संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
लोककल्पनम् (२) ] [ ५१
दक्षिणा हृदयो तोगी श्रद्धासत्त्वमयो विभुः । उपाकर्मरुचिश्चैव प्रवर्ग्यावर्तभूषणः ॥१८ नानाछन्दोगतिपथो गुह्योपनिषदासनः । मायापत्नीसहायो वै गिरिशृङ्गमिवोच्छ्रयः ॥१९ अहोरात्रेक्षणधरो वेदांगश्रुतिभूषणः । आज्यगंधः स्रुवस्तुण्डः सामघोषस्वनो महान् ॥२० सत्यधर्ममयः श्रीमान् कर्मविक्रमसत्कृतः । प्रायश्चित्तनखो घोरः पशुजानुर्महामखः ॥२१
हरि भगवान् ने अमित वाराह के रूप को धारण किया था जो अतुल था और पृथिवी के जल से उद्धरण करने के लिए उन्होंने रसातल में प्रवेश किया था । अब वाराह भगवान के स्वरूप को यज्ञ का रूप देते हुए बताया जाता है दीक्षा की समाप्ति इष्टि के दाढ़ों वाले थे । उनके दांत क्रतु था और मुख में आहुति थी । जिह्वा अग्नि थी और उनके रोम दर्भों के समान थे । महान् तपस्वी ब्रह्म शीर्ष था ।१५-१६। वेदों के स्कन्धों वाले तथा हवि की गन्ध से युक्त और हव्य-कव्य आदि के वेग से संयुत है । प्राग्वंश के शरीर वाले—द्युति से युक्त हैं और नाना प्रकार की शिक्षाओं से समन्वित है ।१७। हृदय दक्षिणा है तथा श्रद्धा सत्त्व से परिपूर्ण विभु योगी हैं । उपाकर्म की रुचि वाले और प्रवर्ग्यावित्त भूषण वाले हैं ।१८। अनेक छन्द गति पथ है और गुह्य उपनिषद आसन है । मायारूपिणी पत्नी की सहायता वाले तथा पर्वत की शिखर के समान उच्च है ।१९। अहोरात्र अर्थात् दिन और रात्रि रूपी नेत्रों के धारण करने वाले हैं तथा वेदों के अङ्ग श्रुति वाले हैं । घृत गन्ध वाले हैं—तुण्ड ही स्रुव है तथा सामवेद का घोष ही ध्वनि है जो कि महान है ।२०। श्रीमान् सत्यधर्म से परिपूर्ण है और कर्मों के विक्रम से सत्कृत है । प्रायश्चित्तों के नखों वाले हैं और घोर पशु जानु हैं ऐसा यह महामख है ।२१।
उद्गातांत्रो होमलिंगः फलबीजमहौषधीः । वाय्वंतरात्मसत्रस्य नासिकासोमशोणितः ॥२२ भक्ता यज्ञराहांताश्चापः संश्राविशत्पुनः । अग्निसंछादितां भूमि समामिच्छन्प्रजापतिम् ॥२३
५२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
उपगम्या जुहावैता सद्यश्चाद्यसमन्वसत् ।
सामुद्राश्च समुद्रेषु नादेयाश्च नदीषु च ।
पृथक् तास्तु समीकृत्य पृथिव्यां सोऽचिनोद्गिरीन् ॥२४
प्राक्सर्गे दह्यमानास्तु तदा संवर्तकाग्निना ।
तेनाग्निना विलीनास्ते पर्वता भुवि सर्वशः ॥२५
सत्यादेकार्णवे तस्मिन् वायुना यत्तु संहिताः ।
निषिक्ता यत्रयत्रासंस्तत्रतत्राचलोऽभवत् ॥२६
ततस्तेषु प्रकीर्णेषु लोकोदधिगिरींस्तथा ।
विश्वकर्मा विभजते कल्पादिषु पुनः पुनः ॥२७
ससमुद्रामिमां पृथ्वीं सप्तद्वीपां सपर्वताम् ।
भूराद्यांश्चतुरो लोकान्पुनः पुनरकल्पयत् ॥२८
अन्त्र ही उद्गान्त हे—होमलिङ्ग और फलों के बीज महौषधि हैं। बाह्यन्तर आत्मसत्र के हैं तथा नासिका सोमशोणित है ।२२। यज्ञवराहान्त भक्त हैं और फिर जलों में प्रवेश किया था। अग्नि से संच्छादित भूमि को समा चाहते हुए प्रजापति को प्राप्त हुए और वहाँ पहुँच कर इनका हवन किया था तथा मद्य का अद्य सन्यास किया था और सामुद्र समुद्रों में तथा जो नादेय थे वे नदियों ने उन सबको पृथक् सभी कृत करके उन्होंने पृथिवी में गिरियों को चुना था ।२३-२४। पहिले सर्ग में प्रलय काल की संवर्तक अग्नि से जो उस समय में दह्यमान थे । उस अग्नि से सभी ओर भूमि में वे विलीन हो गये थे ।२५। उस एक मात्र रहने वाले समुद्र में सत्य से जो वायु के द्वारा संहित थे । जहाँ-जहाँ पर निषिक्त थे वहाँ-वहाँ पर अचल हो गया था ।२६। उसके अनन्तर उनके प्रकीर्ण होने पर लोक तथा अधि गिरियों को विश्वकर्मा ने कल्पादि में बार-बार विभाजित किया है ।२७। समुद्र से इस पृथ्वी को जो सातों द्वीपों से युक्त और पर्वतों के सहित है । भू आदि चारों लोकों को बार-बार कल्पित किया था ।२८।
लोकान्प्रकल्पयित्वा च प्रजासर्गं ससर्ज ह ।
ब्रह्मा स्वयंभूर्भगवान् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः ॥२६
ससर्ज सृष्टं तद्रूपं कल्पादिषु यथा पुरा ।
लोककल्पनम् (२) ] [ ५३
तस्याभिध्यायतः सर्गं तदा वै बुद्धिपूर्वकम् ॥ ३० प्रधानसमकाले च प्रादुर्भूतस्तमोमयः । तमो मोहो महामोहस्तामिस्रो ह्यन्धसंज्ञितः ॥ ३१ अविद्या पञ्चपर्वैषा प्रादुर्भूता महात्मनः । पञ्चधावस्थित चैव बीजकुम्भलतावृताः ।३२ सर्वतस्तमसा चैव बीजकुम्भलतावृताः । बहिरंतश्चाप्रकाशस्तथानिः संज्ञ एव च ॥ ३३ यस्मात्तेषां कृता बुद्धिर्दुःखानि करणानि च । तस्माच्च संवृतात्मानो नगा मुख्याः प्रकीर्तिताः ॥ ३४ मुख्यसर्गे तदोद्भूतं दृष्ट्वा ब्रह्मात्मसंभवः । अप्रतीतमनाः सोऽथ तदोत्पत्तिममन्मत ॥ ३५
