संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलोककल्पनम् (२) ] [ ४६
स्वर्णपत्रे प्रकुरुते ब्रह्मत्वाददर्शकारणात् ॥ ६ ब्रह्मा तु सलिले तस्मिन्नवाग् भूत्वा तदा चरत् । निशायामिव खद्योतः प्रावृट्काले ततस्ततः ॥ ७
श्रीसूतजी ने कहा—इस पृथिवी तत्व में सबसे पूर्व जल ही जल सर्वत्र था और यह शील तथा प्रलीन था । इसमें उस समय कुछ भी नहीं जाना जाता था । १। केवल एक समुद्र ही था और उस सागर में सभी स्थावर (अचर) और जङ्गम (चर) नष्ट हो गये थे । विभु (व्यापक) वह ब्रह्मा जी उस समय में सहस्रों पादों और नेत्रों वाले हो जाया करते हैं । २। सहस्रों शीर्षों वाले, सुवर्ण के समान जिनका वर्ण था और जो इन्द्रियों की पहुँच से परे थे अर्थात् अप्रत्यक्ष थे ऐसे पुरुष नारायण नाम वाले ब्रह्मा उस समय में समुद्र में शयन कर रहे थे । ३। सत्व के उद्रेक से निषिद्ध होते हुए उन्होंने उस समय में इस लोक को शून्य देखा था । यहाँ पर भगवान् नारायण के विषय में इन निम्न लिखित श्लोक को उदाहृत किया करते हैं । ४। जलों को नारा कहा गया है और ये जल ही नर के आत्मज हैं । वे जल ही उन नारायण प्रभु के निवास स्थान है अतएव प्रभु का नाम नारायण कहा गया है । ५। सहस्रों युगों के तुल्य काल तक वे प्रभु वहाँ पर निवास करते हुए स्थित रहे थे । ब्रह्मत्व के अदर्शन के कारण से वे स्वर्ण पत्र किया करते हैं । ६। उस जल में ब्रह्माजी अवाक् होकर उस समय में विचरण कर रहे थे जिस तरह से वर्षा ऋतु में रात्रि में खद्योत चमकता हुआ यहाँ से वहाँ घूमा करता है । ७।
ततस्तु सलिले तस्मिन् विज्ञायांतर्गते महत् । अनुमानादसंमूढो भूमेरुद्धरणं प्रति ॥ ८ ॐकाराष्टतनुं त्वन्यां कल्पादिषु यथा पुरा । ततो महात्मा मनसा दिव्यरूपमचिंतयत् ॥ ९ सलिलेऽवप्लुतां भूमिं दृष्ट्वा स समचिंतयत् । किं तु रूपमहं कृत्वा सलिलादुद्धरे महीम् ॥ १० जलक्रीडासमुचितं वाराहं रूपमस्मरत् । अदृश्यं सर्वभूतानां वाङ्मयं ब्रह्मसंज्ञितम् ॥ ११