भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 51

लोककल्पनम् (२) ] [ ५५

ताः सुखं प्रीतिबहुला बहिरंतश्च वावृताः ॥४३ प्रकाशा बहिरंतश्च ऊर्द्ध्वंस्रोतः प्रजाः स्मृताः । नवधातादयस्ते वै तुष्टात्मानो बुधाः स्मृताः ॥४४ ऊर्द्ध्वंस्रोतस्तृतीयो यः स्मृतः सर्व्वः सदैविकः । ऊर्द्ध्वंस्रोतः सु सृष्टेषु देवेषु स तदा प्रभुः ॥४५ प्रीतिमानभवद्ब्रह्मा ततोऽन्यं नाभिमन्यत । सर्गमन्यं सिसृक्षुस्तं साधकं पुनरीश्वरः ॥४६ तस्याभिध्यायतः सर्गं सत्याभिध्यायिनस्तदा । प्रादुर्बभौ भौतसर्गः सोऽर्वाक् स्रोतस्तु साधकः ॥४७ यस्मात्तेर्वाक्प्रवर्त्तंते ततोर्वाक्स्रोतसस्तु ते । ते च प्रकाशबहुलास्तमस्पृष्टरजोधिकाः ॥४८ तस्मात्ते दुःखबहुला भूयोभूयश्च कारिणः । प्रकाशा बहिरंतश्च मनुष्याः साधकाश्च ते ॥४९

कारण यह है कि यह ऊर्ध्वं में रहा था । इसीलिए उसकी ऊर्ध्वं स्रोत संज्ञा होती है । वे सुख पूर्वक बहुत प्रीति पूर्ण थे और बाहर भीतर आवृत्त थे ।४३। बाहिर भीतर रहने वाले प्रकाश ऊर्ध्वं स्रोत प्रजा कहे गये थे । जो नौ धाता आदिक थे वे तुष्ट आत्मा वाले बुध कहे गये हैं ।४४। जो ऊर्ध्वंस्रोत तीसरा कहा गया है वह सब सदैविक है । उस समय में ऊर्ध्वं स्रोतों के सृजन किये जाने पर वह प्रभु प्रसन्न हुए थे ।४५। ब्रह्माजी का मन बहुत प्रीतियुक्त हो गया था और फिर अन्य को नहीं माना था । फिर ईश्वर ने अन्य साधक सर्ग के सृजन की इच्छा की थी ।४६। सर्ग की रचना का अभि-ध्यान करने वाले और उस समय में स्रोत अर्वाक् साधक था ।४७। कारण यह है कि वे अवाक् प्रवृत्त हुआ करते हैं इसी से वे अर्वाक् स्रोत होते हैं इसी से वे अर्वाक् स्रोत होते हैं और उनमें प्रकाश की बहुलता हुआ करती है और तम से स्पर्श किये हुए रजोगुण की अधिकता से युक्त होते हैं ।४८। इस कारण उनमें दुःखों की अधिकता है और पुनः पुनः करने वाले हैं । बाहिर और अन्दर प्रकाश होते हैं और वे मनुष्य साधना करने वाले हैं ।४९।