन—अर्धमास—मास अयन—अब्द—युग-ये स्थान में स्रोतों में अभिमान वाले हैं और वे स्थान नाम से कहे गये हैं ।६६-६८। उन ब्रह्माजी ने स्थानात्मा देखा तो ऐसा सेलोकन करके उनका सृजन करके फिर उस समय में उन्होंने अन्नों का सृजन किया था । उन्होंने देवों की और पितृगणों की सृष्टि की थी जिनके द्वारा ये प्रजायें परिवर्धित हुई थीं ।६९। उन ब्रह्माजी ने अपने मन के द्वारा नौ पुत्रों की सृष्टि की थी । वे नौ ये हैं—भृगु—मरीचि—पुलस्त्य—पुलह---क्रतु-दक्ष-अत्रि और वसिष्ठ । उस समय में इनका सृजन किया था ।७०।
लोककल्पनम् (२) ] [ ५६
नव ब्राह्मणा इत्येते पुराणे निश्चयं गताः । ब्रह्मा यथात्मकानां तु सर्वेषां ब्रह्मयोगिनाम् ॥७१ ततोऽसृजत्पुनर्ब्रह्मा रुद्रं रोषात्मसंभवम् । संकल्पं चैव धर्मं च सर्वेषामेव पर्वतान् ॥७२ सोऽसृजद्व्यवसायं तु ब्रह्मा भूतं सुखात्मकम् । संकल्पाच्चैव संकल्पो जज्ञे सोऽव्यक्तयोनिनः ॥७३ प्राणाहृक्षोऽसृजद्वाचं चक्षुर्भ्यां च मरीचिनम् । भृगुश्च हृदयाज्जज्ञे ऋषिः सलिलयोनिनः ॥७४ शिरसश्चांगिराश्चैव श्रोत्रादत्रिस्तथैव च । पुलस्त्यश्च तथोदानाद्व्यानात्तु पुलहस्तथा ॥७५ समानतो वसिष्ठश्च ह्यपानान्निर्ममे क्रतुम् । इत्येते ब्रह्मण श्रेष्ठाः पुत्रा वै द्वादश स्मृताः ॥७६ धर्मादयः प्रथमजा विज्ञेया ब्रह्मणः स्मृताः । भृग्वादयस्तु ये सृष्टा न च ते ब्रह्मवादिनः ॥७७ गृहमेधिपुराणास्ते विज्ञेया ब्रह्मणः सुताः । द्वादशैते प्रसूयंते सह रुद्रेण च द्विजाः ॥७८
ये नौ ब्रह्मा ही हैं—ऐसा पुराण में निश्चय को प्राप्त हुए थे । इन सब ब्रह्मयोगी आत्मकों का ब्रह्मा के ही समान प्रभाव था ।७१। इसके अनन्तर ब्रह्माजी ने रोष रूपी अपने आत्मज रुद्रदेव का सृजन किया था । सङ्कल्प और धर्म का सृजन किया था और सभी के पर्वतों की रचना की थी ।७२। उन ब्रह्माजी ने व्यवसाय की सृष्टि की थी और ब्रह्मा ने सुखात्मक भूत की रचना की थी । उन्होंने अव्यक्त योगी सङ्कल्प से सङ्कल्प को जन्म दिया था ।७३। दक्ष ने प्राण वाक् का सृजन किया था और चक्षुओं से मरीचि को उत्पन्न किया था । सलिल योगी के हृदय से भृगु ऋषि उत्पन्न हुए थे ।७४। शिर से अङ्गिरा ने जन्म ग्रहण किया था । उदान वायु से पुलस्त्य उत्पन्न हुए व्यान से पुलह का उद्भव हुआ था ।७५। समान नामक वायु से वसिष्ठ ऋषि की उत्पत्ति हुई थी, अपान वायु से क्रतु ने जन्म ग्रहण किया था । ये इतने ब्रह्माजी के परमश्रेष्ठ बारह पुत्र समुत्पन्न हुए थे । हे
६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
