भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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लोककल्पनम् (२) | [ ६१

मुखाद्देवानजनयत् पितॄंश्चैवाथ वक्षसः।
प्रजननान्मनुष्यांश्च जघनान्निर्ममेऽसुरान् ॥७५
नक्तं सृजन्पुनर्ब्रह्मा ज्योत्स्नाया मानुषात्मनः।
सुधायाश्च पितॄंश्चैव देवदेवः ससर्ज ह ॥८६
मुख्यामुख्यान् सृजन्देवानसुरांश्च ततः पुनः।
मनसश्च मनुष्यांश्च पितृवन्महतः पितॄन् ॥८६
विद्युतोऽशनिमेघांश्च लोहितेंद्रधनूंषि च।
ऋचो यजूंषि सामानि निर्ममे यज्ञसिद्धये ॥८८
उच्चावचानि भूतानि महसस्तस्य जज्ञिरे।
ब्रह्मणस्तु प्रजासर्गं देवर्षिपितृमानवम् ॥८९
पुनः सृजति भूतानि चराणि स्थावराणि च।
यक्षान्पिशाचान् गन्धर्वान्सर्वशोऽप्सरसस्तथा ॥६०
नरकिन्नररक्षांसि वयः पशुमृगोरगान्।
अव्ययं वा व्यमञ्चैव द्वयं स्थावरजङ्गमम् ॥६१

ब्रह्माजी ने अपने मुख से देवगणों को उत्पन्न किया था, अपने वक्षः स्थल से पितृगणों को जन्म ग्रहण कराया था—प्रजनन से मनुष्यों को और जघन से असुरों को निर्मित किया था ।७५। फिर देवताओं के भी देव ब्रह्मा जी ने मानुषात्मा की ज्योत्स्ना से रात्रि का सृजन किया था—सुधा की ओर पितृगणों की सृष्टि की थी ।८६। मुख्य और अमुख्य देवों का और असुरों का सृजन करते हुए इसके अभ्यन्तर मन से मनुष्यों का और पिता के ही समान महान् पितृगणों का सृजन किया था ।८७। विद्युत् की-वज्र की-मेघों की और लोहित इन्द्र धनुषों की-ऋचाओं की अर्थात् ऋग्वेद की-यजुर्वेद की और सामवेद की-यज्ञ की सिद्धि के लिये निर्मित की थी अर्थात् रचना की थी अर्थात् रचना की थी ।८८। ब्रह्मा के तेज से उच्च और अवच प्राणी उत्पन्न हुए थे। प्रजा के सर्ग में देव ऋषि-पितृगण और मानव सभी हुए थे ।८९। फिर उन्होंने प्राणियों का-चरों का और स्थावरों का सृजन किया था यक्ष-पिशाच गन्धर्व और सब प्रकार की अप्सराओं का सृजन करते हैं। ।६०। नर-किन्नर-राक्षस-पक्षी-पशु-मृग और उरगों का सृजन किया करते हैं। अव्यय अथवा व्यय दोनों स्थावरों जंगमों का सृजन करते हैं ।६१।

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