संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
दशयोजनविस्तीर्णमायतं शतयोजनम् । नीलमेघप्रतीकाशं मेघस्तनितनिःस्वनम् ॥१२ महापर्वतवर्ष्माणं श्वेततीक्ष्णोग्रदंष्ट्रिणम् । विद्युदग्निप्रतीकाशमादित्यसमतेजसम् ॥१३ पीनवृत्तायतस्कन्धं विष्णुविक्रमगामि च । पीनोन्नतकटीदेशं वृषलक्षणपूजितम् ॥१४
इसके उपरान्त उस जल में अन्तर्गत में महत् का ज्ञान प्राप्त किया था भूमिका उद्धारण करने के विषय में मूढ़ता से रहित उन्होंने अनुमान किया था ।८। इसके पश्चात् अन्य ओंकाराष्ट तनु का जैसे पहिले कल्पों के आदि में था उन महात्मा ने मन में ही उस दिव्य स्वरूप का चिन्तन किया था ।९। उस विशाल जल की राशि में उन्होंने डूबी हुई भूमि को देखकर भली भाँति चिन्तन किया था कि क्या स्वरूप धारण करके मैं इस भूमि का जल से उद्धार करूँ ।१०। जल में क्रीड़ा करना बहुत ही उचित है । इस तरह से उन्होंने वाराह के रूप का स्मरण किया था । जो कि समस्त प्राणियों के द्वारा न देखने के योग्य है और वाङ्मय ब्रह्म की संज्ञा वाला है ।११। उसका विस्तार दश योजन का था उसकी चौड़ाई अर्थात् फैलाव सौ योजन था । नीले मेघ के समान उसका वर्ण था और मेघ के गर्जन के सदृश ध्वनि थी ।१२। एक विशाल पर्वत के तुल्य उसका शरीर था और उसकी दाढ़ें श्वेत एवं उग्र और तीक्ष्ण थीं । बिजली की अग्नि जैसी होती है उसी प्रकार चमक थी तथा सूर्य के समान उसमें तेज था ।१३। मोटे और चौड़े स्कन्ध थे और भगवान् विष्णु के विक्रम से गमनशील थे । उसकी कटि का भाग स्थूल और ऊँचा था । वह वृष के लक्षणों से पूजित था ।१४।
आस्थाय रूपमतुलं वाराहममितं हरिः । पृथिव्युद्धरणार्थाय प्रविवेश रसातलम् ॥१५ दीक्षासमाप्तीष्टिदंष्ट्रः क्रतुदंतो जुहूमुखः । अग्निजिह्वो दर्भरोमा ब्रह्मशीर्षो महातपाः ॥१६ वेदस्कन्धो हविर्गन्धिर्हव्यकव्यादिवेगवान् । प्राग्वंशकायो द्युतिमान् नानादीक्षाभिरन्वितः ॥१७