भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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कल्प प्रतिसन्धि वर्णनम् ] [ ७१

हे अनघो ! प्रतिसन्धि के बिना पूर्वकल्प के प्रत्यागत होने पर अन्य कल्प प्रवृत्त होता है और फिर जन लोकादिक होते हैं।८। व्युच्छिन्न प्रति-सन्धि वाला कल्प से परस्पर में होता है। उस अवसर पर सभी ओर से कल्प के अन्त में सम्पूर्ण प्रजा व्युच्छिन्न हुआ करती है।६। उस कल्प से कल्प की प्रतिसन्धि नहीं होती है। मन्वन्तर में युगाख्यों की सन्धियां अविच्छिन्न होती हैं।१०। मन्वन्तर युगों के साथ परस्पर से प्रवृत्त होता है। जो संक्षेप से प्रक्रियार्थ के द्वारा पूर्व कल्प कहे हैं।११। उन परार्ध कल्पों के पूर्व जिससे जो पर है। पूर्व कल्प के व्यतीत होने पर परार्ध से परम जो था।१२। जो अन्य भविष्य में होने वाले कल्प हैं वे अपरार्ध गुणी कृत हैं। हे द्विजगणो ! उनमें अब होने वाला कल्प है जो कि इस समय में वर्तमान है।१३। इसमें पूर्व परार्ध में जो द्वितीय है वह पर कहा जाता है। यह संस्थित काल वाला है और फिर प्रत्याहार कहा गया है।१४।

अस्मात्कल्पात्ततः पूर्वं कल्पोऽतीतः पुरातनः ।
चतुर्युगसहस्रांते सह मन्वंतरैः पुरा ॥१५

क्षीणे कल्पे ततस्तस्मिन् दाहकाल उपस्थिते ।
तस्मिन्काले तदा देवा आसन्वैमानिकास्तु ये ॥१६

नक्षत्रग्रहताराश्च चन्द्रसूर्यादयस्तु ते ।
अष्टाविंशतिरेवैताः कोट्यस्तु सुकृतात्मनाम् ॥१७

मन्वंतरे यथैकस्मिन् चतुर्दशसु वै तथा ।
त्रीणि कोटिशतान्यासन् कोट्यो द्विनवतिस्तथा ॥१८

अथाधिका सप्ततिश्च सहस्राणां पुरा स्मृता ।
एकैकस्मिंस्तु कल्पे वै देवा वैमानिकाः स्मृताः ॥१९

अथ मन्वंतरेष्वासंश्चतुर्दशसु खे दिवि ।
देवाश्च पितरश्चैव ऋषयोऽमृतपास्तथा ॥२०

तेषामनुचराश्चैव पत्न्यः पुत्रास्तथैव च ।
वर्णाश्रमातिरिक्ताश्च तस्मिन्काले तु खे सुराः ॥२१

तैस्तैः सायुज्यगैः सार्द्धं प्राप्ते वस्तुमये तदा ।
तुल्यनिष्ठाभवन्सर्वे प्राप्ते ह्याभूतसंप्लवे ॥२२