द्विजगणो ! ये ब्रह्माजी के द्वादश पुत्र परमश्रेष्ठ हुए थे ॥७६॥ धर्म आदिक प्रथम उत्पन्न होने वाले ब्रह्माजी के पुत्र कहे गये जानने चाहिए । जो भृगु आदि की सृष्टि की गयी थी वे ब्रह्मवादी नहीं थे ॥७७॥ वे गृहमेधी पुराण ब्रह्माजी के पुत्र समझने चाहिए। ये द्वादश रुद्र के साथ प्रसूत होते हैं ॥७८॥
ऋतुः सनत्कुमारश्च द्वावेतावूर्ध्वरेतसौ । पूर्वोत्पन्नौ पुरा ह्य तौ सर्वेषामपि पूर्वजौ ॥७९॥ व्यतीतौ सप्तमे कल्पे पुराणौ लोकसाधकौ । विरजेतेऽत्र वै लोके तेजसाक्षिप्य चात्मनः ॥८०॥ तावुभौ योगधर्म्माणोवारोप्यात्मानमात्मना । प्रजाधर्मं च कामं च वर्तयेते महौजसौ ॥८१॥ यथोत्पन्नस्तथैवेह कुमार इति चोच्यते । ततः सनत्कुमारेति नाम तस्य प्रतिष्ठितम् ॥८२॥ तेषां द्वादश ते वंशा दिव्या देवगणान्विताः । क्रियावन्तः प्रजावन्तो महर्षिभिरलंकृताः ॥८३॥ प्रजांस्तु स दृष्ट्वा वै ब्रह्मा द्वादश सात्विकान् । ततोऽसुरान्पितॄन्द्देवान्मनुष्यांश्चासृजत् प्रभुः ॥८४॥
ऋतु और सनत्कुमार ये दो ब्रह्माजी के पुत्र ऊर्ध्वरेता थे । पूर्व की उत्पत्ति में प्राचीन काल में ये दोनों सबके पूर्व में जन्म ग्रहण करने वाले हुए थे ॥७९॥ प्रथम कल्प में लोक साधक पुराण व्यतीत हो गये थे और इस लोक में आत्मा के तेज से आक्षिप्त होकर विरेजित होते हैं ॥८०॥ योग के धर्म वाले वे दोनों आत्मा से आत्मा का आरोप करके दोनों महान् ओज वाले प्रजा के धर्म को और काम को वर्तित करते हैं ॥८१॥ जैसे ही उत्पन्न हुआ था वैसे ही यहाँ पर कुमार—यह कहा जाया करता है । इसके अनन्तर उसका नाम सनत्कुमार–यह प्रतिष्ठित हुआ था ॥८२॥ उनके द्वादश वंश थे जो परम दिव्य और देवगणों से समन्वित थे । वे सब क्रिया वाले थे और महर्षियों से अलंकृत थे ॥८३॥ उन ब्रह्माजी ने उन बारह सात्विक प्राणजों को देख कर फिर प्रभु ने असुरों को–पितृगणों को–देवों को और मनुष्यों को सृजित किया था ॥८४॥
लोककल्पनम् (२) | [ ६१
मुखाद्देवानजनयत् पितॄंश्चैवाथ वक्षसः।
प्रजननान्मनुष्यांश्च जघनान्निर्ममेऽसुरान् ॥७५
नक्तं सृजन्पुनर्ब्रह्मा ज्योत्स्नाया मानुषात्मनः।
सुधायाश्च पितॄंश्चैव देवदेवः ससर्ज ह ॥८६
मुख्यामुख्यान् सृजन्देवानसुरांश्च ततः पुनः।
मनसश्च मनुष्यांश्च पितृवन्महतः पितॄन् ॥८६
विद्युतोऽशनिमेघांश्च लोहितेंद्रधनूंषि च।
ऋचो यजूंषि सामानि निर्ममे यज्ञसिद्धये ॥८८
उच्चावचानि भूतानि महसस्तस्य जज्ञिरे।
ब्रह्मणस्तु प्रजासर्गं देवर्षिपितृमानवम् ॥८९
पुनः सृजति भूतानि चराणि स्थावराणि च।
यक्षान्पिशाचान् गन्धर्वान्सर्वशोऽप्सरसस्तथा ॥६०
नरकिन्नररक्षांसि वयः पशुमृगोरगान्।
अव्ययं वा व्यमञ्चैव द्वयं स्थावरजङ्गमम् ॥६१
