भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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कल्प प्रतिस्रन्धि वर्णनम् ] [ ६६

का अभाव होता है ।१३७। जिसके द्वारा यह अधिष्ठित है ब्रह्मा के पर पुरुष प्रभु ने इस लोक के विभाग करने की इच्छा की थी ।१३८। उस समय में केवल एक ही समुद्र था और सभी चर तथा अचर जगत् एकदम विनष्ट हो गया था । तब वह ब्रह्मा सहस्रों पादों वाले होते हैं ।१३६। वह पुरुष सहस्रों शीर्षों वाले हैं जिनका वर्ण सुवर्ण के समान है और जो इन्द्रियों की पहुँच से परे हैं। उस समय में नारायण नामधारी ब्रह्माजी जल में शयन कर रहे थे ।१४०। सत्व के उद्रेक से प्रकृष्ट ज्ञान वाले उन्होंने सम्पूर्ण लोक को शून्य देखा था । इस आद्य पाद ने पुराण को परिकीर्तित किया था ।१४१।


कल्प प्रतिसन्धि वर्णनम्

सूत उवाच—इत्येवं प्रथमं पादं प्रकृत्यर्थं प्रकीर्तितम् ।
श्रुत्वा तु संहृष्टमनाः कापेयः संशयायति ॥१
आराध्य वचसा सूतं तस्यार्थं त्वपरां कथाम् ।
अथ प्रभृति कल्पज्ञ प्रतिसंधिः प्रचक्षते ॥२
समतीतस्य कल्पस्य वर्तमानस्य चानयोः ।
कल्पयोरंतरं यत्र प्रतिसंधिश्च यस्तयोः ।
एतद्वेदितुमिच्छामि यथावत्कुशलो ह्यसि ॥३
कापेयेनैवमुक्तस्तु सूतः प्रवदतां वरः ।
त्रैलोक्यस्योद्भवं कृत्स्नदाख्यातुमुपचक्रमे ॥४
सूत उवाच—अत्र वै वर्णयिष्यामि याथातथ्येन सुव्रताः ।
कल्पं भूतं भविष्यं च प्रतिसंधिश्च यस्तयोः ॥५
मन्वन्तराणि कल्पेषु यानि यानि च सुव्रताः ।
यश्चायं वर्तते कल्पो वाराहः सांप्रतः शुभः ॥६
अस्मात्कल्पात्तु यः पूर्वः कल्पोऽतीतः सनातनः ।
तस्य चास्य च कल्पस्य मध्यावस्थां निबोधत ॥७

श्री सूतजी ने कहा—यह प्रकीर्ति के लिए प्रथम पाद कीर्तित किया है । इसका श्रवण करके कापेय के मन में बहुत ही संहर्ष हुआ था किन्तु उसके मन में संशय भी होता है ।१। उन्होंने वाणी के द्वारा सूतजी की