भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 56

६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

द्विजगणो ! ये ब्रह्माजी के द्वादश पुत्र परमश्रेष्ठ हुए थे ॥७६॥ धर्म आदिक प्रथम उत्पन्न होने वाले ब्रह्माजी के पुत्र कहे गये जानने चाहिए । जो भृगु आदि की सृष्टि की गयी थी वे ब्रह्मवादी नहीं थे ॥७७॥ वे गृहमेधी पुराण ब्रह्माजी के पुत्र समझने चाहिए। ये द्वादश रुद्र के साथ प्रसूत होते हैं ॥७८॥

ऋतुः सनत्कुमारश्च द्वावेतावूर्ध्वरेतसौ । पूर्वोत्पन्नौ पुरा ह्य तौ सर्वेषामपि पूर्वजौ ॥७९॥ व्यतीतौ सप्तमे कल्पे पुराणौ लोकसाधकौ । विरजेतेऽत्र वै लोके तेजसाक्षिप्य चात्मनः ॥८०॥ तावुभौ योगधर्म्माणोवारोप्यात्मानमात्मना । प्रजाधर्मं च कामं च वर्तयेते महौजसौ ॥८१॥ यथोत्पन्नस्तथैवेह कुमार इति चोच्यते । ततः सनत्कुमारेति नाम तस्य प्रतिष्ठितम् ॥८२॥ तेषां द्वादश ते वंशा दिव्या देवगणान्विताः । क्रियावन्तः प्रजावन्तो महर्षिभिरलंकृताः ॥८३॥ प्रजांस्तु स दृष्ट्वा वै ब्रह्मा द्वादश सात्विकान् । ततोऽसुरान्पितॄन्द्‍देवान्मनुष्यांश्चासृजत् प्रभुः ॥८४॥

ऋतु और सनत्कुमार ये दो ब्रह्माजी के पुत्र ऊर्ध्वरेता थे । पूर्व की उत्पत्ति में प्राचीन काल में ये दोनों सबके पूर्व में जन्म ग्रहण करने वाले हुए थे ॥७९॥ प्रथम कल्प में लोक साधक पुराण व्यतीत हो गये थे और इस लोक में आत्मा के तेज से आक्षिप्त होकर विरेजित होते हैं ॥८०॥ योग के धर्म वाले वे दोनों आत्मा से आत्मा का आरोप करके दोनों महान् ओज वाले प्रजा के धर्म को और काम को वर्तित करते हैं ॥८१॥ जैसे ही उत्पन्न हुआ था वैसे ही यहाँ पर कुमार—यह कहा जाया करता है । इसके अनन्तर उसका नाम सनत्कुमार–यह प्रतिष्ठित हुआ था ॥८२॥ उनके द्वादश वंश थे जो परम दिव्य और देवगणों से समन्वित थे । वे सब क्रिया वाले थे और महर्षियों से अलंकृत थे ॥८३॥ उन ब्रह्माजी ने उन बारह सात्विक प्राणजों को देख कर फिर प्रभु ने असुरों को–पितृगणों को–देवों को और मनुष्यों को सृजित किया था ॥८४॥