संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
फिर इस कल्प से पूर्ण में होने वाला अतीत पुरातन कल्प है जो पहिले एक सहस्र चारों युगों की चोकड़ी के अन्त में मन्वन्तरों के साथ है। ।१५। फिर उस कल्प के क्षीण हो जाने पर और दाह काल के उपस्थित होता है। उस समय में तब जो वैमानिक देव हैं वे थे ।१६। वे नक्षत्र-ग्रह और नारायण तथा चन्द्र सूर्य आदिक हैं । वे सब अट्ठाईस हैं। सुकृतात्माओं की करोड़ों की संख्या है अर्थात् जिन्होंने सुकृत किया है उन्हीं की करोड़ों संख्या है ।१७। जिस प्रकार से एक मन्वन्तर में तथा चौदहों में वे तीन करोड़ थे तथा बानवे करोड़ थे ।१८। इसके अनन्तर अर्थात् विमानों में रहने वाले देवगण कहे गये हैं ।१९। इसके अनन्तर आकाश में दिवलोक में चौदह मन्वन्तरों में थे । उनमें देवगण-पितृगण-ऋषिगण तथा अमृत के पान करने वाले थे ।२०। उनके अनुचर हैं, उनकी पत्नियां हैं और उनके पुत्र भी होते हैं। उस काल में आकाश में सुरगण वर्णों और आश्रमों से अतिरिक्त थे । ।२१। उस काल में वस्तुओं से परिपूर्ण प्राप्त होने पर उन-उन सायुज्य में गमन करने वालों के साथ में थे । आभूत संप्लव अर्थात् महा प्रलय के प्राप्त होने पर वे तुल्य निष्ठा वाले हुए थे ।२२।
ततस्तेऽवश्यभावित्वाद् बुद्ध्याः पर्यायमात्मनः । त्रैलोक्यवासिनो देवा इह तानाभिमानिकः ॥२३
स्थितिकाले तदा पूर्णे आसन्ने पश्चिमोत्तरे । कल्पावसानिका देवास्तस्मिन्प्राप्ते ह्युपप्लवे ॥२४
तदोत्सुका विषादेन त्यक्तस्थानानि भागशः । महर्लोकाय संविग्नास्ततस्ते दधिरे मनः ॥२५
ते युक्तानुपपद्यंते महतीं च शरीरिके । विशुद्धिबहुलाः सर्वे मानसीं सिद्धिमास्थिताः ॥२६
तै कल्पवासिभिः सार्द्धं महानासादितस्तदा । ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यैस्तद्भवैश्चापरैर्जनैः ॥२७
गत्वा तु ते महर्लोकं देवसंघाश्चतुर्दश । ततस्ते जनलोकाय सोद्वेगा दधिरे मनः ॥२८
इसके उपरान्त वे तान के अभिमानी देवगण जो त्रैलोक्य के निवासी थे यहाँ पर आत्मा की बुद्धि के अवश्य भावी होने से थे ।२३। उस काल में