भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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कल्प प्रतिसन्धि वर्णनम् ] [ ७५

रहने वाले हैं ।३७। वे समान लक्षणों वाले सिद्ध हैं शुद्ध आत्माओं वाले तथा निरञ्जन हैं । प्राकृत में वे करणों से उपेत हैं और अपनी आत्मा में ही व्यवस्थित हैं ।३८। और आत्मा को प्रख्यापित करके तात्विक रूप से यह प्रकृति अन्य पुरुषों के बहुत्व होने से प्रतीत होती हुई प्रवृत्त होती है ।३६। साकारणात्मा उनके फिर सर्ग के प्रवर्त्तित होने पर मुक्त तत्व दर्शियों के संयोग में प्रवृत्ति जाननी चाहिए ।४०। वहाँ पर उपवर्गी और फिर मार्गगामी न होने वाले इनका पुनः शान्त अर्चियों के ही समान अभाव उत्पन्न हो गया है ।४१। इसके अनन्तर उन महान् आत्मा वाले त्रैलोकों के ऊपर की ओर गत होने पर उस समय में इनके साथ महर्लोक निश्चय ही आसादित नहीं हुआ था ।४२।

तच्छिष्या वै भविष्यन्ति कल्पदाह उपस्थिते ।
गंधर्वाद्याः पिशाचाश्च मानुषा ब्राह्मणादयः ॥४३
पशवः पक्षिणश्चैव स्थावराश्च सरीसृपाः ।
तिष्ठत्सु तेषु तत्कालं पृथिवीतलवासिषु ॥४४
सहस्रं यत्तु रश्मीनां स्वयमेव विभाव्यते ।
तत्सप्तरश्मयो भूत्वा एकैको जायते रविः ॥४५
क्रमेणोत्तिष्ठमानास्ते त्रींल्लोकान्प्रदहंत्युत ।
जङ्गमाः स्थावराश्चैव नद्यः सर्वे च पर्वताः ॥४६
शुष्काः पूर्वमनावृष्ट्या सूर्यैस्ते च प्रधूपिताः ।
तदा तु विवशाः सर्वे निर्दग्धाः सूर्यरश्मिभिः ॥४७
जङ्गमाः स्थावराश्चैव धर्माधर्मात्मकास्तु वै ।
दग्धदेहास्तदा ते तु धूतपापा युगांतरे ॥४८
ख्यातातपा विनिर्मुक्ताः शुभया चातिबंधया ।
ततस्ते ह्युपपद्यंते तुल्यरूपैर्जनैर्जनाः ॥४६

कल्पदाह के उपस्थित हो जाने पर उनके शिष्य होंगे। जो कि गन्धर्व आदि पिशाच-मानुष और ब्राह्मणादिक हैं ।४३। पशु-पक्षी-स्थावर और सरीसृप हैं। उस समय में पृथ्वी तल में निवास करने वाले उनके स्थित होने पर जो सहस्र किरणें हैं वे स्वयं ही विभावित हो जाया करती हैं। वे