अनेक प्रकार की प्रजाओं का सृजन करने की इच्छा वाले ब्रह्माजी ने जो स्वयम्भू भगवान् हैं अनेक लोकों की कल्पना करके उन्होंने प्रजाओं का सृजन किया था । २६। पहिले कल्प आदि में जो स्वरूप था उसी रूप की सृष्टि का सृजन किया था । उस सृजन का अभिध्यान करते हुए उन्होंने बुद्धि पूर्वक ही सर्ग किया था ।३०। प्रधान के समकाल में तम से पूर्ण प्रादुर्भूत हुआ था । उस तम का मोह-महामोह-तामिस्र और अन्ध-ये संज्ञाएं थीं ।३१। उन महान् आत्मा वाले को पञ्च पर्वा अविद्या प्रादुर्भूत हुई थी अत-एव उन अभिमानी और ध्यान करने वाले ब्रह्माजी का वह सर्ग भी पाँच प्रकार का व्यवस्थित हुआ था ।३२। सभी ओर बीज-कुम्भ और लताएँ तम से आवृत थे और बाहिर तथा अन्दर प्रकाश नहीं था तथा सब निःसंज्ञ था ।३३। जिससे उनकी बुद्धि की गयी थी और दुःख तथा करण हुए थे और उससे संवृत आत्मा वाले नगर मुख्य कहे गये हैं ।३४। अपने आप ही समु-त्पन्न हुए ब्रह्माजी ने उस समय में मुख्य सर्ग में उद्भूत को देखा था और अपने मन में अप्रतीति करने वाले उन्होंने उस समय में उत्पत्ति ही मान लिया था ।३५।
तस्याभिध्यायंतश्चान्यस्तिर्यक्स्रोतोऽभ्यवर्तत । यस्मात्तिर्यग्विवर्त्तत तिर्यक्स्रोतस्ततः स्मृतः ॥ ३६
५४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
तमोबहुत्वात्ते सर्वे ह्यज्ञानबहुलाः स्मृताः । उत्पाद्यग्राहिणश्चैव तेऽज्ञाने ज्ञानमानिनः ॥३७ अहंकृता अहंमाना अष्टाविंशद्विधात्मिकाः । एकादशेन्द्रियविधा नवधात्मादयस्तथा ॥३८ अष्टौ तु तारकाद्याश्च तेषां शक्तिविधाः स्मृताः । अंतः प्रकाशास्ते सर्वे आवृताश्च बहिः पुनः ॥३९ तिर्यक् स्रोतस उच्यंते वश्यात्मानस्त्रिसंज्ञकाः ॥४० तिर्यक् स्रोतस्तु वै द्वितीयं विश्वमीश्वरः । अभिप्रायमथोद्भूतं दृष्ट्वा सर्गं तथाविधम् ॥४१ तस्याभिध्यायतो योन्यः सात्त्विकः समजायतः । ऊर्ध्वस्रोतस्तृतीयस्तु तद्वै चोर्ध्वं व्यवस्थितम् ॥४२
अभिध्यान करने वाले उनका अन्य एक तिर्यक् स्रोत हुआ था । जिससे तिर्यक् विवर्त्तित होते थे इस कारण से वह फिर तिर्यक् स्रोत कहा गया था ।३६। उस तिर्यक् स्रोत में तमोगुण की अधिकता थी इस कारण से वे सभी बहुत अधिक अज्ञान से समन्वित कहे गये हैं । वे सब उत्पाद्य के ग्राही थे और उस अज्ञान में ही ज्ञान के मानने वाले थे ।३७। वे अहङ्कार से युक्त थे और आत्माहङ्कारी थे । ऐसे वे अट्ठाईस प्रकार के थे । इन द्वादश इन्द्रियों के भेद थे जो कि नेत्र, कान, नासिका, जिह्वा और त्वक्—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं और हाथ, पद, गुदा उपस्थ और जिह्वा—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं और एक मन है । तथा नौ प्रकार के आत्मा हैं ।३८। और आठ तारकादि हैं और उनकी शक्ति के प्रकार कहे गये हैं । वे सब अन्दर में प्रकाश वाले हैं फिर वे बाहिर से समावृत हैं ।३९। तिर्यक् स्रोत कहे जाया करते हैं और वश्यात्मा तीन संज्ञा वाले हैं ।४०। तिर्यक् स्रोत का सृजन करके ईश्वर ने दूसरे विश्व की रचना की थी । इसके अनन्तर उद्भूत अभिप्राय को देखकर अर्थात् उस प्रकार के सर्ग का अवलोकन किया था ।४१। इस तरह से अभिध्यान करने वाले उनके जो अन्त्य सात्त्विक सर्ग समुत्पन्न हुआ था । तीसरा तो ऊर्ध्व स्रोत था और वह निश्चित रूप से ऊपर की ही ओर व्यवस्थित था ।४२।
यस्मादूर्ध्वं न्यवर्त्तत तदूर्ध्वस्रोतसंज्ञकम् ।
लोककल्पनम् (२) ] [ ५५
ताः सुखं प्रीतिबहुला बहिरंतश्च वावृताः ॥४३ प्रकाशा बहिरंतश्च ऊर्द्ध्वंस्रोतः प्रजाः स्मृताः । नवधातादयस्ते वै तुष्टात्मानो बुधाः स्मृताः ॥४४ ऊर्द्ध्वंस्रोतस्तृतीयो यः स्मृतः सर्व्वः सदैविकः । ऊर्द्ध्वंस्रोतः सु सृष्टेषु देवेषु स तदा प्रभुः ॥४५ प्रीतिमानभवद्ब्रह्मा ततोऽन्यं नाभिमन्यत । सर्गमन्यं सिसृक्षुस्तं साधकं पुनरीश्वरः ॥४६ तस्याभिध्यायतः सर्गं सत्याभिध्यायिनस्तदा । प्रादुर्बभौ भौतसर्गः सोऽर्वाक् स्रोतस्तु साधकः ॥४७ यस्मात्तेर्वाक्प्रवर्त्तंते ततोर्वाक्स्रोतसस्तु ते । ते च प्रकाशबहुलास्तमस्पृष्टरजोधिकाः ॥४८ तस्मात्ते दुःखबहुला भूयोभूयश्च कारिणः । प्रकाशा बहिरंतश्च मनुष्याः साधकाश्च ते ॥४९
कारण यह है कि यह ऊर्ध्वं में रहा था । इसीलिए उसकी ऊर्ध्वं स्रोत संज्ञा होती है । वे सुख पूर्वक बहुत प्रीति पूर्ण थे और बाहर भीतर आवृत्त थे ।४३। बाहिर भीतर रहने वाले प्रकाश ऊर्ध्वं स्रोत प्रजा कहे गये थे । जो नौ धाता आदिक थे वे तुष्ट आत्मा वाले बुध कहे गये हैं ।४४। जो ऊर्ध्वंस्रोत तीसरा कहा गया है वह सब सदैविक है । उस समय में ऊर्ध्वं स्रोतों के सृजन किये जाने पर वह प्रभु प्रसन्न हुए थे ।४५। ब्रह्माजी का मन बहुत प्रीतियुक्त हो गया था और फिर अन्य को नहीं माना था । फिर ईश्वर ने अन्य साधक सर्ग के सृजन की इच्छा की थी ।४६। सर्ग की रचना का अभि-ध्यान करने वाले और उस समय में स्रोत अर्वाक् साधक था ।४७। कारण यह है कि वे अवाक् प्रवृत्त हुआ करते हैं इसी से वे अर्वाक् स्रोत होते हैं इसी से वे अर्वाक् स्रोत होते हैं और उनमें प्रकाश की बहुलता हुआ करती है और तम से स्पर्श किये हुए रजोगुण की अधिकता से युक्त होते हैं ।४८। इस कारण उनमें दुःखों की अधिकता है और पुनः पुनः करने वाले हैं । बाहिर और अन्दर प्रकाश होते हैं और वे मनुष्य साधना करने वाले हैं ।४९।
