संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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में आगता गतिक जल प्रचुर मात्रा में हो जाता है तो वह इस भूमि को संच्छादित करके सभी समुद्र नाम वाला हो जाता है ।१३२। भी शब्द जिस आभास से कान्ति-दीप्तियों में आभास होता है। वह सभी भावों को समनु प्राप्त हुए जो कि भावों से विभावित होता है ।१३३।
तदंतस्तनुते यस्मात्सर्वां पृथिवी समंततः ।
धातुस्तनोति विस्तारं ततोपतनवः स्मृताः ॥१३४
शार इत्येव शीर्णे तु नानार्थो धातुरुच्यते ।
एकार्णवे भवन्त्यापो न शीर्णास्ते न ता नराः ॥१३५
तस्मिन् युगसहस्रांते संस्थिते ब्रह्मणोऽहनि ।
तावत्कालं रजन्यां च वर्तन्त्यां सलि़लात्मनः ॥१३६
ततस्ते सलिले तस्मिन् नष्टाग्नौ पृथिवीतले ।
प्रशांतवातेऽन्धकारे निरालोके समंततः ॥१३७
येनैवाधिष्ठितं हीदं ब्रह्मणः पुरुषः प्रभुः ।
विभागमस्य लोकस्य प्रकर्तुं पुनरैच्छत ॥१३८
एकार्णवे ततस्तस्मिन्नष्टे स्थावरजङ्गमे ।
तदा भवति स ब्रह्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥१३९
सहस्रशीर्षा पुरुषो रुक्मवर्णो ह्यतींद्रियः ।
ब्रह्मा नारायणाख्यस्तु सुषुवाप सलिले तदा ॥१४०
सत्वोद्रेकात्प्रबुद्धस्तु स शून्यं लोकमैक्षत ।
अनेनाद्येन पादेन पुराणं परिकीर्तितम् ॥१४१
उसके अन्दर जिससे सभी ओर से इस पृथिवी का विस्तार किया करता है। धातु विस्तार को फैलाता है उसके पश्चात् उपतनु कहे गये हैं ।१३४। शार यही ही शीर्ण हो जाने पर अनेक अर्थ धातु कहा जाया करता है। एकमात्र समुद्र में जल ही होते हैं। उसमे वे नर शीर्ण नहीं होते हैं ।१३५। उस एक सहस्र युगों के अन्त में ब्रह्मा के दिन के संस्थित होने पर तब तक के समय में सलिलात्मा की रात्रि के बसने पर रजनी ही रहती है ।१३६। इसके उपरान्त उस जलमें विनष्ट अग्नि वाले पृथ्वी तल में-वायु के एक दम प्रशान्त होने पर एक दम अन्धकार रहता है और सभी ओर आलोक