भारतकोश
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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

कल्प प्रतिसन्धि वर्णनम् ] [ ७६

चतुर्विधाः प्रजाः सर्वा ब्रह्मशक्त्या तमोवृताः । पश्यन्ति तं महर्लोके कालं सुप्तं महर्षयः ॥६९॥ भृग्वादयो यथोद्दिष्टास्तस्मिन् काले महर्षयः । सत्यादयस्तथा त्वष्टौ कल्पे लीने महर्षयः । तदा विवर्त्यमानैस्तैर्महत्परिगतं पराम् ॥७०॥

आदित्य के समान वर्ण से युक्त—इस भुवन के रक्षक एक—अमूर्त अर्थात् मूर्ति से शून्य यह प्रथम विराट् हैं। हिरण्यगर्भ—महान् आत्मा वाला पुरुष मन से परे सम्पन्न होता है ।६४। कल्प के आदि में रजो गुण से उद्रिक्त होकर प्रभु ब्रह्मा ने सृजन किया था। कल्प का जब अवसान होता है तो उस समय में तमोगुण के उद्रेक से समन्वित काल होकर फिर इस सम्पूर्ण सृष्टि का ग्रसन किया था ।६५। वही फिर भगवान् सत्व के उद्रेक से युक्त नारायण होकर जलाशय में विराजमान रहते हैं। आपने आपको तीन स्वरूपों में विभक्त करके भगवान् तीनों लोकों में सम्प्रवृत्त हुआ करते हैं ।६६। सृजन करते हैं—ग्रसन करते हैं और स्वयं ही तीन रूपों से वीक्षण करते हैं। उस समय में समस्त स्थावर और जङ्गम के नष्ट हो जाने पर जब एकमात्र अर्णव ही विद्यमान रहा करता है ।६७। एक सहस्र चारों युगों की चौकड़ियों का जब अन्त होता है उस समय में वह सभी ओर जल से समा-वृत होते हैं। उस समय में नारायण नामक वह ब्रह्मा इससे सार में स्वयं प्रकाशित रहते हैं ।६८। सब चारों प्रकार की प्रजा ब्रह्मा की शक्ति से तम से आवृत होती है। महर्षिगण उसको महर्लोक में सोये हुए काल को देखते हैं ।६९। उस काल में यथोद्दिष्ट भृगु आदि महर्षिगण है। उस समय में उनके विवर्त्यमानों के द्वारा महत् परिगत होता है ।७०।

गत्यर्थादृषितेर्धातोर्नामिनिष्पत्तिरुच्यते । यस्मादृषति सत्त्वेन महत्तस्मान्महर्षयः ॥७१॥ महर्लोकस्थितैर्दृष्टः कालः सुप्तस्तदा च तैः । सत्त्वाद्याः सप्त ये त्वासन्कल्पेऽतीते महर्षयः ॥७२॥ एवं ब्रह्मा तासु तासु रजनीषु सहस्रशः । दृष्टवन्तस्तदानींताः कालं सुप्तं महर्षयः ॥७३॥

८० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

कल्पस्यादौ सुबहुला यस्मात्संस्थाश्चतुर्दश ।
कल्पयामास वै ब्रह्मा तस्मात्कल्पो निरुच्यते ॥७४
स सृष्टा सर्वभूतानां कल्पादिषु पुनः पुनः ।
व्यक्ताव्यक्तो महादेवस्यस्य सर्वमिदं जगत् ॥७५
इत्येष प्रतिसंबन्धः कीर्तितः कल्पयोर्द्वयोः ।
सांप्रतं हि तयोर्मध्ये प्रागवस्था बभूव ह ॥७६
कीर्तितस्तु समासेन पूर्वकल्पे यथातथम् ।
सांप्रतं संप्रवक्ष्यामि कल्पमेतं निबोधतः ॥७७

गति के अर्थ वाली ऋषिति धातु नाम की निष्पत्ति होती है—ऐसा कहा जाता है। जिससे ऋषिति के सत्व होने से उससे महत् है अतएव महर्षि होते हैं ॥७१॥ अहर्लोक में स्थित होते हुए उन्होंने उस समय में सोये हुए काल को देखा था। जो कल्प के व्यतीत होने पर सत्त्वादि सात महर्षि थे ॥७२॥ इस प्रकार से उन-उन सहस्रों रजनियों में उस समय में आनीत महर्षियों ने सुप्तकाल को देखा था ॥७३॥ कल्प के आदि में जिससे सुबहुल चौदह संस्था हैं। ब्रह्माजी ने क्योंकि कल्पन किया था इसी कारण से कल्प कहा जाता है ॥७४॥ कल्पों के आदि काल में पुनः पुनः वही समस्त भूतों का सृजन करने वाला है। महादेव व्यक्त है। इसका ही यह सम्पूर्ण जगत है ॥७५॥ वह दोनों कल्पों का प्रति सम्बन्ध कर दिया गया है। इस समय में उन दोनों के मध्य में पूर्व की अवस्था हुई थी ॥७६॥ पूर्व में होने वाले कल्प में ठीक-ठीक कह दिया गया है। इस समय में इस कल्प के विषय में बतलाऊँगा, उसको समझ लीजिए ॥७७॥

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॥ पृथ्वी व्यायाम विस्तारः ॥

सूत उवाच—एवं प्रजासन्निवेशं श्रुत्वा वै शांशपायनिः ।
पप्रच्छ नियतं सूतं पृथिव्युदधिविस्तरम् ॥१
कति द्वीपा समुद्रा वा पर्वता वा कति स्मृताः ।
कियंति चैव वर्षाणि तेषु नद्यश्च काः स्मृताः ॥२
महाभूतप्रमाणं च लोकालोकं तथैव च ।

पृथ्वी व्यायाम विस्तारः ] [ ८१

पर्यायं परिमाणं च गति चन्द्रार्कयोस्तथा । एतत्प्रब्रूहि नः सर्वं विस्तरेण यथार्थतः ॥३ सूत उवाच—हंत वोऽहं प्रवक्ष्यामि पृथिव्यायामविस्तरम् ॥४ संख्यां चैव समुद्राणां द्वीपानां चैव विस्तरम् । द्वीपभेदसहस्राणि सप्तस्वन्तर्गतानि च ॥५ न शक्यंते क्रमेणेह वक्तुं यैः सततं जगत् । सप्त द्वीपान्प्रवक्ष्यामि चन्द्रादित्यग्रहैः सहः ॥६ तेषां मनुष्यास्तर्केण प्रमाणानि प्रचक्षते । अचिंत्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण साधयेत् ॥७

