संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलोक वर्णनम् (१) ] [ ४७
सर्वज्ञः सर्वविज्ञानात्सर्वः सर्वं यतस्ततः ॥२६ नराणां स्वापनं ब्रह्मा तस्मान्नारायणः स्मृतः । त्रिधा विभज्य चात्मानं सकलः संप्रवर्त्तते ॥२७ सृजते ग्रसते चैव पाल्यते च त्रिभिः स्वयम् । सोऽग्रे हिरण्यगर्भः सन् प्रादुर्भूतः स्वयं प्रभुः ॥२८
अनेक क्रिया-आकार और स्वरूप का आश्रय ग्रहण किया करते हैं और यह सब अपनी ही लीला से करते रहा करते हैं । लोक में यह तीन प्रकार वाले होकर रहते हैं इसी कारण से इनको त्रिगुण कहा जाता है ।२२। चार प्रकार से प्रविभक्त होने से यह चतुर्व्यूह कहा गया है । जिस समय में यह शयन किया करते हैं उस समय में बह अर्धन्त होते हैं प्रभु विषयों का भोग किया करते हैं ।२३। जो स्वस्थ होते हैं तब निरन्तर भाव होता है । इसी से आत्मा कहा जाता है और ऋषि इसमें सर्वगत हैं । वह शरीर में आते हैं ।२४। भगवान् विष्णु सबके स्वामी हैं क्योंकि विष्णु का सभी में प्रवेश होता है । भगवान् अप्रसद्भावसे नाग हैं और नाग का संश्रय नहीं होता है ।२५। संप्रहृष्ट होने से परम है और देवता होने से ओम् यह स्मृति है । सबके विज्ञान होने से यह सर्वज्ञ हैं क्योंकि यह सबमें हैं अतएव यह सर्व कहा जाता है ।२६। नरों में अर्थात् जलों में यह स्वपन किया करते हैं इस कारण से ब्रह्माजी नारायण कहे गये हैं और अपने आपके स्वरूप को तीन प्रकार से विभक्त करके यह सकल से संप्रवृत्त हुआ करते हैं ।२७। इन तीनों स्वरूपों से यह लोकों का सृजन पालन और क्रम से ग्रसन किया करते हैं । वही सबसे आगे हिरण्यगर्भ होते हुए स्वयं प्रादुर्भूत हुए हैं ।२८।
आद्यो हि स्ववशश्चैव अजातत्वादजः स्मृतः । तस्माद्धिरण्यगर्भश्च पुराणेषु निरुच्यते ॥२९ स्वयंभुवो निवृत्तस्य कालो वर्णग्रितस्तु यः । न शक्यः परिसंख्यातुं मनुवर्षशतैरपि ॥३० कल्पसंख्यानिवृत्तस्तु परार्धो ब्रह्मणः स्मृतः । तावत्त्वे सोऽस्य कालोऽन्यस्तस्यांते प्रतिबुद्ध्यते ॥३१ कोटिवर्षसहस्राणि गृहभूतानि यानि च । समतीतानि कल्पानां तावच्छेषात्परे तु ये ॥३२