संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकल्प प्रतिसन्धि वर्णनम् ] [ ७६
चतुर्विधाः प्रजाः सर्वा ब्रह्मशक्त्या तमोवृताः । पश्यन्ति तं महर्लोके कालं सुप्तं महर्षयः ॥६९॥ भृग्वादयो यथोद्दिष्टास्तस्मिन् काले महर्षयः । सत्यादयस्तथा त्वष्टौ कल्पे लीने महर्षयः । तदा विवर्त्यमानैस्तैर्महत्परिगतं पराम् ॥७०॥
आदित्य के समान वर्ण से युक्त—इस भुवन के रक्षक एक—अमूर्त अर्थात् मूर्ति से शून्य यह प्रथम विराट् हैं। हिरण्यगर्भ—महान् आत्मा वाला पुरुष मन से परे सम्पन्न होता है ।६४। कल्प के आदि में रजो गुण से उद्रिक्त होकर प्रभु ब्रह्मा ने सृजन किया था। कल्प का जब अवसान होता है तो उस समय में तमोगुण के उद्रेक से समन्वित काल होकर फिर इस सम्पूर्ण सृष्टि का ग्रसन किया था ।६५। वही फिर भगवान् सत्व के उद्रेक से युक्त नारायण होकर जलाशय में विराजमान रहते हैं। आपने आपको तीन स्वरूपों में विभक्त करके भगवान् तीनों लोकों में सम्प्रवृत्त हुआ करते हैं ।६६। सृजन करते हैं—ग्रसन करते हैं और स्वयं ही तीन रूपों से वीक्षण करते हैं। उस समय में समस्त स्थावर और जङ्गम के नष्ट हो जाने पर जब एकमात्र अर्णव ही विद्यमान रहा करता है ।६७। एक सहस्र चारों युगों की चौकड़ियों का जब अन्त होता है उस समय में वह सभी ओर जल से समा-वृत होते हैं। उस समय में नारायण नामक वह ब्रह्मा इससे सार में स्वयं प्रकाशित रहते हैं ।६८। सब चारों प्रकार की प्रजा ब्रह्मा की शक्ति से तम से आवृत होती है। महर्षिगण उसको महर्लोक में सोये हुए काल को देखते हैं ।६९। उस काल में यथोद्दिष्ट भृगु आदि महर्षिगण है। उस समय में उनके विवर्त्यमानों के द्वारा महत् परिगत होता है ।७०।
गत्यर्थादृषितेर्धातोर्नामिनिष्पत्तिरुच्यते । यस्मादृषति सत्त्वेन महत्तस्मान्महर्षयः ॥७१॥ महर्लोकस्थितैर्दृष्टः कालः सुप्तस्तदा च तैः । सत्त्वाद्याः सप्त ये त्वासन्कल्पेऽतीते महर्षयः ॥७२॥ एवं ब्रह्मा तासु तासु रजनीषु सहस्रशः । दृष्टवन्तस्तदानींताः कालं सुप्तं महर्षयः ॥७३॥