संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलोककल्पनम् (२) ] [ ६३
पुरैश्च विविधै रम्यैः स्फीतैर्जनपदैस्तथा । अस्मिन् ब्रह्मवनेऽव्यो ब्रह्मा चरति सर्ववित् ॥६६ अव्यक्तबीजप्रभवस्तस्यैवानुग्रहे स्थितः । बुद्धिस्कन्धमयश्चैव इन्द्रियान्तरकोटरः ॥१०० महाभूतप्रकाशश्च विशेषैः पत्रवांस्तु सः । धर्माधर्मसुपुष्पस्तु सुखदुःखफलोदयः ॥१०१ आजीवः सर्वभूतानां ब्रह्मवृक्षः सनातनः । एतद्ब्रह्मवनं चैव ब्रह्मवृक्षस्य तस्य तत् ॥१०२ अव्यक्तं कारणं यत्र नित्यं सदसदात्मकम् । धानं कृतिं मायां चैवाहुस्तत्त्वचिंतकाः ॥१०३ इत्येषोऽनुग्रहः सर्गो ब्रह्मणैमित्तिकः स्मृतः । अबुद्धिपूर्वकाः सर्गा ब्रह्मणः - कृतास्त्रयः ॥१०४ मुख्यादयस्तु षट् सर्गा वैकृता बुद्धिपूर्वकाः । वैकल्पात्संप्रवर्तंते ब्रह्मणस्तेऽभिमन्यवः ॥१०५
अनेक सुरम्य पुरों से तथा परम स्फीत जनपदों से समलंकृत हैं—इस ब्रह्मवन में सबके ज्ञाता अव्यक्त ब्रह्माजी सञ्चरण किया करते हैं।६६। अव्यक्त के बीज से जो समुत्पत्ति है वह अनेक ही अनुग्रह में स्थित होता हैं। यह एक वृक्ष है—ऐसा ही रूपक यहाँ पर दिया जाता है—इसकी वृद्धि ही स्कन्धों से परिपूर्ण है और अन्य इन्द्रियाँ कोटर हैं।१००। महाभूतों का प्रकाश है और विशेषों से वह पत्रों वाला है। इसके धर्म और अधर्म पुष्प हैं तथा उनका परिणाम रूप सुख और दुःख इसके फलों का उदय है।१०१। यह सनातन अर्थात् सर्वदा से चला जाने वाला ब्रह्म वृक्ष समस्त प्राणियों की आजीव होता है। उस ब्रह्म वृक्ष का यह ब्रह्मवन है।१०२। जहाँ पर सत् और असत् स्वरूप वाला नित्य अव्यक्त ही कारण है। तत्त्वों के चिन्तन करने वाले मनीषी इसको प्रधान-प्रकृति और माया कहा करते हैं।१०३। कृपा से होने वाला इस रीति से यह अनुग्रह सर्ग ब्रह्म के निमित्त वाला कहा गया है। अबुद्धि पूर्वक ब्रह्माजी के तीन सर्ग है जो प्राकृत कहे गये हैं।१०४। मुख्य आदिक छै सर्ग हैं जो प्राकृत न होकर वैकृत कहे जाते हैं और बुद्धि