५६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
लक्षणैर्नारकाद्यैस्तैरष्टधा च व्यवस्थिताः । सिद्धात्मानो मनुष्यास्ते गन्धर्वैः सह धर्मिणः ॥५० पञ्चमोऽनुग्रहः सर्गश्चतुर्द्धा स व्यवस्थितः । विपर्ययेण शक्त्या च सिद्धमुख्यास्तथैव च ॥५१ निवृत्ता वर्तमानाश्च प्रजायंते पुनः पुनः । भूतादिकानां सत्त्वानां षष्ठः सर्गः स उच्यते ॥५२ स्वादनाश्चाप्यशीलाश्च ज्ञेया भूतादिकाश्च ते । प्रथमो महतः सर्गो विज्ञेयो ब्रह्मणस्तु सः ॥५३ तन्मात्राणां द्वितीयस्तु भूतसर्गः स उच्यते । वैकारिकस्तृतीयस्तु चैन्द्रियः सर्ग उच्यते ॥५४ इत्येते प्राकृताः सर्गा उत्पन्ना बुद्धिपूर्वकाः । मुख्यसर्गश्चतुर्थस्तु मुख्या वै स्थावराः स्मृताः ॥५५ तिर्यक्स्रोतः ससर्गस्तु तैर्यग्योन्यस्तु पञ्चमः । तथोर्द्ध्वस्रोतसां सर्गः षष्ठो दैवत उच्यते ॥५६
वे नारक आदि लक्षणों से आठ प्रकार से व्यवस्थित होते हैं । वे मनुष्य गन्धर्वोंके साथ धर्म वाले होते हुए सिद्ध आत्मा वाले हैं ।५०। पाँचवाँ अनुग्रह नामक सर्ग है जो चार प्रकार का व्यवस्थित है । विपर्यय से और शक्ति से और शक्ति से उसी भाँति सिद्ध मुख्य हैं ।५१। निवृत्त और वर्तमान बार-बार उत्पन्न हुआ करते हैं । भूतादिक सत्त्वों का जो सर्ग है वह छठा सर्ग कहा जाता है ।५२। और भूतादिक स्वादन और आया शील जानने के योग्य हैं । प्रथम महत् का सर्ग है वह ब्रह्मा का सर्ग तन्मात्राओं का होता है और भूतसर्ग कहा जाया करता है और भूतसर्ग कहा जाया करता है । तीसरा सर्ग वैकारिक है जो इन्द्रिय सर्ग के नाम से पुकारा जाता है ।५४। ये सभी प्राकृत सर्ग हैं जो बुद्धि पूर्वक समुत्पन्न हुए हैं । प्रमुख सर्ग चौथा है और निश्चय ही स्थावर मुख्य कहे गये हैं ।५५। त्रियक् स्रोत तो तिर्यग् योनियों वाला पाँचवां होता है । उसी भाँति ऊर्ध्व स्रोतों का सर्ग छठा है जो दैवत सर्ग के नाम से कहा जाया करता है ।५६।
तत्रोर्द्ध्वस्रोतसां सर्गः सप्तमः स तु मानुषः ।
लोककल्पनम् (२) ] [ ५७
अष्टमोनुग्रहः सर्गः सात्त्विकस्तामसश्च सः ॥५७
पंचैते वैकृताः सर्गाः प्राकृताद्यास्त्रयः स्मृताः ।
प्राकृतो वैकृतश्चैव कौमारो नवमः स्मृतः ॥५८
प्राकृता बुद्धिपूर्वास्तु त्रयः सर्गास्तु वैकृताः ।
बुद्धिपूर्वाः प्रवर्त्तेयुस्तद्वर्गा ब्राह्मणास्तु वै ॥५९
विस्तराच्च यथा सर्वे कीर्त्यमानं निबोधत ।
चतुर्द्धा च स्थितस्सोऽपि सर्वभूतेषु कृत्स्नशः ॥६०
विपर्ययेण शक्त्या च बुद्ध्या सिद्ध्या तथैव च ।
स्थावरेषु विपर्यासस्तिर्यग्योनिषु शक्तितः ॥६१
सिद्धात्मानो मनुष्यास्तु पुष्टिर्देवेषु कृत्स्नशः ।
अथो ससर्ज वै ब्रह्मा मानसानात्मनः समान् ॥६२
वैवर्त्येन तु ज्ञानेन निवृत्तास्ते महौजसः ।
संबुद्धय चैव नामाथो अपवृत्तास्त्रयस्तु ते ॥६३
वहीं पर ऊर्ध्व स्रोतों का सातवां सर्ग है वह मानुष सर्ग होता है। आठवां अनुग्रह नाम वाला सर्ग हैं ओर वह दो प्रकार का होता है—एक सात्त्विक सर्ग है और दूसरा तामस है ।५७। ये पांच वैकृत अर्थात् विकार से युक्त सर्ग होते हैं और जो प्राकृत सर्ग हैं वे तीन कहे गये हैं। प्राकृत और वैकृत दोनों प्रकार का जो सर्ग है वह नवम कौमार होता है ।५८। प्राकृत तीनों सर्ग बुद्धि पूर्वक हैं। वैकृत सर्ग बुद्धि पूर्व प्रवृत्त होते हैं और उसके वर्ग ब्राह्मण हैं ।५९। जिस प्रकार से ये सब हैं वे सब विस्तार से कीर्त्तित होने वाले हैं उनको समझ लीजिए। वह भी चार प्रकार से स्थित है और पूर्णरूप से समस्त भूतों में है ।६०। विपरीतता से शक्ति से बुद्धि से और सिद्धि से होते हैं। स्थावरों में तो विपर्यास होता है—तिर्यग् योनियों में सूक्ति से होता है ।६१। सिद्धात्मा मनुष्य पूर्णतया देवों में पुष्टि है। इसके उपरान्त ब्रह्माजी ने अपनी आत्मा के ही समान मानस अर्थात् मन से समुत्पन्नों का सृजन किया था ।६२। ये वैवर्त्य ज्ञान के द्वारा महान ओज वाले प्रवृत्ति के अर्थात् सृजन के कार्य से निवृत्त हो गये थे। नाम को भली भांति जानकर वे तीनों अपवृत्त हो गये थे ।६३।
५८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
असृष्ट्वैव प्रजासर्गं प्रतिसर्गं ततस्ततः । ब्रह्मा तेषु व्यरक्तेषु ततोऽन्यान्साधकान्सृजन् ॥६४ स्थानाभिमानिनो देवाः पुनर्ब्रह्मानुशासनम् । अभूतसृष्ट्यवस्था ये स्थानिनस्तान्निबोध मे ॥६५ आपोऽग्निः पृथिवी वायुरन्तरिक्षो दिवं तथा । स्वर्गो दिशः समुद्राश्च नद्यश्चैव वनस्पतीन् ॥६६ ओषधीनां तथात्मानो ह्यात्मनो वृक्षवीरुधाम् । लताः काष्ठाः कलाश्चैव मुहूर्ताः संधिरत्र्यहाः ॥६७ अर्द्धमासाश्च मासाश्च अयनाब्दयुगानि च । स्थाने स्रोतः स्वभीमानाः स्थानाख्याश्चैव ते स्मृताः ॥६८ स्थानात्मनः स सृष्ट्वा तु ततोऽन्यास तदाऽसृजत् । देवांश्चैव पितॄंश्चैव यैरिमा वर्द्धिताः प्रजाः ॥६९ भृगर्वंगिरा मरीचिश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । दक्षोऽत्रिश्च वसिष्ठश्च सोऽसृजन्नव मानसान् ॥७०