श्री सूतजी ने कहा—इस रीति से शांशपायनि ने प्रजा के सन्निवेश का श्रवण करके फिर उसने श्री सूतजी ने नियत रूप से पृथिवी और उदधि के विस्तार के विषय में पूछा था ।१। द्वीप कितने हैं, समुद्र अथवा पर्वत कितने बताये गये हैं ? कितने वर्ष हैं और उन वर्षों में नदियों कौन-कौन बतायी गयी हैं ? ।२। महाभूतों का क्या प्रमाण है तथा लोकालोक प्रमाण क्या है ? चन्द्र और सूर्य का पर्याय-परिमाण और गति क्या हैं ? हे भगवान् ! यह सब आप विस्तार पूर्वक यथार्थ रूप से हमको बतलाइए ।३। श्री सूतजी ने कहा—हर्ष की बात है, मैं आपके सामने पृथ्वी का आयाम और विस्तार बतलाऊँगा ।४। समुद्रों की संख्या और द्वीपों का विस्तार भी बतलाऊँगा । यों तो द्वीपों के सहस्रों भेद होते हैं किन्तु वे भेद सात द्वीपों के सहस्रों भेद होते हैं किन्तु वे सभी भेद सात द्वीपो के ही अन्तर्गत है ।५। जिनके द्वारा निरन्तर यह जगत है वे सब क्रम से यहाँ पर नहीं बताये जा सकते हैं । मैं इस समय में तो आपके समक्ष में सात द्वीपो को ही बताऊँगा और उनके साथ चन्द्र-सूर्य और ग्रहों का वर्णन करूंगा ।६। मानव उनका प्रमाण तर्क के द्वारा कहा करते हैं । किन्तु निश्चित रूप से जो भाव चिन्तन करने के योग्य नहीं हैं उनका तर्क के सहारे साधन कभी नहीं करना चाहिए ।७।

प्रकृतिभ्यः परं यच्च तदचिन्त्यं प्रचक्षते । नववर्षं प्रवक्ष्यामि जंबूद्वीपं यथातथम् ॥८

८२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

विस्तरान्मण्डलाच्चैव योजनैस्तन्निबोधत । शतमेकं सहस्राणां योजनाग्रात्समंततः ॥६ नानाजनपदाकीर्णः पुरैश्च विविधैश्शुभैः । सिद्धचारणसंकीर्णः पर्वतैरुपशोभितः ॥१० सर्वधातुनिबद्धश्च शिलाजालसमुद्भवैः । पर्वतप्रभवाभिश्च नदीभिः सर्वतस्ततः ॥११ जंबूद्वीपः पृथुः श्रीमान् सर्वतः पृथुमंडलः । नवभिश्चावृतः सर्वो भुवनैर्भूतभावनैः ॥१२ लवणेन समुद्रेण सर्वतः परिवारितः । जंबूद्वीपस्य विस्तारात् समेन तु समंततः ॥१३ प्रागायताः सुपर्वाणः षडिमे वर्षपर्वताः । अवगाढा ह्युभयतः समुद्रौ पूर्वपश्चिमौ ॥१४

जो प्रकृतियों से परे हैं वही चिन्तन न करने के योग्य नहीं है—ऐसा कहते हैं। नौ वर्षों से समन्वित जम्बू द्वीप को यथार्थ रूप से बतलाऊँगा ।८। उसको विस्तार से और मण्डल से योजनों के द्वारा समझ लीजिए । योजनाग्र से सभी ओर एक सौ सहस्र है। यह अनेक जनपदों से घिरा हुआ है और विविध परम शुभ नगरों से समन्वित है । यह सिद्धगण और चारणों से समाकीर्ण है और अनेक पर्वतों से उपशोभित है ।६-१०। शिलाओं के समुदायों से समुत्पन्न समस्त धातुओं से निबद्ध यह द्वीप है । इसके सभी ओर अनेक नदियाँ हैं जो पर्वत से उद्भूत हुई हैं ।११। यह जम्बूद्वीप बहुत विशाल है । श्री सम्पन्न है तथा इसका मण्डल भी महान् है । भूतों के करने वाले नौ भुवनों से यह सम्पूर्ण समावृत है ।१२। इसके चारों ओर क्षार समुद्र है जिसका भी विस्तार जम्बू द्वीप के विस्तार के ही समान है ।१३। प्रागायत सुपर्वा ये छै वर्ष पर्वत हैं जो दोनों ओर पूर्व और पश्चिम समुद्रों से अवगाढ हैं ।१४।

हिमप्रायश्च हिमवान् हेमकूटश्च हेमवान् । सर्वत्तुषु सुखश्चापि निषधः पर्वतो महान् ॥१५ चतुर्वर्णश्च सौवर्णो मेरुश्चारुतमः स्मृतः ।

पृथ्वी व्यायाम विस्तरः ] [ ८३

द्वात्रिंशच्च सहस्राणि विस्तीर्णः स च मूर्द्धनि ॥१६ वृत्ताकृतिप्रमाणश्च चतुरस्रः समुच्छ्रितः । नानावर्णस्तु पार्श्वेषु प्रजापतिगुणान्वितः ॥१७ नाभिबंधनसंभूतो ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः । पूर्वतः श्वेतवर्णश्च ब्राह्मणस्तस्य तेन तत् ॥१८ पार्श्वमुत्तरतस्तस्य रक्तवर्णः स्वभावतः । तेनास्य क्षत्रभावस्तु मेरोर्नानार्थकारणात् ॥१९ पीतश्च दक्षिणेनासी तेन वैश्यत्वमिष्यते । भृंगपत्रनिभश्चापि पश्चिमेन समाचितः ॥२० तेनास्य शूद्रभावः स्यादिति वर्णाः प्रकीर्तिताः । वृत्तः स्वभावतः प्रोक्तो वर्णतः परिमाणतः ॥२१

