भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तमोबहुत्वात्ते सर्वे ह्यज्ञानबहुलाः स्मृताः । उत्पाद्यग्राहिणश्चैव तेऽज्ञाने ज्ञानमानिनः ॥३७ अहंकृता अहंमाना अष्टाविंशद्विधात्मिकाः । एकादशेन्द्रियविधा नवधात्मादयस्तथा ॥३८ अष्टौ तु तारकाद्याश्च तेषां शक्तिविधाः स्मृताः । अंतः प्रकाशास्ते सर्वे आवृताश्च बहिः पुनः ॥३९ तिर्यक् स्रोतस उच्यंते वश्यात्मानस्त्रिसंज्ञकाः ॥४० तिर्यक् स्रोतस्तु वै द्वितीयं विश्वमीश्वरः । अभिप्रायमथोद्भूतं दृष्ट्वा सर्गं तथाविधम् ॥४१ तस्याभिध्यायतो योन्यः सात्त्विकः समजायतः । ऊर्ध्वस्रोतस्तृतीयस्तु तद्वै चोर्ध्वं व्यवस्थितम् ॥४२

अभिध्यान करने वाले उनका अन्य एक तिर्यक् स्रोत हुआ था । जिससे तिर्यक् विवर्त्तित होते थे इस कारण से वह फिर तिर्यक् स्रोत कहा गया था ।३६। उस तिर्यक् स्रोत में तमोगुण की अधिकता थी इस कारण से वे सभी बहुत अधिक अज्ञान से समन्वित कहे गये हैं । वे सब उत्पाद्य के ग्राही थे और उस अज्ञान में ही ज्ञान के मानने वाले थे ।३७। वे अहङ्कार से युक्त थे और आत्माहङ्कारी थे । ऐसे वे अट्ठाईस प्रकार के थे । इन द्वादश इन्द्रियों के भेद थे जो कि नेत्र, कान, नासिका, जिह्वा और त्वक्—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं और हाथ, पद, गुदा उपस्थ और जिह्वा—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं और एक मन है । तथा नौ प्रकार के आत्मा हैं ।३८। और आठ तारकादि हैं और उनकी शक्ति के प्रकार कहे गये हैं । वे सब अन्दर में प्रकाश वाले हैं फिर वे बाहिर से समावृत हैं ।३९। तिर्यक् स्रोत कहे जाया करते हैं और वश्यात्मा तीन संज्ञा वाले हैं ।४०। तिर्यक् स्रोत का सृजन करके ईश्वर ने दूसरे विश्व की रचना की थी । इसके अनन्तर उद्भूत अभिप्राय को देखकर अर्थात् उस प्रकार के सर्ग का अवलोकन किया था ।४१। इस तरह से अभिध्यान करने वाले उनके जो अन्त्य सात्त्विक सर्ग समुत्पन्न हुआ था । तीसरा तो ऊर्ध्व स्रोत था और वह निश्चित रूप से ऊपर की ही ओर व्यवस्थित था ।४२।

यस्मादूर्ध्वं न्यवर्त्तत तदूर्ध्वस्रोतसंज्ञकम् ।