प्रजा की सृष्टि को न देखकर ही फिर ब्रह्माजी ने अनन्तर में प्रतिसर्ग की रचना की थी । उनके विरक्त हो जाने पर उन्होंने अन्य साधकों का सृजन किया था ।६४। देवगण अपने स्थान के अभिमान रखने वाले थे । ब्रह्माजी का अनुशासन हुआ । न हुई सृष्टि की अवस्था वाले जो स्थानी थे उनकी ज्ञान आप लोग मुझसे प्राप्त कर लेवें ।६५। जल—अग्नि—पृथिवी—वायु—अन्तरिक्ष—दिव—स्वर्ग—दिशा—समुद्र—नदियाँ—वनस्पति—ओषधियों की आत्मायें—वृक्षों और वीरुधों की आत्मायें—लता—काष्ठा—कला—मुहूर्त्त—सन्धि—रात्रि—दिन—अर्धमास—मास अयन—अब्द—युग-ये स्थान में स्रोतों में अभिमान वाले हैं और वे स्थान नाम से कहे गये हैं ।६६-६८। उन ब्रह्माजी ने स्थानात्मा देखा तो ऐसा सेलोकन करके उनका सृजन करके फिर उस समय में उन्होंने अन्नों का सृजन किया था । उन्होंने देवों की और पितृगणों की सृष्टि की थी जिनके द्वारा ये प्रजायें परिवर्धित हुई थीं ।६९। उन ब्रह्माजी ने अपने मन के द्वारा नौ पुत्रों की सृष्टि की थी । वे नौ ये हैं—भृगु—मरीचि—पुलस्त्य—पुलह---क्रतु-दक्ष-अत्रि और वसिष्ठ । उस समय में इनका सृजन किया था ।७०।
लोककल्पनम् (२) ] [ ५६
नव ब्राह्मणा इत्येते पुराणे निश्चयं गताः । ब्रह्मा यथात्मकानां तु सर्वेषां ब्रह्मयोगिनाम् ॥७१ ततोऽसृजत्पुनर्ब्रह्मा रुद्रं रोषात्मसंभवम् । संकल्पं चैव धर्मं च सर्वेषामेव पर्वतान् ॥७२ सोऽसृजद्व्यवसायं तु ब्रह्मा भूतं सुखात्मकम् । संकल्पाच्चैव संकल्पो जज्ञे सोऽव्यक्तयोनिनः ॥७३ प्राणाहृक्षोऽसृजद्वाचं चक्षुर्भ्यां च मरीचिनम् । भृगुश्च हृदयाज्जज्ञे ऋषिः सलिलयोनिनः ॥७४ शिरसश्चांगिराश्चैव श्रोत्रादत्रिस्तथैव च । पुलस्त्यश्च तथोदानाद्व्यानात्तु पुलहस्तथा ॥७५ समानतो वसिष्ठश्च ह्यपानान्निर्ममे क्रतुम् । इत्येते ब्रह्मण श्रेष्ठाः पुत्रा वै द्वादश स्मृताः ॥७६ धर्मादयः प्रथमजा विज्ञेया ब्रह्मणः स्मृताः । भृग्वादयस्तु ये सृष्टा न च ते ब्रह्मवादिनः ॥७७ गृहमेधिपुराणास्ते विज्ञेया ब्रह्मणः सुताः । द्वादशैते प्रसूयंते सह रुद्रेण च द्विजाः ॥७८
ये नौ ब्रह्मा ही हैं—ऐसा पुराण में निश्चय को प्राप्त हुए थे । इन सब ब्रह्मयोगी आत्मकों का ब्रह्मा के ही समान प्रभाव था ।७१। इसके अनन्तर ब्रह्माजी ने रोष रूपी अपने आत्मज रुद्रदेव का सृजन किया था । सङ्कल्प और धर्म का सृजन किया था और सभी के पर्वतों की रचना की थी ।७२। उन ब्रह्माजी ने व्यवसाय की सृष्टि की थी और ब्रह्मा ने सुखात्मक भूत की रचना की थी । उन्होंने अव्यक्त योगी सङ्कल्प से सङ्कल्प को जन्म दिया था ।७३। दक्ष ने प्राण वाक् का सृजन किया था और चक्षुओं से मरीचि को उत्पन्न किया था । सलिल योगी के हृदय से भृगु ऋषि उत्पन्न हुए थे ।७४। शिर से अङ्गिरा ने जन्म ग्रहण किया था । उदान वायु से पुलस्त्य उत्पन्न हुए व्यान से पुलह का उद्भव हुआ था ।७५। समान नामक वायु से वसिष्ठ ऋषि की उत्पत्ति हुई थी, अपान वायु से क्रतु ने जन्म ग्रहण किया था । ये इतने ब्रह्माजी के परमश्रेष्ठ बारह पुत्र समुत्पन्न हुए थे । हे
६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
द्विजगणो ! ये ब्रह्माजी के द्वादश पुत्र परमश्रेष्ठ हुए थे ॥७६॥ धर्म आदिक प्रथम उत्पन्न होने वाले ब्रह्माजी के पुत्र कहे गये जानने चाहिए । जो भृगु आदि की सृष्टि की गयी थी वे ब्रह्मवादी नहीं थे ॥७७॥ वे गृहमेधी पुराण ब्रह्माजी के पुत्र समझने चाहिए। ये द्वादश रुद्र के साथ प्रसूत होते हैं ॥७८॥
ऋतुः सनत्कुमारश्च द्वावेतावूर्ध्वरेतसौ । पूर्वोत्पन्नौ पुरा ह्य तौ सर्वेषामपि पूर्वजौ ॥७९॥ व्यतीतौ सप्तमे कल्पे पुराणौ लोकसाधकौ । विरजेतेऽत्र वै लोके तेजसाक्षिप्य चात्मनः ॥८०॥ तावुभौ योगधर्म्माणोवारोप्यात्मानमात्मना । प्रजाधर्मं च कामं च वर्तयेते महौजसौ ॥८१॥ यथोत्पन्नस्तथैवेह कुमार इति चोच्यते । ततः सनत्कुमारेति नाम तस्य प्रतिष्ठितम् ॥८२॥ तेषां द्वादश ते वंशा दिव्या देवगणान्विताः । क्रियावन्तः प्रजावन्तो महर्षिभिरलंकृताः ॥८३॥ प्रजांस्तु स दृष्ट्वा वै ब्रह्मा द्वादश सात्विकान् । ततोऽसुरान्पितॄन्द्देवान्मनुष्यांश्चासृजत् प्रभुः ॥८४॥
ऋतु और सनत्कुमार ये दो ब्रह्माजी के पुत्र ऊर्ध्वरेता थे । पूर्व की उत्पत्ति में प्राचीन काल में ये दोनों सबके पूर्व में जन्म ग्रहण करने वाले हुए थे ॥७९॥ प्रथम कल्प में लोक साधक पुराण व्यतीत हो गये थे और इस लोक में आत्मा के तेज से आक्षिप्त होकर विरेजित होते हैं ॥८०॥ योग के धर्म वाले वे दोनों आत्मा से आत्मा का आरोप करके दोनों महान् ओज वाले प्रजा के धर्म को और काम को वर्तित करते हैं ॥८१॥ जैसे ही उत्पन्न हुआ था वैसे ही यहाँ पर कुमार—यह कहा जाया करता है । इसके अनन्तर उसका नाम सनत्कुमार–यह प्रतिष्ठित हुआ था ॥८२॥ उनके द्वादश वंश थे जो परम दिव्य और देवगणों से समन्वित थे । वे सब क्रिया वाले थे और महर्षियों से अलंकृत थे ॥८३॥ उन ब्रह्माजी ने उन बारह सात्विक प्राणजों को देख कर फिर प्रभु ने असुरों को–पितृगणों को–देवों को और मनुष्यों को सृजित किया था ॥८४॥
