भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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लोककल्पनम् (२) ] [ ५३

तस्याभिध्यायतः सर्गं तदा वै बुद्धिपूर्वकम् ॥ ३० प्रधानसमकाले च प्रादुर्भूतस्तमोमयः । तमो मोहो महामोहस्तामिस्रो ह्यन्धसंज्ञितः ॥ ३१ अविद्या पञ्चपर्वैषा प्रादुर्भूता महात्मनः । पञ्चधावस्थित चैव बीजकुम्भलतावृताः ।३२ सर्वतस्तमसा चैव बीजकुम्भलतावृताः । बहिरंतश्चाप्रकाशस्तथानिः संज्ञ एव च ॥ ३३ यस्मात्तेषां कृता बुद्धिर्दुःखानि करणानि च । तस्माच्च संवृतात्मानो नगा मुख्याः प्रकीर्तिताः ॥ ३४ मुख्यसर्गे तदोद्भूतं दृष्ट्वा ब्रह्मात्मसंभवः । अप्रतीतमनाः सोऽथ तदोत्पत्तिममन्मत ॥ ३५

अनेक प्रकार की प्रजाओं का सृजन करने की इच्छा वाले ब्रह्माजी ने जो स्वयम्भू भगवान् हैं अनेक लोकों की कल्पना करके उन्होंने प्रजाओं का सृजन किया था । २६। पहिले कल्प आदि में जो स्वरूप था उसी रूप की सृष्टि का सृजन किया था । उस सृजन का अभिध्यान करते हुए उन्होंने बुद्धि पूर्वक ही सर्ग किया था ।३०। प्रधान के समकाल में तम से पूर्ण प्रादुर्भूत हुआ था । उस तम का मोह-महामोह-तामिस्र और अन्ध-ये संज्ञाएं थीं ।३१। उन महान् आत्मा वाले को पञ्च पर्वा अविद्या प्रादुर्भूत हुई थी अत-एव उन अभिमानी और ध्यान करने वाले ब्रह्माजी का वह सर्ग भी पाँच प्रकार का व्यवस्थित हुआ था ।३२। सभी ओर बीज-कुम्भ और लताएँ तम से आवृत थे और बाहिर तथा अन्दर प्रकाश नहीं था तथा सब निःसंज्ञ था ।३३। जिससे उनकी बुद्धि की गयी थी और दुःख तथा करण हुए थे और उससे संवृत आत्मा वाले नगर मुख्य कहे गये हैं ।३४। अपने आप ही समु-त्पन्न हुए ब्रह्माजी ने उस समय में मुख्य सर्ग में उद्भूत को देखा था और अपने मन में अप्रतीति करने वाले उन्होंने उस समय में उत्पत्ति ही मान लिया था ।३५।

तस्याभिध्यायंतश्चान्यस्तिर्यक्स्रोतोऽभ्यवर्तत । यस्मात्तिर्यग्विवर्त्तत तिर्यक्स्रोतस्ततः स्मृतः ॥ ३६

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