हिमवान् गिरि में प्रायः हिम समूह होता है और हेमकूट पर्वत हेम से संयुत है। निषध एक महान पर्वत है जो सभी ऋतुओं में सुखदायी होता है ।१५। मरु पर्वत चार वर्णों वाला है और सुवर्ण से युक्त है यह अधिक सुन्दर कहा गया है और मूर्धा में बत्तीस सहस्र योजनों के विस्तार वाला है ।१६। यह वृत्त आकृति और प्रमाण वाला है तथा चौकोर और समुच्छ्रित अर्थात् ऊँचा है। इसके पार्श्व भागों में अनेक वर्ण हैं तथा यह प्रजापति के गुणों से संयुत है ।१७। अव्यक्त जन्म वाले ब्रह्माजी के नाभिबन्धन से यह समुत्पन्न हुआ है। उसके पूर्व की ओर यह श्वेत वर्ण वाला है इससे ब्राह्मण है ।१८। उत्तर की ओर पार्श्वभाग उसका स्वभाव से ही रक्तवर्ण है। इस कारण से मेरु के अनेक अर्थ कारण से इसका क्षत्र भाव है ।१९। यह दक्षिण दिशा की ओर पीत है इससे इसका वैश्यभाव अभीष्ट होता है। पश्चिम की ओर पीत है इससे इसका वैश्यभाव अभीष्ट होता है। पश्चिम की ओर यह भृङ्गपत्र के सदृश समाचित है ।२०। इस कारण से इसका शूद्रभाव होता है—इस तरह से इसके चार वर्ण कहे गये हैं। यह स्वभाव से वृत्त कहा है और वर्ण तथा परिमाण से भी बताया गया है ।२१।

नीलश्च वैदूर्यमयः श्वेतः शुक्लो हिरण्मयः । मयूरबर्हवर्णस्तु शातकौम्भश्च शृंगवान् ॥२२

८४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

एते पर्वतराजानः सिद्धचारणसेविताः । तेषामंतरविष्कंभो नवसाहस्र उच्यते ॥२३ मध्ये त्विलावृतं नाम महामेरोः समंततः । नवैकं तु सहस्राणि विस्तीर्णं सर्वतस्तु तत् ॥२४ मध्ये तस्य महामेरुर्विधूम इव पावकः । वेद्यर्द्धं दक्षिणं मेरोरुत्तरार्द्धं तथोत्तरम् ॥२५ वर्षाणि यानि षट् चैव तेषां ये वर्षपर्वताः । द्वे द्वे सहस्रे विस्तीर्णा योजनानां समुच्छ्रयात् ॥२६ जंबूद्वीपस्य विस्तारात्तेषामायाम उच्यते । योजनानां सहस्राणि शतं द्वावायतौ गिरी ॥२७ नीलश्च निषधश्चैव ताभ्यां हीनास्तु ये परे । श्वेतश्च हेमकूटश्च हिमवाञ्छृंगवांस्तथा ॥२८

नील—वैदूर्यमय—श्वेत—हिरण्मय—मोर के वर्हण के वर्ण वाला और शातकौम्भ तथा शृङ्गवान् है ।२२। ये सब पर्वतों के शिरोमणि राजा पर्वत हैं जो कि सिद्धों और चारणों के द्वारा सेवित रहा करते हैं अर्थात् इनमें सिद्ध और चारण निवास किया करते हैं । उनका अन्तर निष्कम्भ नौ सहस्र योजन कहा जाता है ।२३। मध्य में इलावृत नाम वाला गिरि है जो महामेरु के समंतस है । यह भी इसी प्रकार से नौ सहस्र ही सब ओर से विस्तार वाला है ।२४। इसके मध्य में महा है जो धूम से रहित अग्नि के समान देदीप्यमान है । मेरु के वेदी का अर्ध दक्षिण है तथा उत्तर अर्ध भाग उत्तर है ।२५। जो छै वर्ष हैं उनके जो वर्ष पर्वत हैं ऊँचाई से दो-दो सहस्र योजन विस्तीर्ण हैं ।२६। जम्बू द्वीप के विस्तार से उनका आयाम कहा जाता है । दो गिरि सौ सहस्र योजन आयत हैं ।२७। नील और निषध उन दोनों से जो दूसरे हैं वे हीन हैं । श्वेत—हेमकूट—हिमवान् तथा शृङ्गवान् हैं ।२८।

नवती द्वे अशीती द्वे सहस्राण्यायतास्तु तैः । तेषां मध्ये जनपदास्तानि वर्षाणि सप्त वै ॥२९ प्रपाताविषमैस्तैस्तु पर्वतैरावृतानि तु ।

पृथ्वी व्यायाम विस्तरः ] [ ८५

संततानि नदीभेदैरगम्यानि परस्परम् ॥३० वसंति तेषु सत्त्वानि नानाजातीनि सर्वशः । इदं हैमवतं वर्षं भारतं नाम विश्रुतम् ॥३१ हेमकूटं परं ह्यस्मान्नाम्ना किंपुरुषं स्मृतम् । नैषधं हेमकूटात्तु हरिवर्षं तदुच्यते ॥३२ हरिवर्षात्परं चापि मेरोश्च तदिलावृतम् । इलावृतात्परं नीलं रम्यकं नाम विश्रुतम् ॥३३ रम्यकात्परतः श्वेतं विश्रुतं तद्धिरण्मयम् । हिरण्मयात्परं चैव शृंगवत्तः कुरु स्मृतम् ॥३४ धनुः संस्थे तु विज्ञेये द्वे वर्षे दक्षिणोत्तरे । दीर्घाणि तत्र चत्वारि मध्यमं तदिलावृतम् ॥३५

उनसे दो सहस्र नब्बे और दो सहस्र अस्सी आयत हैं। उनके मध्य में जनपद हैं जो सात वर्ष है ।२६। उन प्रपातों से विषम पर्वतों से जो हैं। निरन्तर बहने वाली नदियों के बहुत से भेदों से जो परस्पर में गमन करने के अयोग्य है ।३०। उनमें अनेक जातियों वाले जीव निवास करते हैं और सभी ओर जो वहाँ रहा करते हैं। यह हैमवत वर्ष है जो भारत—इस नाम से प्रसिद्ध है ।३१। इससे आगे हेमकूट है जो नाम से किम्पुरुष कहा गया है। हेमकूट से आगे नैषध है जो हरि वर्ष कहा जाया करता है ।३२। हरिवर्ष से परे मेरु का वह इलावृत है। इलावृत से आगे नील है जो रम्यक नाम से विख्यात है ।३३। रम्यक से आगे श्वेत है जो हिरण्मय नाम से विश्रुत है। हिरण्मय से आगे शृङ्गवत् हैं जो कुरु कहा गया है ।३४। दक्षिण और उत्तर दिशा में धनुःसंस्थ दो वर्ष जानने चाहिए। वहाँ पर चार दीर्घ हैं जो मध्यम है वह इलावृत है ।३५।

अर्वाक् च निषधस्याथ वेद्यद्धं दक्षिणं स्मृतम् । परं नीलवतो यच्च वेद्यद्धं तु तदुत्तरम् ॥३६ वेद्यर्द्धं दक्षिणे त्रीणि त्रीणि वर्षाणि चोत्तरे । तयोर्मध्ये तु विज्ञेयो मेरुर्मध्य इलावृतम् ॥३७ दक्षिणेन तु नीलस्य निषधस्योत्तरेण तु ।