लोककल्पनम् (२) | [ ६१
मुखाद्देवानजनयत् पितॄंश्चैवाथ वक्षसः।
प्रजननान्मनुष्यांश्च जघनान्निर्ममेऽसुरान् ॥७५
नक्तं सृजन्पुनर्ब्रह्मा ज्योत्स्नाया मानुषात्मनः।
सुधायाश्च पितॄंश्चैव देवदेवः ससर्ज ह ॥८६
मुख्यामुख्यान् सृजन्देवानसुरांश्च ततः पुनः।
मनसश्च मनुष्यांश्च पितृवन्महतः पितॄन् ॥८६
विद्युतोऽशनिमेघांश्च लोहितेंद्रधनूंषि च।
ऋचो यजूंषि सामानि निर्ममे यज्ञसिद्धये ॥८८
उच्चावचानि भूतानि महसस्तस्य जज्ञिरे।
ब्रह्मणस्तु प्रजासर्गं देवर्षिपितृमानवम् ॥८९
पुनः सृजति भूतानि चराणि स्थावराणि च।
यक्षान्पिशाचान् गन्धर्वान्सर्वशोऽप्सरसस्तथा ॥६०
नरकिन्नररक्षांसि वयः पशुमृगोरगान्।
अव्ययं वा व्यमञ्चैव द्वयं स्थावरजङ्गमम् ॥६१
ब्रह्माजी ने अपने मुख से देवगणों को उत्पन्न किया था, अपने वक्षः स्थल से पितृगणों को जन्म ग्रहण कराया था—प्रजनन से मनुष्यों को और जघन से असुरों को निर्मित किया था ।७५। फिर देवताओं के भी देव ब्रह्मा जी ने मानुषात्मा की ज्योत्स्ना से रात्रि का सृजन किया था—सुधा की ओर पितृगणों की सृष्टि की थी ।८६। मुख्य और अमुख्य देवों का और असुरों का सृजन करते हुए इसके अभ्यन्तर मन से मनुष्यों का और पिता के ही समान महान् पितृगणों का सृजन किया था ।८७। विद्युत् की-वज्र की-मेघों की और लोहित इन्द्र धनुषों की-ऋचाओं की अर्थात् ऋग्वेद की-यजुर्वेद की और सामवेद की-यज्ञ की सिद्धि के लिये निर्मित की थी अर्थात् रचना की थी अर्थात् रचना की थी ।८८। ब्रह्मा के तेज से उच्च और अवच प्राणी उत्पन्न हुए थे। प्रजा के सर्ग में देव ऋषि-पितृगण और मानव सभी हुए थे ।८९। फिर उन्होंने प्राणियों का-चरों का और स्थावरों का सृजन किया था यक्ष-पिशाच गन्धर्व और सब प्रकार की अप्सराओं का सृजन करते हैं। ।६०। नर-किन्नर-राक्षस-पक्षी-पशु-मृग और उरगों का सृजन किया करते हैं। अव्यय अथवा व्यय दोनों स्थावरों जंगमों का सृजन करते हैं ।६१।
६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
तेषां ते यांति कर्माणि प्राक् सृष्टानि स्वयंभुवा ।
तान्येव प्रतिपद्यंते सृज्यमानाः पुनः पुनः ॥६२
हिंस्राहिंस्रे मृदुक्रूरे धर्माधमों कृताकृते ।
तेषामेव पृथक् सूतमविभक्तं त्रयं विदुः ॥६३
एतदेवं च नैवं च न चोभे नानुभे तथा ।
कर्म स्वविषयं प्राहुः सत्वस्थाः समदर्शिनः ॥६४
नामात्मपञ्चभूतानां कृतानां च प्रपञ्चताम् ।
दिवशब्देन पञ्चैते निर्ममे स महेश्वरः ॥६५
आर्षाणि चैव नामानि याश्च देवेषु सृष्टयः ।
शर्वर्यां न प्रसूयन्ते पुनस्तेभ्यो दधत्प्रभुः ॥६६
इत्येवं कारणाद्भूतो लोकसर्गः स्वयंभुवः ।
महदाद्या विशेषांन्ता विकाराः प्राकृताः स्वयम् ॥६७
चन्द्रसूर्यप्रभो लोको ग्रहनक्षत्रमण्डितः ।
नदीभिश्च समुद्रैश्च पर्वतैश्च सहस्रशः ॥६८
वे सब उनके कर्मों को प्राप्त होते हैं जिनका कि स्वयम्भूने पूर्व में ही सृजन कर दिया था । बार-बार सृजन को प्राप्त होते हुए उन्हीं कर्मों को प्रतिपन्न हुआ करते हैं ।६२। हिंस्र और अहिंसा वाले, मृदु और क्रूर-धर्म और अधर्म ओर कृत तथा अकृत उनके ही पृथक् उत्पन्न हुए थे । यह अविभक्त तीन जान लीजिए ।६३। यह इस प्रकार से है और इस प्रकार से नहीं है—दोनों ही नहीं हैं और दोनों हैं । सत्व में स्थित समदर्शी अर्थात् सबको एक ही समान देखने वाले अपने विषय को कर्म कहते हैं ।६४। नामात्म पञ्च भूतों की और कृतों की प्रपञ्चता को बनाया था । उन महेश्वर ने दिन शब्द से ये ही पाँच हैं जिसका निर्माण किया था ।६५। देवों में जो सृष्टियां हैं और आर्ष नाम हैं शर्वरी में प्रसूत नहीं होते हैं—फिर प्रभु ने उनके लिए धारण किया था ।६६। यह इसी रीति से स्वयम्भू का कारण से लोकों का सर्ग हुआ था । महत् जिनके आदि में होने वाला है तथा विशेष के अन्त पर्यन्त विकार स्वयं प्राकृत हैं ।६७। चन्द्रमा और सूर्य की प्रभा वाला लोक जो ग्रहों और नक्षत्रों से मण्डित है । जहाँ बहुत नदियाँ हैं—समुद्र है और सहस्रों पर्वत हैं—इन सबसे मण्डित है ।६८।
लोककल्पनम् (२) ] [ ६३
पुरैश्च विविधै रम्यैः स्फीतैर्जनपदैस्तथा । अस्मिन् ब्रह्मवनेऽव्यो ब्रह्मा चरति सर्ववित् ॥६६ अव्यक्तबीजप्रभवस्तस्यैवानुग्रहे स्थितः । बुद्धिस्कन्धमयश्चैव इन्द्रियान्तरकोटरः ॥१०० महाभूतप्रकाशश्च विशेषैः पत्रवांस्तु सः । धर्माधर्मसुपुष्पस्तु सुखदुःखफलोदयः ॥१०१ आजीवः सर्वभूतानां ब्रह्मवृक्षः सनातनः । एतद्ब्रह्मवनं चैव ब्रह्मवृक्षस्य तस्य तत् ॥१०२ अव्यक्तं कारणं यत्र नित्यं सदसदात्मकम् । धानं कृतिं मायां चैवाहुस्तत्त्वचिंतकाः ॥१०३ इत्येषोऽनुग्रहः सर्गो ब्रह्मणैमित्तिकः स्मृतः । अबुद्धिपूर्वकाः सर्गा ब्रह्मणः - कृतास्त्रयः ॥१०४ मुख्यादयस्तु षट् सर्गा वैकृता बुद्धिपूर्वकाः । वैकल्पात्संप्रवर्तंते ब्रह्मणस्तेऽभिमन्यवः ॥१०५
