भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

असृष्ट्वैव प्रजासर्गं प्रतिसर्गं ततस्ततः । ब्रह्मा तेषु व्यरक्तेषु ततोऽन्यान्साधकान्सृजन् ॥६४ स्थानाभिमानिनो देवाः पुनर्ब्रह्मानुशासनम् । अभूतसृष्ट्यवस्था ये स्थानिनस्तान्निबोध मे ॥६५ आपोऽग्निः पृथिवी वायुरन्तरिक्षो दिवं तथा । स्वर्गो दिशः समुद्राश्च नद्यश्चैव वनस्पतीन् ॥६६ ओषधीनां तथात्मानो ह्यात्मनो वृक्षवीरुधाम् । लताः काष्ठाः कलाश्चैव मुहूर्ताः संधिरत्र्यहाः ॥६७ अर्द्धमासाश्च मासाश्च अयनाब्दयुगानि च । स्थाने स्रोतः स्वभीमानाः स्थानाख्याश्चैव ते स्मृताः ॥६८ स्थानात्मनः स सृष्ट्वा तु ततोऽन्यास तदाऽसृजत् । देवांश्चैव पितॄंश्चैव यैरिमा वर्द्धिताः प्रजाः ॥६९ भृगर्वंगिरा मरीचिश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । दक्षोऽत्रिश्च वसिष्ठश्च सोऽसृजन्नव मानसान् ॥७०

प्रजा की सृष्टि को न देखकर ही फिर ब्रह्माजी ने अनन्तर में प्रतिसर्ग की रचना की थी । उनके विरक्त हो जाने पर उन्होंने अन्य साधकों का सृजन किया था ।६४। देवगण अपने स्थान के अभिमान रखने वाले थे । ब्रह्माजी का अनुशासन हुआ । न हुई सृष्टि की अवस्था वाले जो स्थानी थे उनकी ज्ञान आप लोग मुझसे प्राप्त कर लेवें ।६५। जल—अग्नि—पृथिवी—वायु—अन्तरिक्ष—दिव—स्वर्ग—दिशा—समुद्र—नदियाँ—वनस्पति—ओषधियों की आत्मायें—वृक्षों और वीरुधों की आत्मायें—लता—काष्ठा—कला—मुहूर्त्त—सन्धि—रात्रि—दिन—अर्धमास—मास अयन—अब्द—युग-ये स्थान में स्रोतों में अभिमान वाले हैं और वे स्थान नाम से कहे गये हैं ।६६-६८। उन ब्रह्माजी ने स्थानात्मा देखा तो ऐसा सेलोकन करके उनका सृजन करके फिर उस समय में उन्होंने अन्नों का सृजन किया था । उन्होंने देवों की और पितृगणों की सृष्टि की थी जिनके द्वारा ये प्रजायें परिवर्धित हुई थीं ।६९। उन ब्रह्माजी ने अपने मन के द्वारा नौ पुत्रों की सृष्टि की थी । वे नौ ये हैं—भृगु—मरीचि—पुलस्त्य—पुलह---क्रतु-दक्ष-अत्रि और वसिष्ठ । उस समय में इनका सृजन किया था ।७०।