८६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

उदगायतो महाशैलो माल्यवान्नाम नामतः ॥३८ योजनानां सहस्रं तु आनील निषधायतः । आयामतश्चतु स्त्रिंशत्सहस्राणि प्रकीर्तितः ॥३९ तस्य प्रतीच्यां विज्ञेयः पर्वतो गंधमादनः । आयातमतोऽथ विस्तारान्माल्यवानिति विश्रुतः ॥४० परिमंडलयोर्मेरुर्मध्ये कनकपर्वतः । चतुर्वर्णः स सोवर्णः चतुरस्रः समुच्छ्रितः ॥४१ सुमेरुः शुशुभे शुभ्रो राजवत्समधिष्ठितः । तरुणादित्यवर्णाभो विधूम इव पावकः ॥४२

इसके अनन्तर निषध के नीचे वेदी के अर्धभाग दक्षिण कहा गया है। नीलवान् है और जो वेद्यर्ध है वह उत्तर है ।३६। वेद्यर्ध दक्षिण और उत्तर में तीन-तीन वर्ष है। उन दोनों के मध्य में मेरु जानना चाहिए और मध्य में इलावृत है ।३७। नील के दक्षिण दिशा की ओर और निषध की उत्तर की ओर—उत्तर की ओर आयत एक महान् शैल है जो नाम से माल्यवान कहा जाता है ।३८। एक सहस्र योजन नील और निषध तक आयत है और आयाम से यह चौबीस सहस्र योजन कहा गया है ।३९। इसके पश्चिम में गन्धमादन नामक पर्वत जानने के योग्य है। आयाम (चौड़ाई) और विस्तार से माल्यवान्—इस नाम से यह प्रसिद्ध है ।४०। परिमण्डलों के मध्य में मेरु पर्वत है जो कनक पर्वत है। वह चार वर्णों वाला और सुवर्ण का तथा चतुरस्र अर्थात् चौकोर समुच्छ्रित है ।४१। सुमेरु शोभाशाली होता था जो परम शुभ्र है और एक राजा के ही समान समधिष्ठित रहता है। इसके वर्ण की आभा तरुण सूर्य के ही समान है तथा बिना धुँआ वाली अग्नि के तुल्य है ।४२।

योजनानां सहस्राणि चतुरशीतिरुच्छ्रितः । प्रविष्टः षोडशाधस्ताद्विस्तृतः षोडशैव तु ॥४३ शरावसंस्थितत्वात्तु द्वात्रिंशन्मूर्धिन विस्तृतः । विस्तारात्त्रिगुणस्तस्य परिणाहः समंततः ॥४४ मंडलेन प्रमाणेन द्व्यस्रं मानं तदिष्यते ।

पृथ्वी व्यायाम विस्तारः ] [ ८७

चत्वारिंशत्सहस्राणि योजनानां समंततः ॥४५ अष्टाभिरधिकानि स्युस्त्र्यस्रे मानं प्रकीर्त्तितम् । चतुरस्रेण मानेन परिणाहः समंततः ॥४६ चतुःषष्टिसहस्राणि योजनानां विधीयते । स पर्वतो महादिव्यो दिव्योषधिसमन्वितः ॥४७ भुवनैरावृतः सर्वो जातरूपमयैः शुभैः । तत्र देवगणाः सर्वे गंधर्वोरगराक्षसाः ॥४८ शैलराजे प्रदृश्यंते शुभाश्चाप्सरसां गणाः । स तु मेरुः परिवृतो भुवनैर्भूतभावनैः ॥४९

वह चौरासी सहस्र योजन ऊँचा है । एक योजन चार कोस का होता है । सोलह योजन नीचे की ओर प्रविष्ट है और सोलह ही योजन विस्तार वाला है ।४३। शराव संस्थित होने से बत्तीस योजन मूर्धा में विस्तृत है । विस्तार में सभी ओर उसका तिगुना परिणाम है ।४४। मण्डल प्रमाण से उसका मान त्र्यस्र अभीष्ट होता है । सब ओर चौवालीस सहस्र योजन है ।४५। त्र्यस्र में अर्थात् तीनों ओर में उसका मान आठ अधिक योजन कहा गया है । सभी ओर चतुरस्र मान से परिणाम होता है ।४६। चौंसठ सहस्र योजन कहा जाता है । वह पर्वत बहुत ही अधिक दिव्य है और दिव्य औषधियों से समन्वित है ।४७। यह सम्पूर्ण सुवर्णमय परम शुभ भुवनों से घिरा हुआ है । वहाँ पर समस्त देवों के गण—गन्धर्व—और राक्षस निवास किया करते हैं ।४८। उस शैलों के राजा के ऊपर शुभ अप्सराओं के समुदाय भी दिखलाई दिया करते हैं । वह मेरु पर्वत भूतों के भावन भुवनों से परिवृत रहा करता है ।४९।

चत्वारो यस्य देशा वै चतुः पार्श्वेष्वधिष्ठिताः । भद्राश्वा भारताश्चैव केतुमालाश्च पश्चिमाः ॥५० उत्तराः कुरवश्चैव कृतपुण्यप्रतिश्रयाः । गंधमादनपार्श्वे तु परेषाऽपरगंडिका ॥५१ सर्वर्तु रमणीया च नित्यं प्रमुदिता शिवा । द्वात्रिंशत्तु सहस्राणि योजनैः पूर्वपश्चिमात् ॥५२

८८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

आयामतश्चतुस्त्रिंशत्सहस्राणि प्रमाणतः । तत्र ते शुभकर्माणः केतुमालाः प्रतिष्ठिताः ॥५३ तत्र काला नराः सर्वे महासत्त्वा महाबलाः । स्त्रियश्चोत्पलपत्राभाः सर्वास्ताः प्रियदर्शनाः ॥५४ तत्र दिव्यो महावृक्षः पनसः षड्रसाश्रयः । ईश्वरो ब्रह्मणः पुत्रः कामचारी मनोजवः ॥५५ तस्य पीत्वा फलरसं जीवंति च समायुतम् । पार्श्वे माल्यवतश्चापि पूर्वेऽपूर्वा तु गंडिका ॥५६

