भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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लोककल्पनम् (२) ] [ ५७

अष्टमोनुग्रहः सर्गः सात्त्विकस्तामसश्च सः ॥५७
पंचैते वैकृताः सर्गाः प्राकृताद्यास्त्रयः स्मृताः ।
प्राकृतो वैकृतश्चैव कौमारो नवमः स्मृतः ॥५८
प्राकृता बुद्धिपूर्वास्तु त्रयः सर्गास्तु वैकृताः ।
बुद्धिपूर्वाः प्रवर्त्तेयुस्तद्वर्गा ब्राह्मणास्तु वै ॥५९
विस्तराच्च यथा सर्वे कीर्त्यमानं निबोधत ।
चतुर्द्धा च स्थितस्सोऽपि सर्वभूतेषु कृत्स्नशः ॥६०
विपर्ययेण शक्त्या च बुद्ध्या सिद्ध्या तथैव च ।
स्थावरेषु विपर्यासस्तिर्यग्योनिषु शक्तितः ॥६१
सिद्धात्मानो मनुष्यास्तु पुष्टिर्देवेषु कृत्स्नशः ।
अथो ससर्ज वै ब्रह्मा मानसानात्मनः समान् ॥६२
वैवर्त्येन तु ज्ञानेन निवृत्तास्ते महौजसः ।
संबुद्धय चैव नामाथो अपवृत्तास्त्रयस्तु ते ॥६३

वहीं पर ऊर्ध्व स्रोतों का सातवां सर्ग है वह मानुष सर्ग होता है। आठवां अनुग्रह नाम वाला सर्ग हैं ओर वह दो प्रकार का होता है—एक सात्त्विक सर्ग है और दूसरा तामस है ।५७। ये पांच वैकृत अर्थात् विकार से युक्त सर्ग होते हैं और जो प्राकृत सर्ग हैं वे तीन कहे गये हैं। प्राकृत और वैकृत दोनों प्रकार का जो सर्ग है वह नवम कौमार होता है ।५८। प्राकृत तीनों सर्ग बुद्धि पूर्वक हैं। वैकृत सर्ग बुद्धि पूर्व प्रवृत्त होते हैं और उसके वर्ग ब्राह्मण हैं ।५९। जिस प्रकार से ये सब हैं वे सब विस्तार से कीर्त्तित होने वाले हैं उनको समझ लीजिए। वह भी चार प्रकार से स्थित है और पूर्णरूप से समस्त भूतों में है ।६०। विपरीतता से शक्ति से बुद्धि से और सिद्धि से होते हैं। स्थावरों में तो विपर्यास होता है—तिर्यग् योनियों में सूक्ति से होता है ।६१। सिद्धात्मा मनुष्य पूर्णतया देवों में पुष्टि है। इसके उपरान्त ब्रह्माजी ने अपनी आत्मा के ही समान मानस अर्थात् मन से समुत्पन्नों का सृजन किया था ।६२। ये वैवर्त्य ज्ञान के द्वारा महान ओज वाले प्रवृत्ति के अर्थात् सृजन के कार्य से निवृत्त हो गये थे। नाम को भली भांति जानकर वे तीनों अपवृत्त हो गये थे ।६३।

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