भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तेषां ते यांति कर्माणि प्राक् सृष्टानि स्वयंभुवा ।
तान्येव प्रतिपद्यंते सृज्यमानाः पुनः पुनः ॥६२
हिंस्राहिंस्रे मृदुक्रूरे धर्माधमों कृताकृते ।
तेषामेव पृथक् सूतमविभक्तं त्रयं विदुः ॥६३
एतदेवं च नैवं च न चोभे नानुभे तथा ।
कर्म स्वविषयं प्राहुः सत्वस्थाः समदर्शिनः ॥६४
नामात्मपञ्चभूतानां कृतानां च प्रपञ्चताम् ।
दिवशब्देन पञ्चैते निर्ममे स महेश्वरः ॥६५
आर्षाणि चैव नामानि याश्च देवेषु सृष्टयः ।
शर्वर्यां न प्रसूयन्ते पुनस्तेभ्यो दधत्प्रभुः ॥६६
इत्येवं कारणाद्भूतो लोकसर्गः स्वयंभुवः ।
महदाद्या विशेषांन्ता विकाराः प्राकृताः स्वयम् ॥६७
चन्द्रसूर्यप्रभो लोको ग्रहनक्षत्रमण्डितः ।
नदीभिश्च समुद्रैश्च पर्वतैश्च सहस्रशः ॥६८

वे सब उनके कर्मों को प्राप्त होते हैं जिनका कि स्वयम्भूने पूर्व में ही सृजन कर दिया था । बार-बार सृजन को प्राप्त होते हुए उन्हीं कर्मों को प्रतिपन्न हुआ करते हैं ।६२। हिंस्र और अहिंसा वाले, मृदु और क्रूर-धर्म और अधर्म ओर कृत तथा अकृत उनके ही पृथक् उत्पन्न हुए थे । यह अविभक्त तीन जान लीजिए ।६३। यह इस प्रकार से है और इस प्रकार से नहीं है—दोनों ही नहीं हैं और दोनों हैं । सत्व में स्थित समदर्शी अर्थात् सबको एक ही समान देखने वाले अपने विषय को कर्म कहते हैं ।६४। नामात्म पञ्च भूतों की और कृतों की प्रपञ्चता को बनाया था । उन महेश्वर ने दिन शब्द से ये ही पाँच हैं जिसका निर्माण किया था ।६५। देवों में जो सृष्टियां हैं और आर्ष नाम हैं शर्वरी में प्रसूत नहीं होते हैं—फिर प्रभु ने उनके लिए धारण किया था ।६६। यह इसी रीति से स्वयम्भू का कारण से लोकों का सर्ग हुआ था । महत् जिनके आदि में होने वाला है तथा विशेष के अन्त पर्यन्त विकार स्वयं प्राकृत हैं ।६७। चन्द्रमा और सूर्य की प्रभा वाला लोक जो ग्रहों और नक्षत्रों से मण्डित है । जहाँ बहुत नदियाँ हैं—समुद्र है और सहस्रों पर्वत हैं—इन सबसे मण्डित है ।६८।