जिसके चार देश हैं जो चारों पाश्र्वों में समधिष्ठित हैं। जिनके नाम भद्राश्व—भरत—केतुपाल और पश्चिम है ।५०। उत्तर और कुरु कृतपुण्य प्रतिश्रय हैं। गन्धमादन के पार्श्व में तो यह पर अपर गण्डिका है ।५१। ये सभी ऋतुओं में परम रमणीय हैं और नित्य ही प्रमुदित तथा शिव हैं। पूर्व और पश्चिम से बत्तीस सहस्र योजनों से युक्त हैं ।५२। प्रमाण से इनका आयाम चौंतीस सहस्र योजनों वाला है। वहाँ पर वे परम शुभ कर्मों वाले कैतुमाल देश प्रतिष्ठित है ।५३। वहाँ पर जब नर काल हैं जो महान् सत्व वाले और महान् बल से सम्पन्न हैं और वहाँ की स्त्रियाँ कमलदल की आभा वाली तथा देखने में बहुत प्रिय लगती हैं ।५४। वहाँ पर एक बहुत ही उत्तम पनस का महान् वृक्ष है जिसमें छैरस विद्यमान रहा करते हैं। उसकी स्वामी ब्रह्मा का पुत्र कामना से चरण करने वाले मनोजव हैं ।५५। वहाँ पर समायुत काल पर्यन्त उसके फलों का रस का पान करके प्राणी जीवित रहा करते हैं। पूर्व में माल्यवान् के पार्श्व में एक अपूर्व गण्डिका है ।५६।

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॥ भारतदेश ॥

सूत उवाच—एवमेव निसर्गो वै वर्षाणां भारते शुभे । दृष्टः परमतत्त्वज्ञैर्भूय किं वर्णयामि वः ॥१ ऋषिरुवाच—यदिदं भारतं वर्षं यस्मिन्स्वायंभुवादयः । चतुर्दशैते मनवः प्रसासर्गेऽभवन्पुनः ॥२

भारतदेश ] [ ८६

एतद्वेदितुमिच्छामस्तन्नो निगद सत्तम ।
एतच्छ्रुतवचस्तेषामब्रवीद्रोमहर्षणः ॥३
अत्र वो वर्णयिष्यामि वर्षेऽस्मिन् भारते प्रजाः ।
इद तु मध्यमं चित्रं शुभाशुभफलोदयम् ॥४
उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमवद्दक्षिणं च यत् ।
वर्षं तद्भारतं नाम यत्रेयं भारती प्रजा ॥५
भरणाच्च प्रजानां वै मनुर्भरत उच्यते ।
निरुक्तवचनाच्चैवं वर्षं तद्भारतं स्मृतम् ॥६
इतः स्वर्गश्च मोक्षश्च मध्यश्चांतश्च गम्यते ।
न खल्वन्यत्र मर्त्यानां भूमौ कर्म विधीयते ॥७

श्रीसूतजी ने कहा—इस प्रकार से ही परम शुभ भारत में वर्षों का निसर्ग है जो कि परम तत्वों के ज्ञाताओं के द्वारा देखा गया है । अब फिर आपके सामने मैं क्या वर्णन करूं ? ।१। ऋषि ने कहा—जो यह भारतवर्ष है जिसमें ये चौदह स्वायम्भुव आदि मनुगण फिर प्रजा के सृजन करने में थे ।२। हे श्रेष्ठ पुरुषों में परमोत्तम ! हम लोग यही जानने की इच्छा करते हैं । वही आप हमारे समक्ष में वर्णन कीजिए । रोम हर्षणजी ने उन ऋषियों के इस वचन का श्रवण करके कहा था ।३। यहाँ पर इस भारतवर्ष में आप लोगों के सामने जो प्रजा हुई थी उनका मैं वर्णन करूँगा । यह तो मध्यम चित्र है जो शुभ और अशुभ फलों के उदय वाला है ।४। समुद्र के उत्तर में और हिमवान् के दक्षिण में है वह भारत नाम वाला वर्ष है जहाँ पर यह भारत की प्रजा है ।५। प्रजाओं के भरण करने से भरत मनु कहा जाया करते हैं । इसी निरुक्ति के वचन से यह वर्ष भारत—इस नाम से कहे गया है । यहाँ से स्वर्ग होता है और यहाँ से ही बारम्बार जीवन-मरण के आवागमन से मुक्त हुआ करता है और मध्य तथा अन्त का ज्ञान मनुष्यों का कर्म करने का क्षेत्र नहीं है अर्थात् कर्म करने की भूमि यही देश है ।६-७।

भारतस्यास्य वर्षस्य नव भेदान्निबोधत ।
समुद्रांतरिता ज्ञेयास्ते त्वगम्याः परस्परम् ॥८

६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

इन्द्रद्वीपः कशेरुमांस्ताम्रवर्णो गभस्तिमान् ।
नागद्वीपस्तथा सौम्यो गांधर्वस्त्वथ वारुणः ॥६
अयं तु नवमस्तेषां द्वीपः सागरसंवृतः ।
योजनानां सहस्रं तु द्वीपोऽयं दक्षिणोत्तरात् ॥१०
आयतो ह्याकुमार्य्या वै चागंगाप्रभवाच्च वै ।
तिर्य्यगुत्तरविस्तीर्णः सहस्राणि नवैव तु ॥११
द्वीपो ह्युपनिविष्टोऽयं म्लेच्छैरंतेषु सर्वशः ।
पूर्वे किराता ह्यस्यांते पश्चिमे यवनाः स्मृताः ॥१२
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या मध्ये शूद्राश्च भागशः ।
इज्ज्यायुधवाणिज्याभिर्वर्त्तयंतो व्यवस्थिताः ॥१३
तेषां संव्यवहारोऽत्र वर्त्तते वै परस्परम् ।
धर्मार्थकामसंयुक्तो वर्णानां तु स्वकर्मसु ॥१४

इस भारत वर्ष के नौ भेद हैं उनको आप लोग भली-भाँति समझ लीजिए ? वे सब समुद्र से अन्तरित हैं—ऐसे ही जान लेने चाहिए और परस्पर में वे सब अगम्य हैं अर्थात् अज्ञेय एवं गमन न करने के योग्य हैं ।८। उनके नाम ये हैं—इन्द्रद्वीप—कशेरुमान्—ताम्रवर्ण—गभस्तिमान्—नाग द्वीप—सौम्य—गन्धर्व—वारुण ।६। यह नौवाँ उन द्वीपों में है जो सागर से संवृत है । यह द्वीप दक्षिण-उत्तर से एक सहस्र योजन है ।१०। भागीरथी गङ्गा के उद्गम स्थान से कन्या कुमारी तक यह आयत है । नौ सहस्र योजन तिरछा उत्तर की ओर विस्तीर्ण है ।११। यह द्वीप अन्तों में सभी ओर म्लेच्छों द्वारा उपनिविष्ट है । इसके अन्त में पूर्व में किरात रहा करते हैं और पश्चिम में यवन लोग वाले बताये गये हैं ।१२। मध्य के भागों में ब्राह्मण—क्षत्रिय—वैश्य और शूद्र निवास करते हैं। जो यज्ञार्चन—शस्त्र—प्रयोग—वाणिज्य से अभिवर्त्तन करते हुए व्यवस्थित हैं ।१३। यहाँ पर इन चारों वर्णों में परस्पर में समीचीन व्यवहार रहा करता है । अपने वर्ण के अनुसार जो इनके अपने कर्म हैं उन्हीं में यह व्यवहार धर्म अर्थ और काम से समन्वित होता है ।१४।

