भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

को प्राप्त किया था ।३०। वहाँ जनलोक में दश कल्पों तक स्थित होकर फिर सत्य लोक को चले जाते हैं । वे ब्रह्मलोक को प्राप्त करके अपरावर्त्तिनी गति को प्राप्त हो जाते हैं ।३१। वे विमान में आधिपत्य पाकर ऐश्वर्य से उनके ही समान हो जाया करते हैं । फिर वे ब्रह्माजी के ही तुल्य हो जाया करते हैं और रूप तथा विषय के द्वारा ब्रह्मा के समान हैं ।३२। वहाँ पर वे प्रीति से युक्त होते हुए संयमों को अवस्थित हुआ करते हैं । वहाँ पर ब्रह्मा का आनन्द प्राप्त करके ब्रह्माजी के ही साथ मुक्ति को प्राप्त हो जाया करते हैं ।३३। प्राकृत अवश्य भावी अर्थ से वे स्वयं उस समय में उसका से भावित होते हुए सम्मान और अर्चन आदि के द्वारा सम्बद्ध होते हैं ।३४। जिस प्रकार से बुद्धिपूर्वक शयन करते हुए बोध होता है उसी भाँति सेवा के भावित होने पर वैसा ही आनन्द प्रवृत्त होता है ।३५।

प्रत्याहारैस्तु भेदानां येषां भिन्नानि शुष्मिणाम् । तैः सार्द्धं वर्द्धते तेषां कार्याणि करणानि च ॥३६ नानात्वदर्शिनां तेषां ब्रह्मलोकनिवासिनाम् । विनिवृत्ताधिकाराणां स्वेन धर्मेण तिष्ठताम् ॥३७ ते तुल्यलक्षणाः सिद्धाः शुद्धात्मानो निरंजनाः । प्राकृते करणोपेताः स्वात्मन्येव व्यवस्थिताः ॥३८ प्रख्यापयित्वा चात्मानं प्रकृतिस्त्वेषु तत्त्वतः । पुरुषान्यबहुत्वेन प्रतीता तत्प्रवर्तते ॥३६ प्रवर्तिते पुनः सर्गे तेषां साकारणात्मनाम् । संयोगे प्रकृतिर्ज्ञेया मुक्तानां तत्त्वदर्शिनाम् ॥४० तत्रोपवर्गिणां तेषां न पुनर्मार्गगामिनाम् । अभावः पुनरुत्पन्नः शांतानामर्चिषामिव ॥४१ ततस्तेषु गतेषूर्ध्वं त्रैलोक्येषु महात्मसु । एतैः सार्द्धं महर्लोकस्तदानासादितस्तु वै ॥४२

जिन शुष्मियों के भेदों के प्रत्याहारों से भिन्न हैं उनके कार्य और करण वर्धित होते हैं ।३६। वे नानात्व के देखने वाले और ब्रह्मलोक के निवास करने वाले हैं। निवृत्त अधिकारों वाले और अपने धर्म में स्थित