संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
एकधा स द्विधा चैव त्रिधा च बहुधा पुनः । योगीश्वरः शरीराणि करोति विकरोति च ॥२१
वह प्रथम ही शरीर था जो कि धारणत्व से व्यवस्थित था। यहाँ पर अनुपम ज्ञान से और वैराग्य से सप्तति था। इसके अव्यक्तता के लिए उस मन से वह जो-जो भी इच्छा करता था वही करता था क्योंकि इसके तीनों गुण वश में किये हुए थे और भाव से वे एक दूसरे की अपेक्षा करने वाले थे ।१५-१६। चतुर्मुख ब्रह्मत्व को प्राप्त किया था और अन्त करनेवाले पुरुष हुए। इस प्रकार से स्वयम्भू की ही ये तीन अवस्थाएँ थीं। १७। ब्रह्मत्व की दशा में सब रजोगुण है और काल की अवस्था में रजोगुण और तमोगुण होता है। जब पुरुष की दशा में यह होते हैं तो तत्वगुण के युक्त होते हैं। इस प्रकार से स्वयम्भू में गुणों की वृत्ति होती है ।१८। जब ब्रह्मा की दशा में यह रहते हैं तो यह लोकों का सृजन किया करते हैं। जब काल का स्वरूप धारण किया करते हैं तो उन सभी लोकों का संक्षय करते हैं। जब केवल पुरुष की दशा में होते हैं तो यह उदासीन रहते हैं। ऐसे स्वयम्भू की ही ये तीन भिन्न-भिन्न अवस्थाएँ हुआ करती हैं ।१९। ब्रह्मा कमल के दलों के समान नेत्रों वाले होते हैं और काल का जब उनका स्वरूप होता है तो अञ्जन के समान कृष्ण वर्ण होता है। जब उदासीन पुरुष के रूप में होते हैं तो यह परमात्मा के स्वरूप से पुण्डरीकाक्ष होते हैं ।२०। एक प्रकार से—दो प्रकार से—तीन प्रकार से फिर बहुत प्रकार से योगीश्वर प्रभु अनेक शरीरों को बनाया करते हैं और बदलते रहा करते हैं ।२१।
नानाकृतिक्रियारूपमाश्रयंति स्वलीलया । त्रिधा यद्वर्त्तते लोके तस्मात्त्रिगुण उच्यते ॥२२ चतुर्द्धा प्रविभक्तत्वाच्चतुर्व्यूहः प्रकीर्तितः । यदा शेते तदार्धाते यद्भक्ते विषयान्प्रभुः ॥२३ यत्स्वस्थाः सततं भावस्तस्मादात्मा निरुच्यते । ऋषिः सर्वगतश्चात्र शरीरे सोऽभ्ययात्प्रभुः ॥२४ स्वामी सर्वस्य यत्सर्वं विष्णुः सर्वप्रवेशनात् । भगवानग्रसद्भावान्नागो नागस्वसंश्रयात् ॥२५ परमः संप्रहृष्टत्वाद्वैवतादोमिति स्मृतिः ।