भारतवर्ष ] [ ६१

संकल्पः पंचमानां च ह्याश्रमाणां यथाविधि । इह स्वर्गापवर्गार्थं प्रवृत्तिर्येषु मानुषी ॥१५ यस्त्वयं नवमो द्वीपस्तिर्यगायाम उच्यते । कृत्स्नं जयति यो ह्येनं सम्राडित्यभिधीयते ॥१६ अयं लोकस्तु वै सम्राडंतरिक्षं विराट् स्मृतम् । स्वराडसौ स्मृतो लोकः पुनर्वक्ष्यामि विस्तरात् ॥१७ सप्तैवास्मिन्सुपर्वाणो विश्रुताः कुलपर्वताः । तेषां सहस्रशश्चान्ये पर्वतास्तु समीपगाः ॥१८ अविज्ञाताः सारवंतो विपुलाश्चित्रसानवः । मंदरः पर्वतश्रेष्ठो वैहारो दुर्दु रस्तथा ॥२० कोलाहलः ससुरसो मैनाको वैद्युतस्तथा । वातंधमो नागगिरिस्तथा पाण्डुरपर्वतः ॥२१

पंचमान इस आश्रमों के सङ्कल्प विधि के ही अनुसार होता है । वहाँ पर जिनमें स्वर्ग प्राप्ति और मोक्ष के लिये मानुषी प्रवृत्ति रहा करती है । ।१५। जो यह नवम द्वीप है वह तिर्यग् आयाम वाला कहा जाता है । इस सम्पूर्ण द्वीप पर अपने बल-विक्रम के द्वारा विजय प्राप्त कर लेता है वह यहाँ का सम्राद् चक्रवर्ती राजा के नाम से कहा जाया करता है ।१६। यह लोक तो सम्राट है और अन्तरिक्ष विराट् कहा गया है । यह लोक स्वराट् कहा गया है । मैं फिर विस्तार के साथ बतलाऊँगा ।१७। इस द्वीप में सुपर्व सात ही कुल पर्वत प्रसिद्ध हैं । महेन्द्र—मलय—सह्य—शुक्तिमान—ऋक्ष पर्वत—विन्ध्य और पारियात्र ये ही सात कुल पर्वत है । इनके समीप में रहने वाले अन्य भी सहस्रों पर्वत हैं ।१८-१९। बहुत से पर्वतों का ज्ञान ही नहीं है और वे सार सम्पन्न तथा विचित्र शिखरों वाले हैं । पर्वतों में परम श्रेष्ठ मन्दर—वैहार—दुर्दु र—कोलाहल—समुरस—मैनाक—वैद्युत—वातंधम—नागगिरि और पाण्डुर पर्वत हैं ।२०-२१।

तुंगप्रस्थः कृष्णगिरिर्गोधनो गिरिरेव च । पुष्पगिर्युज्जयंतौ च शैलो रैवतकस्तथा ॥२२ श्रीपर्वतश्चित्रकूटः कूटशैलो गिरिस्तथा ।

६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अन्ये तेभ्योऽपरिज्ञाता ह्रस्वाः स्वल्पोपजीविनः ॥२३ तैर्विमिश्रा जनपदा आर्या म्लेच्छाश्च भागशः । पीयन्ते यैर्रिमा नद्यो गंगा सिंधुः सरस्वती ॥२४ शतद्रुश्चंद्रभागा च यमुना सरयूस्तथा । इरावती वितस्ता च विपाशा देविका कुहूः ॥२५ गोमती धूतपापा च बुद्बुदा च दृषद्वती । कौशिकी त्रिदिवा चैव निष्ठीवी गंडकी तथा ॥२६ चक्षुर्लोहित इत्येता हिमवत्पादनिस्सृताः । वेदस्मृतिर्वेदवती वृत्रघ्नी सिंधुरेव ॥२७ कर्णाशा नंदना चैव सदानीरा महानदी । पाशा चर्मणवतीनूपा विदिशा वेत्रवत्यपि ॥२८

तुङ्गप्रस्थ—कृष्णगिरि—गोधनगिरि—पुष्प गिरि—उज्जयन्त तथा श्वेतक शैल है ।२२। श्री पर्वत—चित्रकूट—कूट शैल गिरि हैं । उनसे भी अन्य छोटे-छोटे गिरि हैं जो भली-भाँति परिज्ञात नहीं हे और स्वल्पोप जीवी है ।२३। उन शैलों से मिले-जुले जनपद यह भी हैं जिनके भागों में आर्य तथा म्लेच्छ निवास किया करते हैं जिनके द्वारा इन नदियों का पान किया जाया करता है । उन नदियों के कुछ नामों का परिगणन किया जाता है जैसे— गङ्गा—सिन्धु—और सरस्वती हैं ।२४। शतद्रु—चन्द्रभागा—जमुना—सरयू—इरावती—वितस्ता—विपाशा—देविका—कुहू है ।२५। गोमती—धूतपापा—बुद्बुदा—दृषद्वती—कौशिकी—त्रिदिवा—निष्ठीवी—गण्डकी—चक्षु—लोहित—ये सब नदियाँ हिमवान् महाशैल के पाद से निकली हैं । वेदस्मृति—वेदवती—वृत्रघ्नी और सिन्धु है । वर्णाशा—नन्दना—सदानीरा—महानदी—पाशा—चर्मणवती—नूपा—विदिशा—वेत्रवती है ।२६-२८।

क्षिप्रा ह्यवंति च तथा पारियात्राश्रयाः स्मृताः । शोणो महानदश्चैव नर्म्मदा सुरसा क्रिया ॥२६ मंदाकिनी दशार्णा च चित्रकूटा तथैव च । तमसा पिप्पला श्येना करमोदा पिशाचिका ॥३० चित्रोपला विशाला च बंजुला वास्तुवाहिनी ।

