संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
आराधना की थी और उसका अर्थ तथा दूसरी कथा को श्रवण करने की इच्छा की थी। आज से लेकर कल्पज्ञ प्रति सन्धि कहा जाता है। २। बीत हुए कल्प का और वर्तमान कल्प की इन दोनों का अन्तर और जहां पर उन दोनों की प्रतिसन्धि है। यह मैं जानना चाहता हूँ क्योंकि आप ठीक प्रकार से यह बताने के लिए परम कुशल हैं। ३। कापेय के द्वारा इस प्रकार से पूछे जाने पर प्रवचन करने वालों में श्रेष्ठ सूतजी ने यह सम्पूर्ण ही करने का उपक्रम किया था। ४। श्री सूतजी ने कहा था-हे सुन्दर व्रतों वालो! इस विषय में जो कुछ भी है वह सभी यथार्थ रूप से वर्णन करूंगा। कल्प जो हो गये हैं और आगे होने वाले हैं तथा इन दोनों की जो प्रति सन्धि है-इसको भी बताऊंगा। ५। इन कल्पों में जो-जो भी मन्वन्तर है और जो यह कल्प वर्तमान है वह इस समय कल्प परम शुभ वाराह है। ६। इस कल्प से पूर्व में होने वाला जो कल्प था जो कि सनातन व्यतीत हो गया है उसकी और इस कल्प की जो मध्य में होने वाली अवस्था है उसका ज्ञान अब प्राप्त करलो। ७।
प्रत्यागते पूर्वकल्पे प्रतिसंधि विनाऽनघाः । अन्यः प्रवर्त्तते कल्पो जनलोकादयः पुनः ॥८
व्युच्छिन्नप्रतिसंधिस्तु कल्पात्कल्पः परस्परम् । व्युच्छिद्यंते प्रजाः सर्वाः कल्पांते सर्वशस्तदा ॥६
तस्मात्कल्पात्तु कल्पस्य प्रतिसंधिर्न विद्यते । मन्वंतरे युगाख्यानामविच्छिन्नास्तु संधयः ॥१०
परस्परात् प्रवर्त्तंते मन्वंतरयुगैः सह । उक्ता ये प्रक्रियार्थेन पूर्वकल्पाः समासतः ॥११
तेषां परार्द्धकल्पानां पूर्वो यस्मात्तु यः परः । आसीत्कल्पे व्यतीते वै परार्द्धात्परमस्तु यः ॥१२
कल्पास्त्वन्ये भविष्या ये ह्यपरार्द्धगुणीकृताः । प्रथमः सांप्रतस्तेषां कल्पो यो वर्तते द्विजाः ॥१३
अस्मिन्पूर्वे परार्द्धे तु द्वितीयः पर उच्यते । एष संस्थितकालन्तु प्रत्याहारस्ततः स्मृतः ॥१४