संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलोककल्पनम् (२) ] [ ५६
नव ब्राह्मणा इत्येते पुराणे निश्चयं गताः । ब्रह्मा यथात्मकानां तु सर्वेषां ब्रह्मयोगिनाम् ॥७१ ततोऽसृजत्पुनर्ब्रह्मा रुद्रं रोषात्मसंभवम् । संकल्पं चैव धर्मं च सर्वेषामेव पर्वतान् ॥७२ सोऽसृजद्व्यवसायं तु ब्रह्मा भूतं सुखात्मकम् । संकल्पाच्चैव संकल्पो जज्ञे सोऽव्यक्तयोनिनः ॥७३ प्राणाहृक्षोऽसृजद्वाचं चक्षुर्भ्यां च मरीचिनम् । भृगुश्च हृदयाज्जज्ञे ऋषिः सलिलयोनिनः ॥७४ शिरसश्चांगिराश्चैव श्रोत्रादत्रिस्तथैव च । पुलस्त्यश्च तथोदानाद्व्यानात्तु पुलहस्तथा ॥७५ समानतो वसिष्ठश्च ह्यपानान्निर्ममे क्रतुम् । इत्येते ब्रह्मण श्रेष्ठाः पुत्रा वै द्वादश स्मृताः ॥७६ धर्मादयः प्रथमजा विज्ञेया ब्रह्मणः स्मृताः । भृग्वादयस्तु ये सृष्टा न च ते ब्रह्मवादिनः ॥७७ गृहमेधिपुराणास्ते विज्ञेया ब्रह्मणः सुताः । द्वादशैते प्रसूयंते सह रुद्रेण च द्विजाः ॥७८
ये नौ ब्रह्मा ही हैं—ऐसा पुराण में निश्चय को प्राप्त हुए थे । इन सब ब्रह्मयोगी आत्मकों का ब्रह्मा के ही समान प्रभाव था ।७१। इसके अनन्तर ब्रह्माजी ने रोष रूपी अपने आत्मज रुद्रदेव का सृजन किया था । सङ्कल्प और धर्म का सृजन किया था और सभी के पर्वतों की रचना की थी ।७२। उन ब्रह्माजी ने व्यवसाय की सृष्टि की थी और ब्रह्मा ने सुखात्मक भूत की रचना की थी । उन्होंने अव्यक्त योगी सङ्कल्प से सङ्कल्प को जन्म दिया था ।७३। दक्ष ने प्राण वाक् का सृजन किया था और चक्षुओं से मरीचि को उत्पन्न किया था । सलिल योगी के हृदय से भृगु ऋषि उत्पन्न हुए थे ।७४। शिर से अङ्गिरा ने जन्म ग्रहण किया था । उदान वायु से पुलस्त्य उत्पन्न हुए व्यान से पुलह का उद्भव हुआ था ।७५। समान नामक वायु से वसिष्ठ ऋषि की उत्पत्ति हुई थी, अपान वायु से क्रतु ने जन्म ग्रहण किया था । ये इतने ब्रह्माजी के परमश्रेष्ठ बारह पुत्र समुत्पन्न हुए थे । हे