भारतदेश ] [ ६३

सनेरुजा शुक्तिमती मंकुती त्रिदिवा क्रतुः ॥३१ ऋक्षवत्संप्रसूतास्ता नद्यो मणिजलाः शिवाः । तापी पयोष्णी निर्विन्ध्या सृपा च निषधा नदी ॥३२ वेणी वैतरणी चैव क्षिप्रा वाला कुमुद्वती । तोया चैव महागौरी दुर्गा वान्तशिला तथा ॥३३ विन्ध्यपादप्रसूतास्ता नद्यः पुण्यजलाः शुभाः । गोदावरी भीमरथी कृष्णवेणाथ मंजुला ॥३४ तुंगभद्रा सुप्रयोगा बाह्या कावेर्यथापि च । दक्षिणप्रवहा नद्यः सह्यपादाद्विनिः स्मृताः ॥३५

क्षिप्रा और अवन्ति ये नदियां पारियात्र के समाश्रय वाली हैं—ऐसा कहा गया है—शोण महानन्द हैं। सुरसा—नर्मदा—क्रिया—मन्दाकिनी दशार्णा—चित्रकूटा—तमसा—पिप्पला—श्येना—करमोदा और पिशाचिका—ये नदियाँ हैं ।२९-३०। चित्रोत्पला—विशाला—मंजुला—वास्तुवाहिनी—सनेरुजा—शुक्तिमती—मंकुती—त्रिदिवा—ऋतु नदियां हैं ।३१। ये सब ऋक्ष वत्स पर्वत से संभूत होने वाली हैं जिनका जल मणि के समान परम स्वच्छ और शिव है । तापी—पयोष्णी—निर्विन्ध्या—सृपा और निषधा नदी हैं ।३२। वेणी—वैतरणी—वाला—कुमुद्वती—तोया—महागौरी—दुर्गा—वान्तशिला नदियाँ हैं ।३३। ये सब नदियां विन्ध्य गिरि के पाद से प्रसूत होने वाली हैं जिनका जल परम पुण्यमय ह और जो बहुत ही शुभ है । गोदावरी-भीमरथी-कृष्णवेणा-मंजुला-तुङ्गभद्रा-सुप्रयोगा-बाह्या-कावेरी—ये नदियाँ दक्षिणा की ओर प्रवाह करने वाली हैं और सह्य गिरि के पाद से निकलने वाली हैं ।३४-३५।

कृतमाला ताम्रपर्णी पुष्पजात्युत्पलावती । नद्योऽभिजाता मलयात्सर्वाः शीतजलाः शुभाः ॥३६ त्रिसामा ऋषिकुल्या च मंजुला त्रिदिवाबला । लांगूलिनी वंशधरा महेन्द्रतनयाः स्मृताः ॥३७ ऋषिकुल्या कुमारी च मंदगा मंदगामिनी । कृपा पलाशिनी चैव शुक्तिमत्प्रभवाः स्मृताः ॥३८

६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तास्तु नद्यः सरस्वत्यः सर्वा गंगाः समुद्रगाः । विश्वस्य मातरः सर्वा जगत्पापहराः स्मृताः ॥३६

तासां नद्युपनद्योऽन्याः शतशोऽथ सहस्रशः । तास्विमे कुरुपांचालाः शाल्वा माद्रेयजांगलाः ॥४०

शूरसेना भद्रकारा बोधाः सहपटच्चराः । मत्स्याः कुशलयाः सौशल्याः कुंतलाः काशिकौशलाः ॥४१

गोधा भद्राः कलिंगाश्च मागधाश्चोत्कलैः सह । मध्यदेश्या जनपदाः प्रायशस्तत्र कीर्त्तिताः ॥४२

कृतमाला-ताम्रपर्णी-पुष्पजाती-उत्पलावती—ये सब नदियां मलय पर्वत से अभिजात हुई हैं जिनका जल बहुत ही शीतल और शुभ है ।३६। त्रिसामा-ऋषिकुल्या-बंजुला-त्रिदिवा-बला-लांगूलिनी-वंशधरा-ये सब महेन्द्र-गिरि की तनया कही गयी हैं ।३७। ऋषिकुल्या-मन्दगा-मन्द गामिनी-कृपा-पलाशिनी—ये नदियां शुक्तिमान् पर्वत से समुत्पत्ति पाने वाली है ।३८। ये सब नदियां सरस्वती हैं और सब समुद्र में गमन करने वाली गङ्गा है । ये सभी इस विश्व की मातायें हैं और जगत् के समस्त पापों के हरण करने वाली कही गयी हैं ।३६। इन सब नदियों की अन्य सैकड़ों और हजारों ही उप नदियां हैं । उनमें ये कुरु पाञ्चाल-शाल्व-माद्रेय-जांगल-शूरसेन-भद्रकार-बोध-सहपटच्चर-मत्स्य कुशल्य-कुन्तल-काशि-कौशल-गोध-भद्र-कलिंग-मागध-उत्कल-मध्य देश में होने वाले जनपद प्रायः करके वहाँ पर कीर्त्तित किये गये हैं ।४०-४२।

सह्यस्य चोत्तरांतेषु यत्र गोदावरी नदी । पृथिव्यामपि कृत्स्नायां स प्रदेशो मनोरमः ॥४३

तत्र गोवर्द्धनं नाम पुरं रामेण निर्मितम् । रामप्रियार्थ स्वर्गीया वृक्षा दिव्यास्तथौषधीः ॥४४

भरद्वाजेन मुनिना तत्प्रियार्थेऽवरोपिताः । अतः पुरवरोद्देशस्तेन जज्ञे मनोरमः ॥४५

वाहलीका वाटधानाश्च आभीरा कालतोयकाः । अपरांताश्च सुह्याश्च पाञ्चालाश्चर्ममंडलाः ॥४६

भारतदेश ] [ ६५

पंड्याश्च केरलाश्चैव चोलाः कुल्यास्तथैव च । सेतुका मूषिकाश्चैव क्षपणा वनवासिकाः ॥५६ अत्रिगण-भरद्वाज-प्रस्थल-दशेरक-लमक-तालशाल-भूषिक-ईजिक-ये सब उत्तर दिशा में हैं। अब जो पूर्व दिशा में देश हैं उनका भी आप ज्ञान प्राप्त कर लीजिए। अङ्ग-दङ्ग-चोल भद्र-किरातों की जातियां-तोमर-हंसभंग-काश्मीर-तंगण-झिल्लिक-आहुक-हुणदर्व-अन्ध्रगक-मुद्गर अन्तर्गिरि-बहिर्गिरि—इसके अनन्तर प्लवङ्गव-मलद और मलवर्त्तिक जानने के योग्य हैं। ।५०-५३। समंतर-प्रावृषेय-भार्गव-गोपपार्थिव-प्राग्ज्योतिष-पुण्ड्र-विदेह-ताम्रलिप्तिक-मल्ल-मगध और गोनर्द—ये जनपद पूर्वी दिशा में हैं ऐसा कहा गया है। इसके उपरान्त दूसरे दक्षिणा पथवासी जनपद हैं ।५३-५४। पण्ड्य-केरल-चोल-कुल्य-सेतुक-मूषिक-क्षपण और वनवासिक देश हैं ।५६।

