भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

उपगम्या जुहावैता सद्यश्चाद्यसमन्वसत् ।
सामुद्राश्च समुद्रेषु नादेयाश्च नदीषु च ।
पृथक् तास्तु समीकृत्य पृथिव्यां सोऽचिनोद्गिरीन् ॥२४
प्राक्सर्गे दह्यमानास्तु तदा संवर्तकाग्निना ।
तेनाग्निना विलीनास्ते पर्वता भुवि सर्वशः ॥२५
सत्यादेकार्णवे तस्मिन् वायुना यत्तु संहिताः ।
निषिक्ता यत्रयत्रासंस्तत्रतत्राचलोऽभवत् ॥२६
ततस्तेषु प्रकीर्णेषु लोकोदधिगिरींस्तथा ।
विश्वकर्मा विभजते कल्पादिषु पुनः पुनः ॥२७
ससमुद्रामिमां पृथ्वीं सप्तद्वीपां सपर्वताम् ।
भूराद्यांश्चतुरो लोकान्पुनः पुनरकल्पयत् ॥२८

अन्त्र ही उद्गान्त हे—होमलिङ्ग और फलों के बीज महौषधि हैं। बाह्यन्तर आत्मसत्र के हैं तथा नासिका सोमशोणित है ।२२। यज्ञवराहान्त भक्त हैं और फिर जलों में प्रवेश किया था। अग्नि से संच्छादित भूमि को समा चाहते हुए प्रजापति को प्राप्त हुए और वहाँ पहुँच कर इनका हवन किया था तथा मद्य का अद्य सन्यास किया था और सामुद्र समुद्रों में तथा जो नादेय थे वे नदियों ने उन सबको पृथक् सभी कृत करके उन्होंने पृथिवी में गिरियों को चुना था ।२३-२४। पहिले सर्ग में प्रलय काल की संवर्तक अग्नि से जो उस समय में दह्यमान थे । उस अग्नि से सभी ओर भूमि में वे विलीन हो गये थे ।२५। उस एक मात्र रहने वाले समुद्र में सत्य से जो वायु के द्वारा संहित थे । जहाँ-जहाँ पर निषिक्त थे वहाँ-वहाँ पर अचल हो गया था ।२६। उसके अनन्तर उनके प्रकीर्ण होने पर लोक तथा अधि गिरियों को विश्वकर्मा ने कल्पादि में बार-बार विभाजित किया है ।२७। समुद्र से इस पृथ्वी को जो सातों द्वीपों से युक्त और पर्वतों के सहित है । भू आदि चारों लोकों को बार-बार कल्पित किया था ।२८।

लोकान्प्रकल्पयित्वा च प्रजासर्गं ससर्ज ह ।
ब्रह्मा स्वयंभूर्भगवान् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः ॥२६
ससर्ज सृष्टं तद्रूपं कल्पादिषु यथा पुरा ।