भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

एकमात्र अर्णव के होने पर आप शीघ्र नहीं है उससे वे नर हैं । उस एक सहस्र युगों के अन्त में जबकि ब्रह्माजी का दिन संस्थित होता है ।५७। उतने समय में सलिल के स्वरूप से रजनी के वर्तमान होने का अवसर रहता है । फिर उस जल मे इस पृथ्वी तल में अग्नि तल में अग्नि बिल्कुल नष्ट हो जाया करती है ।५८। उस समय में वायु एकदम प्रशान्त होती है और सभी ओर घोर अन्धकार रहता है तथा सभी ओर आलोक का अभाव रहता है । यह सब इसके ही द्वारा अधिष्ठित रहता है और ब्रह्माजी ही वह प्रभु पुरुष होते हैं ।५९। फिर उन्होंने इस लोक के विभाग करने की इच्छा की थी जिस समय में सभी जङ्गम और स्थावर विनष्ट होचुके थे और केवल एक ही अर्णव सभी ओर था ।६०। उस अवसर से वे ब्रह्माजी सहस्रों शिरों वाले और सहस्रों पादों वाले होते हैं । वे सहस्रों शिरों वाले पुरुष सुवर्ण के समान वर्ण वाले थे और सब इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने वाले थे । भगवान् नारायण के प्रति यहाँ पर इस श्लोक का उदाहरण दिया करते हैं ।६१। आप (जल) जो उसके तनु है—यह अर्थ सुनते हैं । वहाँ पर वे आपूर्य माण हैं—इसलिए नारायण कहे गये हैं ।६२। सहस्र शीर्षों से संयुत सुन्दर मन वाले—सहस्र चरणों से युक्त—सहस्र चक्षु और मुखों वाले सहस्र कृत हैं । सहस्र बाहुओं वाले हैं—ऐसे प्रथम प्रजापति हैं । यह पुरुष त्रयी से परिपूर्ण है—ऐसा कहा जाता है ।६३।

आदित्यवर्णो भुवनस्य गोप्ता एको ह्यमूर्तः प्रथमस्तवसौ विराट् । हिरण्यगर्भः पुरुषो महात्मा संपद्यते वै मनसः परस्तात् ॥६४

कल्पादौ रजसोद्रिक्तो ब्रह्मा भूत्वाऽसृजत्प्रभुः । कल्पांते तमसोद्रिक्तः कालो भूत्वाग्रसत्पुनः ॥६५

स वै नारायणो भूत्वा सत्त्वोद्रिक्तो जलाशये । त्रिधा विभज्य चात्मानं त्रैलोक्ये संप्रवर्त्तते ॥६६

सृजति ग्रसते चैव वीक्ष्यते च त्रिभिः स्वयम् । एकार्णवे तदा तस्मिन्नष्टे स्थावरजंगमे ॥६७

चतुर्युगसहस्रान्ते सर्वतः स जलावृते । ब्रह्मा नारायणाख्यस्तु स काशे च भवे स्वयम् ॥६८