ब्रह्माजी ने अपने मुख से देवगणों को उत्पन्न किया था, अपने वक्षः स्थल से पितृगणों को जन्म ग्रहण कराया था—प्रजनन से मनुष्यों को और जघन से असुरों को निर्मित किया था ।७५। फिर देवताओं के भी देव ब्रह्मा जी ने मानुषात्मा की ज्योत्स्ना से रात्रि का सृजन किया था—सुधा की ओर पितृगणों की सृष्टि की थी ।८६। मुख्य और अमुख्य देवों का और असुरों का सृजन करते हुए इसके अभ्यन्तर मन से मनुष्यों का और पिता के ही समान महान् पितृगणों का सृजन किया था ।८७। विद्युत् की-वज्र की-मेघों की और लोहित इन्द्र धनुषों की-ऋचाओं की अर्थात् ऋग्वेद की-यजुर्वेद की और सामवेद की-यज्ञ की सिद्धि के लिये निर्मित की थी अर्थात् रचना की थी अर्थात् रचना की थी ।८८। ब्रह्मा के तेज से उच्च और अवच प्राणी उत्पन्न हुए थे। प्रजा के सर्ग में देव ऋषि-पितृगण और मानव सभी हुए थे ।८९। फिर उन्होंने प्राणियों का-चरों का और स्थावरों का सृजन किया था यक्ष-पिशाच गन्धर्व और सब प्रकार की अप्सराओं का सृजन करते हैं। ।६०। नर-किन्नर-राक्षस-पक्षी-पशु-मृग और उरगों का सृजन किया करते हैं। अव्यय अथवा व्यय दोनों स्थावरों जंगमों का सृजन करते हैं ।६१।
६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
तेषां ते यांति कर्माणि प्राक् सृष्टानि स्वयंभुवा ।
तान्येव प्रतिपद्यंते सृज्यमानाः पुनः पुनः ॥६२
हिंस्राहिंस्रे मृदुक्रूरे धर्माधमों कृताकृते ।
तेषामेव पृथक् सूतमविभक्तं त्रयं विदुः ॥६३
एतदेवं च नैवं च न चोभे नानुभे तथा ।
कर्म स्वविषयं प्राहुः सत्वस्थाः समदर्शिनः ॥६४
नामात्मपञ्चभूतानां कृतानां च प्रपञ्चताम् ।
दिवशब्देन पञ्चैते निर्ममे स महेश्वरः ॥६५
आर्षाणि चैव नामानि याश्च देवेषु सृष्टयः ।
शर्वर्यां न प्रसूयन्ते पुनस्तेभ्यो दधत्प्रभुः ॥६६
इत्येवं कारणाद्भूतो लोकसर्गः स्वयंभुवः ।
महदाद्या विशेषांन्ता विकाराः प्राकृताः स्वयम् ॥६७
चन्द्रसूर्यप्रभो लोको ग्रहनक्षत्रमण्डितः ।
नदीभिश्च समुद्रैश्च पर्वतैश्च सहस्रशः ॥६८
वे सब उनके कर्मों को प्राप्त होते हैं जिनका कि स्वयम्भूने पूर्व में ही सृजन कर दिया था । बार-बार सृजन को प्राप्त होते हुए उन्हीं कर्मों को प्रतिपन्न हुआ करते हैं ।६२। हिंस्र और अहिंसा वाले, मृदु और क्रूर-धर्म और अधर्म ओर कृत तथा अकृत उनके ही पृथक् उत्पन्न हुए थे । यह अविभक्त तीन जान लीजिए ।६३। यह इस प्रकार से है और इस प्रकार से नहीं है—दोनों ही नहीं हैं और दोनों हैं । सत्व में स्थित समदर्शी अर्थात् सबको एक ही समान देखने वाले अपने विषय को कर्म कहते हैं ।