संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलोककल्पनम् (२) ] [ ५१
दक्षिणा हृदयो तोगी श्रद्धासत्त्वमयो विभुः । उपाकर्मरुचिश्चैव प्रवर्ग्यावर्तभूषणः ॥१८ नानाछन्दोगतिपथो गुह्योपनिषदासनः । मायापत्नीसहायो वै गिरिशृङ्गमिवोच्छ्रयः ॥१९ अहोरात्रेक्षणधरो वेदांगश्रुतिभूषणः । आज्यगंधः स्रुवस्तुण्डः सामघोषस्वनो महान् ॥२० सत्यधर्ममयः श्रीमान् कर्मविक्रमसत्कृतः । प्रायश्चित्तनखो घोरः पशुजानुर्महामखः ॥२१
हरि भगवान् ने अमित वाराह के रूप को धारण किया था जो अतुल था और पृथिवी के जल से उद्धरण करने के लिए उन्होंने रसातल में प्रवेश किया था । अब वाराह भगवान के स्वरूप को यज्ञ का रूप देते हुए बताया जाता है दीक्षा की समाप्ति इष्टि के दाढ़ों वाले थे । उनके दांत क्रतु था और मुख में आहुति थी । जिह्वा अग्नि थी और उनके रोम दर्भों के समान थे । महान् तपस्वी ब्रह्म शीर्ष था ।१५-१६। वेदों के स्कन्धों वाले तथा हवि की गन्ध से युक्त और हव्य-कव्य आदि के वेग से संयुत है । प्राग्वंश के शरीर वाले—द्युति से युक्त हैं और नाना प्रकार की शिक्षाओं से समन्वित है ।१७। हृदय दक्षिणा है तथा श्रद्धा सत्त्व से परिपूर्ण विभु योगी हैं । उपाकर्म की रुचि वाले और प्रवर्ग्यावित्त भूषण वाले हैं ।१८। अनेक छन्द गति पथ है और गुह्य उपनिषद आसन है । मायारूपिणी पत्नी की सहायता वाले तथा पर्वत की शिखर के समान उच्च है ।१९। अहोरात्र अर्थात् दिन और रात्रि रूपी नेत्रों के धारण करने वाले हैं तथा वेदों के अङ्ग श्रुति वाले हैं । घृत गन्ध वाले हैं—तुण्ड ही स्रुव है तथा सामवेद का घोष ही ध्वनि है जो कि महान है ।२०। श्रीमान् सत्यधर्म से परिपूर्ण है और कर्मों के विक्रम से सत्कृत है । प्रायश्चित्तों के नखों वाले हैं और घोर पशु जानु हैं ऐसा यह महामख है ।२१।
उद्गातांत्रो होमलिंगः फलबीजमहौषधीः । वाय्वंतरात्मसत्रस्य नासिकासोमशोणितः ॥२२ भक्ता यज्ञराहांताश्चापः संश्राविशत्पुनः । अग्निसंछादितां भूमि समामिच्छन्प्रजापतिम् ॥२३