अनेक सुरम्य पुरों से तथा परम स्फीत जनपदों से समलंकृत हैं—इस ब्रह्मवन में सबके ज्ञाता अव्यक्त ब्रह्माजी सञ्चरण किया करते हैं।६६। अव्यक्त के बीज से जो समुत्पत्ति है वह अनेक ही अनुग्रह में स्थित होता हैं। यह एक वृक्ष है—ऐसा ही रूपक यहाँ पर दिया जाता है—इसकी वृद्धि ही स्कन्धों से परिपूर्ण है और अन्य इन्द्रियाँ कोटर हैं।१००। महाभूतों का प्रकाश है और विशेषों से वह पत्रों वाला है। इसके धर्म और अधर्म पुष्प हैं तथा उनका परिणाम रूप सुख और दुःख इसके फलों का उदय है।१०१। यह सनातन अर्थात् सर्वदा से चला जाने वाला ब्रह्म वृक्ष समस्त प्राणियों की आजीव होता है। उस ब्रह्म वृक्ष का यह ब्रह्मवन है।१०२। जहाँ पर सत् और असत् स्वरूप वाला नित्य अव्यक्त ही कारण है। तत्त्वों के चिन्तन करने वाले मनीषी इसको प्रधान-प्रकृति और माया कहा करते हैं।१०३। कृपा से होने वाला इस रीति से यह अनुग्रह सर्ग ब्रह्म के निमित्त वाला कहा गया है। अबुद्धि पूर्वक ब्रह्माजी के तीन सर्ग है जो प्राकृत कहे गये हैं।१०४। मुख्य आदिक छै सर्ग हैं जो प्राकृत न होकर वैकृत कहे जाते हैं और बुद्धि
६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
के योग से किये जाते हैं। ब्रह्मा के अभिमन्यु वे वैकल्प से संप्रवृत्त होते हैं।१०५। इत्येते प्राकृताश्चैव वैकृताश्च नव स्मृताः । सर्गाः परस्परोत्पन्नाः कारणं तु बुधैः स्मृतम् ॥१०६ मूर्द्धानं वै यस्य वेदा वदंति वियन्नाभिश्चन्द्रसूर्यौ च नेत्रे । दिशः श्रोत्रे विद्धि पादौ क्षितिं च सोऽचिंत्यात्मा सर्वभूत-णेता ॥१०७ वक्त्राद्यस्य ब्राह्मणाः संप्रसूता वक्षसश्चैव क्षत्रियाः पूर्वभागे वैश्या ऊरुभ्यां यस्य पद्भ्यां च शूद्राः सर्वे वर्णा गात्रतः संप्रसूताः ॥१०८ नारायणात्परोव्यक्तादंडमव्यक्तसंज्ञितम् । अंडजस्तु स्वयं ब्रह्मा लोकास्तेन कृताः स्वयम् ॥१०९ तत्र कल्पान् दश स्थित्वा सत्यं गच्छंति ते पुनः । ते लोका ब्रह्मलोकं वै अपरावर्तिनीं गतिम् ॥११० आधिपत्यं विना ते वै ऐश्वर्येण तु तत्समाः । भवंति ब्रह्मणा तुल्या रूपेण विषयेण च ॥१११ तत्र ते ह्यवतिष्ठंते प्रीतियुक्ताः स्वसंयुताः । अश्वयं भाविनाथेन प्राकृतं तनुते स्वयम् ॥११२
ये इस प्रकार से प्राकृत और वैकृत नौ सर्ग कहे गये हैं। ये सर्ग पर- स्पर में ही समुत्पन्न हुए हैं और बुधजनों ने तो कारण बताया है ।१०६। वेद जिसके मूर्द्धा को कहते हैं—वियत इसकी नाभि है और चन्द्र तथा सूर्य जिसके दोनों नेत्र हैं। दिशायें इसके श्रोत्र हैं, भूमिको इसके चरण समझिए— वह न चिन्तन करने के योग्य आत्मा वाला और समस्त भूतों का प्रणेता है ।१०७। जिसके मुखसे ब्राह्मण समुत्पन्न हुए हैं और जिसके वक्षःस्थल से पूर्व भाग में क्षत्रियों की समुत्पत्ति हुई है । जिसके ऊरुओं से वैश्य और पदों से शूद्र समुद्भूत हुए हैं। सभी चारों वर्ण उसी के शरीर से उत्पन्न हुए हैं ।१०८। व्यक्त नारायण से पर अण्ड है जो अव्यक्त संज्ञा वाला है। इस अण्ड से जन्म ग्रहण करने वाला स्वयं ब्रह्मा है और उसी के द्वारा स्वयं लोकों की
लोककल्पनम् (२) ] [ ६५
रचना की गयी है ।१०६। वहाँ पर दश कल्पों तक स्थित होकर वे फिर सत्य को चले जाया करते हैं। वे लोक ब्रह्मलोक को जाते हैं जो कि गति अपरा-वर्त्तिनी होती है ।११०। विना आधिपत्य के वे निश्चय ही ऐश्वर्य के द्वारा उसके समान होते हैं। वे सभी स्वरूप से और विषय से ब्रह्मा के ही तुल्य होते हैं। वहाँ पर वे स्वयंग्रुत प्रीति से युक्त होते हुए अवस्थित रहा करते हैं । अवश्यम्भावी अर्थ मे वे प्राकृत को स्वयं विस्तृत किया करते हैं ।१११-११२।
नानात्वेनाभिसंबोध्यास्तदा तत्कालभाविताः ।
स्वतोऽबुद्धिपूर्वं हि बोधो भवति हौ यथा ।।११३
तत्कालभावितो तेषां तथा ज्ञानं प्रवर्त्तते ।
प्रत्याहारैस्तु भेदानां तेषां हि न तु शुष्मिणाम् ।।११४
तैश्च सार्धं प्रवर्त्तन्ते कार्याणि कारणानि च ।
नानात्वदर्शिनां तेषां ब्रह्मलोकनिवासिनाम् ।।११५
विनिवृत्तविकाराणां स्वेन धर्मेण तिष्ठताम् ।
तुल्यलक्षणसिद्धास्तु शुभात्मानो निरञ्जनाः ।।११५
प्राकृते करणोपेताः स्वात्मन्येव व्यवस्थिताः ।
प्रस्थापयित्वा चात्मानं प्रकृतिस्त्वेष तत्त्वतः ।।११७
पुरुषाण्यबहुत्वेन प्रतीता न प्रवर्तते ।
प्रवर्त्तते पुनः सर्गस्तेषां साकारणात्मनाम् ।।११८
संयोगः प्रकृतिर्ज्ञेया युक्तानां तत्त्वदर्शिनाम् ।
तत्रोपवर्णिणी तेषामपुनर्भारगामिनाम् ।।११९
उस समय में उस काल से भावित होते हुए नानात्व से अभि संवध्य होते हैं। अबुद्धि पूर्वक शयन करते हुए जैसे ही निश्चित बोध होता है ।११३। उस काल से भावित होने पर उनको उस प्रकार का ज्ञान प्रवृत्त होता है। उन भेदों के प्रत्याहारों से ही होता, शुष्मियों का नहीं होता है ।११४। और उनके साथ ही कार्य तथा कारण प्रवृत्त हुआ करते हैं। नानात्व के दर्शी ब्रह्मलोक के निवासी उनका जो अपने धर्म से विशेष रूप से निवृत्त विकारों वाले हैं और स्थित हैं तुल्य लक्षण वाले सिद्ध-शुभात्मा और
