भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

लक्षणैर्नारकाद्यैस्तैरष्टधा च व्यवस्थिताः । सिद्धात्मानो मनुष्यास्ते गन्धर्वैः सह धर्मिणः ॥५० पञ्चमोऽनुग्रहः सर्गश्चतुर्द्धा स व्यवस्थितः । विपर्ययेण शक्त्या च सिद्धमुख्यास्तथैव च ॥५१ निवृत्ता वर्तमानाश्च प्रजायंते पुनः पुनः । भूतादिकानां सत्त्वानां षष्ठः सर्गः स उच्यते ॥५२ स्वादनाश्चाप्यशीलाश्च ज्ञेया भूतादिकाश्च ते । प्रथमो महतः सर्गो विज्ञेयो ब्रह्मणस्तु सः ॥५३ तन्मात्राणां द्वितीयस्तु भूतसर्गः स उच्यते । वैकारिकस्तृतीयस्तु चैन्द्रियः सर्ग उच्यते ॥५४ इत्येते प्राकृताः सर्गा उत्पन्ना बुद्धिपूर्वकाः । मुख्यसर्गश्चतुर्थस्तु मुख्या वै स्थावराः स्मृताः ॥५५ तिर्यक्स्रोतः ससर्गस्तु तैर्यग्योन्यस्तु पञ्चमः । तथोर्द्ध्वस्रोतसां सर्गः षष्ठो दैवत उच्यते ॥५६

वे नारक आदि लक्षणों से आठ प्रकार से व्यवस्थित होते हैं । वे मनुष्य गन्धर्वोंके साथ धर्म वाले होते हुए सिद्ध आत्मा वाले हैं ।५०। पाँचवाँ अनुग्रह नामक सर्ग है जो चार प्रकार का व्यवस्थित है । विपर्यय से और शक्ति से और शक्ति से उसी भाँति सिद्ध मुख्य हैं ।५१। निवृत्त और वर्तमान बार-बार उत्पन्न हुआ करते हैं । भूतादिक सत्त्वों का जो सर्ग है वह छठा सर्ग कहा जाता है ।५२। और भूतादिक स्वादन और आया शील जानने के योग्य हैं । प्रथम महत् का सर्ग है वह ब्रह्मा का सर्ग तन्मात्राओं का होता है और भूतसर्ग कहा जाया करता है और भूतसर्ग कहा जाया करता है । तीसरा सर्ग वैकारिक है जो इन्द्रिय सर्ग के नाम से पुकारा जाता है ।५४। ये सभी प्राकृत सर्ग हैं जो बुद्धि पूर्वक समुत्पन्न हुए हैं । प्रमुख सर्ग चौथा है और निश्चय ही स्थावर मुख्य कहे गये हैं ।५५। त्रियक् स्रोत तो तिर्यग् योनियों वाला पाँचवां होता है । उसी भाँति ऊर्ध्व स्रोतों का सर्ग छठा है जो दैवत सर्ग के नाम से कहा जाया करता है ।५६।

तत्रोर्द्ध्वस्रोतसां सर्गः सप्तमः स तु मानुषः ।