६४। नामात्म पञ्च भूतों की और कृतों की प्रपञ्चता को बनाया था । उन महेश्वर ने दिन शब्द से ये ही पाँच हैं जिसका निर्माण किया था ।६५। देवों में जो सृष्टियां हैं और आर्ष नाम हैं शर्वरी में प्रसूत नहीं होते हैं—फिर प्रभु ने उनके लिए धारण किया था ।६६। यह इसी रीति से स्वयम्भू का कारण से लोकों का सर्ग हुआ था । महत् जिनके आदि में होने वाला है तथा विशेष के अन्त पर्यन्त विकार स्वयं प्राकृत हैं ।६७। चन्द्रमा और सूर्य की प्रभा वाला लोक जो ग्रहों और नक्षत्रों से मण्डित है । जहाँ बहुत नदियाँ हैं—समुद्र है और सहस्रों पर्वत हैं—इन सबसे मण्डित है ।६८।
लोककल्पनम् (२) ] [ ६३
पुरैश्च विविधै रम्यैः स्फीतैर्जनपदैस्तथा । अस्मिन् ब्रह्मवनेऽव्यो ब्रह्मा चरति सर्ववित् ॥६६ अव्यक्तबीजप्रभवस्तस्यैवानुग्रहे स्थितः । बुद्धिस्कन्धमयश्चैव इन्द्रियान्तरकोटरः ॥१०० महाभूतप्रकाशश्च विशेषैः पत्रवांस्तु सः । धर्माधर्मसुपुष्पस्तु सुखदुःखफलोदयः ॥१०१ आजीवः सर्वभूतानां ब्रह्मवृक्षः सनातनः । एतद्ब्रह्मवनं चैव ब्रह्मवृक्षस्य तस्य तत् ॥१०२ अव्यक्तं कारणं यत्र नित्यं सदसदात्मकम् । धानं कृतिं मायां चैवाहुस्तत्त्वचिंतकाः ॥१०३ इत्येषोऽनुग्रहः सर्गो ब्रह्मणैमित्तिकः स्मृतः । अबुद्धिपूर्वकाः सर्गा ब्रह्मणः - कृतास्त्रयः ॥१०४ मुख्यादयस्तु षट् सर्गा वैकृता बुद्धिपूर्वकाः । वैकल्पात्संप्रवर्तंते ब्रह्मणस्तेऽभिमन्यवः ॥१०५
अनेक सुरम्य पुरों से तथा परम स्फीत जनपदों से समलंकृत हैं—इस ब्रह्मवन में सबके ज्ञाता अव्यक्त ब्रह्माजी सञ्चरण किया करते हैं।६६। अव्यक्त के बीज से जो समुत्पत्ति है वह अनेक ही अनुग्रह में स्थित होता हैं। यह एक वृक्ष है—ऐसा ही रूपक यहाँ पर दिया जाता है—इसकी वृद्धि ही स्कन्धों से परिपूर्ण है और अन्य इन्द्रियाँ कोटर हैं।१००। महाभूतों का प्रकाश है और विशेषों से वह पत्रों वाला है। इसके धर्म और अधर्म पुष्प हैं तथा उनका परिणाम रूप सुख और दुःख इसके फलों का उदय है।१०१। यह सनातन अर्थात् सर्वदा से चला जाने वाला ब्रह्म वृक्ष समस्त प्राणियों की आजीव होता है। उस ब्रह्म वृक्ष का यह ब्रह्मवन है।१०२। जहाँ पर सत् और असत् स्वरूप वाला नित्य अव्यक्त ही कारण है। तत्त्वों के चिन्तन करने वाले मनीषी इसको प्रधान-प्रकृति और माया कहा करते हैं।१०३। कृपा से होने वाला इस रीति से यह अनुग्रह सर्ग ब्रह्म के निमित्त वाला कहा गया है। अबुद्धि पूर्वक ब्रह्माजी के तीन सर्ग है जो प्राकृत कहे गये हैं।१०४। मुख्य आदिक छै सर्ग हैं जो प्राकृत न होकर वैकृत कहे जाते हैं और बुद्धि