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निरञ्जन हैं । ११५-११६। प्राकृत सर्ग में कारणों से उपेत हैं और अपनी आत्मा में ही व्यवस्थित है । और आत्मा को प्रख्यापित करके तत्व से यह प्रकृति है ।११७। पुरुषान्य से यह प्रतीत प्रवृत्त नहीं होती है। फिर उन साकरणात्माओं का सर्ग प्रवृत्त होता है ।११८। युक्त तत्व दर्शियों का संयोग प्रकृति जाननी चाहिए । अपुनर्भारगामी उनकी वह उपवर्गिणी है ।११६। अभावतः पुनः सत्यं शांतानामर्चिषामिव । ततस्तेषु गतेषूध्वं त्रैलोक्यात् मुदात्मसु ॥१२० ते सार्द्धं यैर्महर्लोकस्तदानासादितस्तु वै । तच्छिष्या ये ह तिष्ठंति कल्पदाह उपस्थिते ॥१२१ गन्धर्वाद्याः पिशाचाश्च मानुषा ब्राह्मणादयः । पशवः पक्षिणश्चैव स्थावराः ससरीसृपाः ॥१२२ तिष्ठत्सु तेषु तत्कालं पृथिवीतलवासिषु । सहस्रं यत्तु रश्मीनां सूर्यस्येह विनश्यति ॥१२३ ते सप्त रश्मयो भूत्वा एकैको जायते रविः । क्रमेण शतमानास्ते त्रींल्लोकान्प्रदहंत्युत ॥१२४ जङ्गमान्स्थावराँश्चैव नदीः सर्वांश्च पर्वतान् । शुष्केपूर्वावृष्ट्या यैस्तंश्चैव प्रतापिताः ॥१२५ तदा ते विवशाः सर्वे निर्दग्धाः सूर्यरश्मिभिः । जङ्गमाः स्थावराश्चैव धर्माधर्मादिकास्तु ते ॥१२६ अर्चियों की भाँति शान्तों के अभाव से फिर सत्य है । इसके अनन्तर मुदात्मा उनके त्रैलोक्य से ऊपर गत हो जाने पर वे जिनके द्वारा उस समय में महर्लोक अनासादित है । कल्पदाह के उपस्थित होने पर जो उनके शिष्य हैं स्थित रहा करते हैं ।१२०-१२१। गन्धर्व आदिक-पिशाच-मानुष और ब्राह्मण आदि पशु-पक्षी-स्थावर-सरीसृप उस समय में पृथवीतल वाली उनके स्थित रहने पर यहाँ पर सूर्य की सहस्र रश्मियाँ विनष्ट हो जाती हैं ।१२२-१२३। वे सब सूर्य की किरणें सात रश्मियाँ होकर एक-एक सूर्य हो जाया करता है वे क्रम से शत स्वरूप होकर तीनों लोकों को प्रदान किया करते हैं ।१२४। जङ्गम और स्थावर-नदी और सब पर्वतों को जो पूर्ण में ही
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वृष्टि के न होने से शुष्क हो रहे थे और जिनके द्वारा वे शुष्क थे उन्हीं के द्वारा बहुत तापित किये गये थे अर्थात् शुष्क वे एकदम प्राप्त हो गये थे ।१२५। इस समय में कहीं पर भी परित्राण नहीं था और वे सब विवश होकर सूर्यं के प्रखर प्रतप्त किरणों से निःशेष रूप से दग्ध हो गये थे। इनमें सभी स्थावर-जङ्गम और धर्म तथा अधर्म आदि थे ।१२६।
दग्धदेहास्तदा ते तु धूतपापा युगात्यये ।
ख्यातातपा विनिर्मुक्ताः शुभया चातिबंधया ॥१२७
ततस्ते ह्युपपद्यंते तुल्यरूपैर्जनैर्जनाः ।
उषित्वा रजनीं ते च ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ॥१२८
पुनः सर्गे भवंतौह मानस्यो ब्रह्मणः प्रजाः ।
ततस्तेषु प्रपन्नेषु जनैस्त्रैलोक्यवासिषु ॥१२६
निर्दग्धेषु च लोकेषु तदा सूर्यैस्तु सप्तभिः ।
वृष्ट्या क्षितौ प्लावितायां विजनेष्वर्णवेषु वा ॥१३०
समुद्राश्चैव मेघाश्च आपश्चैवाथ पार्थिवाः ।
शरमाणा व्रजन्त्येव सलिलाख्यास्तथाचलाः ॥१३१
आगतागतिकं चैव यदा तु सलिलं बहु ।
संछाद्येमां स्थितां भूमिमर्णवाख्यं तदाऽभवत् ॥१३२
आभाति यस्माच्चाभासाद्भाशब्दः कांतिदीप्तिषु ।
स सर्वः समनुप्राप्ता मासां भाभ्यो विभाव्यते ॥१३३
उस अवसर पर युग के अत्यय में वे देहों के दग्ध हो जाने पर निष्पाप हो गये थे तथा ख्यातातप और शुभ बन्धा से विनिर्मुक्त थे ।१२७। इसके उपरान्त वे तुल्यरूप वाले जनों के स्वाका जन उत्पन्न होते हैं। और वे अव्यक्त जन्म वाले ब्रह्मा की रात्रि में वहाँ निवास करके फिर सृजन की वेला में ब्रह्माजी की मानसी प्रजा होती हैं। फिर जनों के साथ त्रैलोक्य वासी उनके प्रयत्न होने पर तथा संतप्त सूर्य की प्रखर किरणों से उस समय में लोकों के निर्दग्ध हो जाने पर वृष्टि के द्वारा सम्पात से भूमि के प्लावित होने पर तथा विजन अर्णवों में निमग्न हो जाने पर समुद्र-मेघ-जल और पार्थिव सब शरमाण होते तथा अचल सलिल से ज्ञान वाले होकर सब ही गमन कर जाया करते हैं अर्थात् विनष्ट हो जाते हैं ।१२८-१३१। जिस समय
६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
में आगता गतिक जल प्रचुर मात्रा में हो जाता है तो वह इस भूमि को संच्छादित करके सभी समुद्र नाम वाला हो जाता है ।१३२। भी शब्द जिस आभास से कान्ति-दीप्तियों में आभास होता है। वह सभी भावों को समनु प्राप्त हुए जो कि भावों से विभावित होता है ।१३३।
तदंतस्तनुते यस्मात्सर्वां पृथिवी समंततः ।
धातुस्तनोति विस्तारं ततोपतनवः स्मृताः ॥१३४
शार इत्येव शीर्णे तु नानार्थो धातुरुच्यते ।
एकार्णवे भवन्त्यापो न शीर्णास्ते न ता नराः ॥१३५
तस्मिन् युगसहस्रांते संस्थिते ब्रह्मणोऽहनि ।
तावत्कालं रजन्यां च वर्तन्त्यां सलि़लात्मनः ॥१३६
