भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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कल्प प्रतिसन्धि वर्णनम् ] [ ७७

अर्थात् मन से ही समुत्पन्न पुत्र होते हैं ।५०। इसके अनन्तर जनों के साथ त्रैलोक्य के निवासी उनके उत्पन्न होने पर और उस समय में उन प्रखरतम सात सूर्यों के द्वारा समस्त लोकों के निर्दग्ध हो जाने पर ।५१। वृष्टि के धारा सम्पात से इस पृथ्वीतल के पूर्णतया प्लावित हो जाने पर, सब समुद्रों के विजन हो जाने पर सब समुद्र-मेघ और सम्पूर्ण जल और सब पार्थिव शीर्ण होते हुए सलिल के नाम पर अनुग होकर गमन किया करते हैं और आगतागतिक जिस समय में बहुत वह जल हो गया था ।५२-५३। उस समय में इस सम्पूर्ण भूमि को संच्छादित करके जो यहाँ पर स्थित थी सभी कुछ एक अर्णव नामधारी हो गया था । जिससे स्व से आभास होने वाला भी शब्द दीप्तियों में व्याप्ति आभास होती है ।५४। सभी ओर उनकी समनु-प्राप्ति से जल ही विभावित होता है । उसके अन्दर जिस कारण से सभी ओर से सम्पूर्ण पृथ्वी को विस्तृत करता है ।५५। विस्तार में धातु विस्तार किया करती है और ये तनु नहीं कहे गये हैं । शीर्ण होने पर शर यह नाना अर्थों वाला धातु कहा जाया करता है ।५६।

एकार्णवे भवन्त्यापो न शीघ्रास्तेन ते नराः । तस्मिन् युगसहस्रान्ते संस्थिते ब्रह्मणोऽहनि ॥५७ तावत्काले रजन्यां च वर्तंत्यां सलिलात्मना । ततस्तु सलिले तस्मिन्नष्टाग्नौ पृथ्वीतले ॥५८ प्रशांतवातेऽन्धकारे निरालोके समंततः । एतेनाधिष्ठितं हीदं ब्रह्मा स पुरुषः प्रभुः ॥५९ विभागमस्य लोकस्य प्रकर्तुं पुनरैच्छत् । एकार्णवे तदा तस्मिन्नष्टे स्थावरजंगमे ॥६० तदा भवति स ब्रह्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् । सहस्रशीर्षा पुरुषो रुक्मवर्णो जितेंद्रियः । इमं चोदाहरंत्यत्र श्लोकं नारायणं प्रति ॥६१ आपो नारास्तत्तनव इत्यर्था अनुशुश्रुम । आपूर्यमाणास्तत्रास्ते तेन नारायणः स्मृतः ॥६२ सहस्रशीर्षा सुमनाः सहस्रपात् सहस्रचक्षुर्वदनः सहस्रकृत् । सहस्रबाहुः प्रथमः प्रजापतिस्त्रयीमयोऽयं पुरुषो निरुच्यते ॥६३