भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७६ ।। ब्रह्माण्ड पुराण

सहस्रों किरणें सात किरणें होकर एक-एक किरण एक-एक सूर्य हो जाता है ।४४-४५। वे सबसे उत्थित होते हुए तीनों लोकों को प्रदग्ध कर देते हैं। उस दाह में चर प्राणी-स्थावर अर्थात् अचर और सब नदियाँ तथा समस्त पर्वत दग्ध होते हैं ।४६। पहिले वृष्टि के अभाव से सभी शुष्क हो जाते हैं और सरसता नाम मात्र को भी कहीं पर नहीं रहती है। इसके पश्चात् वे सब उक्त सूर्यों से जो अतीव प्रखर हैं प्रधूपित होते हैं। उस काल से सभी विवश होकर निर्दग्ध हो जाते हैं और सूर्यों की किरण से जल भुन जाया करते हैं ।४७। जङ्गम और स्थावर जो भी धर्म और अधर्म के स्वरूप वाले हैं, उस समय में उन सके देह प्रदाध होते हैं और अन्ययुग में उनके पाप विनष्ट होकर वे निष्पाप एवं शुद्ध हो जाते हैं ।४८। शुभ अतिबन्ध से वे ख्यातातप विनिर्मुक्त हो जाते हैं। इसके उपरान्त वे जन सब तुल्य रूप वाले जनों के ही साथ में उपपन्न हो जाते हैं ।४९।

उषित्वा रजनीं तत्र ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ।
पुनः सर्गे भवंतीह मानसा ब्रह्मणः सुताः ॥५०॥
ततस्तेषूपपन्नेषु जनैस्त्रैलोक्यवासिषु ।
निर्दग्धेषु च लोकेषु तदा सूर्यैस्तु सप्तभिः ॥५१॥
वृष्ट्या क्षितौ प्लावितायां विजनेष्वर्णवेषु च ।
सामुद्राश्चैव मेघाश्च आपः सर्वाश्च पार्थिवाः ॥५२॥
शरमाणा व्रजंत्येव सलिलाख्यास्तथानुगाः ।
आगतागतिकं चैव यदा तत्सलिलं बहु ॥५३॥
संछाद्येमां स्थितां भूमिमर्णवाख्यं तदाभवत् ।
आभाति यस्मात् स्वाभासो भाशब्दो व्याप्तिदीप्तिषु ॥५४॥
सर्वतः समनुप्राप्त्या तासां चाम्भो विभाव्यते ।
तदंस्तनुते यस्मात्सर्वां पृथ्वीं समंततः ॥५५॥
धातुस्तनोति विस्तारे न चैतास्तनवः स्मृताः ।
शर इत्येष शीर्णे तु नानार्थो धातुरुच्यते ॥५६॥

फिर अव्यक्त जन्म वाले ब्रह्माजी की एक रात्रि तक वहाँ निवास करके फिर जब सृष्टि की रचना होती है उसमें वहाँ पर ब्रह्माजी के मानस