ततस्ते सलिले तस्मिन् नष्टाग्नौ पृथिवीतले ।
प्रशांतवातेऽन्धकारे निरालोके समंततः ॥१३७
येनैवाधिष्ठितं हीदं ब्रह्मणः पुरुषः प्रभुः ।
विभागमस्य लोकस्य प्रकर्तुं पुनरैच्छत ॥१३८
एकार्णवे ततस्तस्मिन्नष्टे स्थावरजङ्गमे ।
तदा भवति स ब्रह्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥१३९
सहस्रशीर्षा पुरुषो रुक्मवर्णो ह्यतींद्रियः ।
ब्रह्मा नारायणाख्यस्तु सुषुवाप सलिले तदा ॥१४०
सत्वोद्रेकात्प्रबुद्धस्तु स शून्यं लोकमैक्षत ।
अनेनाद्येन पादेन पुराणं परिकीर्तितम् ॥१४१
उसके अन्दर जिससे सभी ओर से इस पृथिवी का विस्तार किया करता है। धातु विस्तार को फैलाता है उसके पश्चात् उपतनु कहे गये हैं ।१३४। शार यही ही शीर्ण हो जाने पर अनेक अर्थ धातु कहा जाया करता है। एकमात्र समुद्र में जल ही होते हैं। उसमे वे नर शीर्ण नहीं होते हैं ।१३५। उस एक सहस्र युगों के अन्त में ब्रह्मा के दिन के संस्थित होने पर तब तक के समय में सलिलात्मा की रात्रि के बसने पर रजनी ही रहती है ।१३६। इसके उपरान्त उस जलमें विनष्ट अग्नि वाले पृथ्वी तल में-वायु के एक दम प्रशान्त होने पर एक दम अन्धकार रहता है और सभी ओर आलोक
कल्प प्रतिस्रन्धि वर्णनम् ] [ ६६
का अभाव होता है ।१३७। जिसके द्वारा यह अधिष्ठित है ब्रह्मा के पर पुरुष प्रभु ने इस लोक के विभाग करने की इच्छा की थी ।१३८। उस समय में केवल एक ही समुद्र था और सभी चर तथा अचर जगत् एकदम विनष्ट हो गया था । तब वह ब्रह्मा सहस्रों पादों वाले होते हैं ।१३६। वह पुरुष सहस्रों शीर्षों वाले हैं जिनका वर्ण सुवर्ण के समान है और जो इन्द्रियों की पहुँच से परे हैं। उस समय में नारायण नामधारी ब्रह्माजी जल में शयन कर रहे थे ।१४०। सत्व के उद्रेक से प्रकृष्ट ज्ञान वाले उन्होंने सम्पूर्ण लोक को शून्य देखा था । इस आद्य पाद ने पुराण को परिकीर्तित किया था ।१४१।
कल्प प्रतिसन्धि वर्णनम्
सूत उवाच—इत्येवं प्रथमं पादं प्रकृत्यर्थं प्रकीर्तितम् ।
श्रुत्वा तु संहृष्टमनाः कापेयः संशयायति ॥१
आराध्य वचसा सूतं तस्यार्थं त्वपरां कथाम् ।
अथ प्रभृति कल्पज्ञ प्रतिसंधिः प्रचक्षते ॥२
समतीतस्य कल्पस्य वर्तमानस्य चानयोः ।
कल्पयोरंतरं यत्र प्रतिसंधिश्च यस्तयोः ।
एतद्वेदितुमिच्छामि यथावत्कुशलो ह्यसि ॥३
कापेयेनैवमुक्तस्तु सूतः प्रवदतां वरः ।
त्रैलोक्यस्योद्भवं कृत्स्नदाख्यातुमुपचक्रमे ॥४
सूत उवाच—अत्र वै वर्णयिष्यामि याथातथ्येन सुव्रताः ।
कल्पं भूतं भविष्यं च प्रतिसंधिश्च यस्तयोः ॥५
मन्वन्तराणि कल्पेषु यानि यानि च सुव्रताः ।
यश्चायं वर्तते कल्पो वाराहः सांप्रतः शुभः ॥६
अस्मात्कल्पात्तु यः पूर्वः कल्पोऽतीतः सनातनः ।
तस्य चास्य च कल्पस्य मध्यावस्थां निबोधत ॥७
श्री सूतजी ने कहा—यह प्रकीर्ति के लिए प्रथम पाद कीर्तित किया है । इसका श्रवण करके कापेय के मन में बहुत ही संहर्ष हुआ था किन्तु उसके मन में संशय भी होता है ।१। उन्होंने वाणी के द्वारा सूतजी की
७० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
आराधना की थी और उसका अर्थ तथा दूसरी कथा को श्रवण करने की इच्छा की थी। आज से लेकर कल्पज्ञ प्रति सन्धि कहा जाता है। २। बीत हुए कल्प का और वर्तमान कल्प की इन दोनों का अन्तर और जहां पर उन दोनों की प्रतिसन्धि है। यह मैं जानना चाहता हूँ क्योंकि आप ठीक प्रकार से यह बताने के लिए परम कुशल हैं। ३। कापेय के द्वारा इस प्रकार से पूछे जाने पर प्रवचन करने वालों में श्रेष्ठ सूतजी ने यह सम्पूर्ण ही करने का उपक्रम किया था। ४। श्री सूतजी ने कहा था-हे सुन्दर व्रतों वालो! इस विषय में जो कुछ भी है वह सभी यथार्थ रूप से वर्णन करूंगा। कल्प जो हो गये हैं और आगे होने वाले हैं तथा इन दोनों की जो प्रति सन्धि है-इसको भी बताऊंगा। ५। इन कल्पों में जो-जो भी मन्वन्तर है और जो यह कल्प वर्तमान है वह इस समय कल्प परम शुभ वाराह है। ६। इस कल्प से पूर्व में होने वाला जो कल्प था जो कि सनातन व्यतीत हो गया है उसकी और इस कल्प की जो मध्य में होने वाली अवस्था है उसका ज्ञान अब प्राप्त करलो। ७।
प्रत्यागते पूर्वकल्पे प्रतिसंधि विनाऽनघाः । अन्यः प्रवर्त्तते कल्पो जनलोकादयः पुनः ॥८
व्युच्छिन्नप्रतिसंधिस्तु कल्पात्कल्पः परस्परम् । व्युच्छिद्यंते प्रजाः सर्वाः कल्पांते सर्वशस्तदा ॥६
तस्मात्कल्पात्तु कल्पस्य प्रतिसंधिर्न विद्यते । मन्वंतरे युगाख्यानामविच्छिन्नास्तु संधयः ॥१०
परस्परात् प्रवर्त्तंते मन्वंतरयुगैः सह । उक्ता ये प्रक्रियार्थेन पूर्वकल्पाः समासतः ॥११
तेषां परार्द्धकल्पानां पूर्वो यस्मात्तु यः परः । आसीत्कल्पे व्यतीते वै परार्द्धात्परमस्तु यः ॥१२
कल्पास्त्वन्ये भविष्या ये ह्यपरार्द्धगुणीकृताः । प्रथमः सांप्रतस्तेषां कल्पो यो वर्तते द्विजाः ॥१३
अस्मिन्पूर्वे परार्द्धे तु द्वितीयः पर उच्यते । एष संस्थितकालन्तु प्रत्याहारस्ततः स्मृतः ॥१४