भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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कल्प प्रतिसन्धि वर्णनम् ] [ ७३

स्थिति का समय पूर्ण हो चुका था और पश्चिमोत्तर में आसन्न था। जो देव कल्प में अवसान प्राप्त होने वाले थे वे उस उपप्लव को प्राप्त हुआ देखने वाले थे ।२४। उस अवसर में उत्सुक हुए और विषाद से भागों में स्थानों को व्यक्त करके फिर उन्होंने सविग्न होते हुए अयन भाग महर्लोक के लिए बनाया था ।२५। वे युक्तों को उपपन्न होते हैं और शरीर में महती को प्राप्त होते हैं वे सब प्रचुर विशुद्धि से समन्वित थे तथा मानसी सिद्धि में समास्थित हुए थे ।२६। उस समय में उन कल्पवासियों के साथ महान आसादित हुआ था। उनके साथ में गमन करने वाले ब्राह्मण—क्षत्रिय—वैश्य और अपरजन भी थे। वे चौदह देवों के संघ महर्लोक में प्राप्त हो गये थे। फिर उस महर्लोक से गमन करके बड़े उद्वेग के सहित उन्होंने अपना मन जनलोक में जाने के लिए किया था ।२७-२८।

एतेन क्रमयोगेन ययुस्ते कल्पवासिनः ।
एवं देवयुगानां तु सहस्राणि परस्परम् ॥२९
विशुद्धिबहुलाः सर्वे मानसीं सिद्धिमास्थिताः ।
तैः कल्पवासिभिः सार्द्धं जन आसादितस्तु वै ॥३०
तत्र कल्पान्दश स्थित्वा सत्यं गच्छंति वै पुनः ।
गत्वा ते ब्रह्मलोकं वै अपरावर्तिनीं गतिम् ॥३१
आधिपत्यं विमाने वै ऐश्वर्येण तु तत्समाः ।
भवंति ब्रह्मणा तुल्या रूपेण विषयेण च ॥३२
तत्र ते ह्यवतिष्ठंते प्रीतियुक्ताश्च संयमान् ।
आनंदं ब्रह्मणः प्राप्य मुच्यन्ते ब्रह्मणा सह ॥३३
अवश्यभाविनाथेन प्राकृतेनैव ते स्वयम् ।
मानार्चनाभिः संबद्धास्तदा तत्कालभाविताः ॥३४
स्वपतो बुद्धिपूर्वं तु बोधो भवति वै यथा ।
तथा तु भावितो सेवां तथानंदः प्रवर्तते ॥३५

इसी क्रम के योग से वे कल्पवासी चले गये थे। इस प्रकार से सहस्रों ही देवों के युग थे ।२६। सभी विशुद्धि की प्रचुरता वाले थे और अतएव वे सब मानसी सिद्धि में समास्थित थे। उनने कल्प वासियों के साथ जनलोक