संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
यत्स्वयं वर्त्तते कल्पो वाराहस्तन्निबोधत ।
प्रथमं सांप्रतस्तेषां कल्पो वै वर्त्तते च यः ॥३३
पूर्णे युगसहस्रे तु परिपाल्यं नरेश्वरैः ॥३४
क्योंकि यह सबसे आदि काल में होने वाले हैं । अतएव यह स्ववशी हैं अर्थात् अपने ही वश में रहने वाले हैं ऐसा ही कहा गया है । उसी कारण से पुराणों में इनको हिरण्यगर्भ कहा जाया करता है ।२९। जो स्वयम्भुव है वह निवृत्त का वर्षों में अग्रकाल है । इसकी परिसंख्या मनु के सैकड़ों वर्षों में भी नहीं की जा सकती है ।३०। कल्पों की संख्या से निवृत्त ब्रह्मा का परार्ध कहा गया है । उतने ही में इसका वह काल है उसके अन्त में अन्य काल प्रतिबुद्ध होता है ।३१। करोड़ों सहस्र वर्ष जो कि इसके गृहभूत हैं । उतने कल्पों के समतीत हैं और जो शेष हैं वे दूसरे हैं ।३२। जो स्वयं कल्प है वह वाराह कल्प है—ऐसा ही समझ लो । प्रथम उनमें साम्प्रत है और जो कल्प होता है ।३३। एक सहस्र युगों के पूर्ण हो जाने पर नरेश्वरों के द्वारा परिपालन के योग्य है ।३४।
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॥ लोककल्पनम् (२) ॥
सूत उवाच—आपोऽग्रे सर्वगा आसन्नेतस्मिन्पृथिवीतले ।
शांतवातेः प्रलीनेऽस्मिन्न प्राज्ञायत किंचन ॥१
एकार्णवे तदा तस्मिन्नष्टे स्थावरजङ्गमे ।
विभुर्भवति स ब्रह्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥२
सहस्रशीर्षा पुरुषो रुक्मवर्णो ह्यतीन्द्रियः ।
ब्रह्म नारायणाख्यस्तु सुष्वाप सलिले तदा ॥३
सत्त्वोद्रेकान्निषिद्धस्तु शून्यं लोकमवेक्षत ।
इमं चोदाहरंत्यत्र श्लोकं नारायणं प्रति ॥४
आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः ।
अयनं तस्य ताः प्रोक्तास्तेन नारायणः स्मृतः ॥५
तुल्यं युगसहस्रस्य वसन्कालमुपास्यतः ।