महाराष्ट्रा महिषिकाः कलिङ्गाश्चैव सर्वशः । आभीराश्च सहैषीका आटव्या सारवास्तथा ॥५७ पुलिंदा विन्ध्यमौलीया वैदर्भा दंडकैः सह । पौरिका मौलिकाश्चैव अश्मका भोगवर्द्धनाः ॥५८ कौंकणाः कुंतलाश्चांध्राः पुलिन्दाङ्गारमारिषाः । दाक्षिणाश्चैव ये देशा अपरांस्तान्निबोधत ॥५९ सूर्य्यारकाः कलिवना दुर्गालाः कुन्तलैः । पौलेयाश्च किराताश्च रूपकास्तापकैः सह ॥६० तथा करीत्तयश्चैव सर्वे चैव करंधराः । नासिकाश्चैव ये चान्ये ये चैवांतरनर्मदाः ॥६१ सहकच्छाः समाहेयाः सह सारस्वतैरपि । कच्छिपाश्च सुराष्ट्राश्च आनर्ताश्चार्बुदै सह ॥६२ इत्येते अपरांताश्च शृणुध्वं विन्ध्यवासिनः । मलदाश्च करूषाश्च मेकलाश्चोत्कलैः सह ॥६३

महाराष्ट्र-महिषिक-कलिङ्ग-सब ओर आभीर-सहैषीक-आटव्य-सारव-पुलिन्द-विन्ध्य मौलेय-वैदर्भ-दण्डक-पौरिक-मौलिक-अश्मक-भोग वर्धन-कोङ्कण-कुन्तल-आन्ध्र-पुलिन्द-अंगार-मारिष-ये सब देश दक्षिणा पथ वासी

६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

गांधारा यवनांश्चैव सिंधुसौवीरमण्डलाः । चीनांश्चैव तुषारांश्च पल्लवा गिरिगह्वराः ॥४७ शका भद्राः कुलिंदाश्च पारदा विन्ध्यचूलिकाः । अभीषाहा उलूतांश्च केकया दशमालिकाः ॥४८ ब्राह्मणाः क्षत्रियाश्चैव वैश्यशूद्रकुलानि तु । कांबोजा दरदाश्चैव बर्बरा अंगलोहिकाः ॥४६

सह्य गिरि के उत्तरान्तों में जहाँ पर गोदावरी नदी बहती है इस सम्पूर्ण पृथिवी में वह प्रदेश परम सुन्दर है ।४३। वहाँ पुर है जिसका गोवर्धन नाम है और इसका निर्माण श्रीराम ने किया था । वहाँ पर श्रीराम के प्रिय स्वर्गीय और अत्युत्तम वृक्ष तथा औषधियाँ हैं ।४४। इन सबका अब रोपण श्रीराम की प्रीति के लिए भरद्वाज मुनि ने किया था । अतएव उन्होंने इस पुरवर का मनोरम उद्देश्य किया था। वाहलीक-वाटधान-आभीर-कालतोयक-अपरान्त-सुह्य-पाञ्चाल-चर्ममंडल-गान्धार-यवन-सिन्धु सौवीर मण्डल-चीन-तुषार-पल्लव-गिरि गह्वरशक-भद्र-कुलिन्द-पारद-विन्ध्यचूलिका-अभी-षाहु-उलूत-केकय-दशमालिक ये सब देश तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कुल, काम्बोज-दरद-उर्वर और अङ्गलोहिक ये सब देश हैं ।४६-४६।

अत्रयः सभरद्वाजाः प्रस्थलाश्च दशेरकाः । लमकास्तालशालाश्च भूषिका ईजिकैः सह ॥५० एते देशा उदीच्या वै प्राच्यान्देशान्निबोधत । अंगवंगाश्चोलभद्राः किरातानां च जातयः । तोमरा हंसभंगाश्च काश्मीरास्तंगणास्तथा ॥५१ झिल्लिकाश्चाहुकाश्चैव हूणदर्वास्तथैव च ॥५२ अंध्रवाका मुद्गरका अंतर्गिरिबहिर्गिराः । ततः प्लवंगवो ज्ञेया मलदा मलवर्तिकाः ॥५३ समंतराः प्रावृषेया भार्गवा गोपपार्थिवाः । प्राग्ज्योतिषाश्च पुंड्राश्च विदेहास्ताम्रलिप्तकाः ॥५४ मल्ला मगधगोनर्दाः प्राच्यां जनपदां स्मृताः । अथापरे जन पदा दक्षिणापथवासिनः ॥५५

युग संख्यावर्ती ] [ ६७

हैं। और जो दक्षिण में होने वाले दूसरे जनपद हैं उनका भी ज्ञान प्राप्त करलो ।५७-५६। सूर्पारिक-कलिवन-गुर्गल-कुन्तल-पौलेय-किरात-रूपक-तापक-करीति और सब करन्धर और नासिक तथा जो अन्य नर्मदा के अन्तर में हैं ।६०-६१। सहकच्छ-समाहेय-सारस्वत-कच्छिप-सुराष्ट्र-आनर्त-अर्बुद—ये सब और अपरान्त जो विन्ध्य के वास करने वाले हैं उनको आप सुनिये। मलद-करुष-मेकल-उत्कल-ये जनपद विन्ध्य के वास करने वाले हैं। ।६२-६३।

उत्तमानां दशार्णाश्च भोजाः किष्किन्धकैः सह ।
तोशलाः कोशलाश्चैव त्रैपुरा वैदिशास्तथा ॥६४
तुहुण्डा बर्वराश्चैव षट्पुरा नैषधै-सह ।
अनूपास्तुं डिकेराश्च वीतिहोत्रा ह्यवंतयः ॥६५
एते जनपदाः सर्वे विन्ध्यपृष्ठनिवासिनः ।
अतो देशान्प्रवक्ष्यामि पर्वताश्रयिणश्च ये ॥६६
निहीरा हंसमार्गाश्च कुपथास्तंगणा शकाः ।
खपप्रावरणाश्चैव ऊर्णा दर्वाः सहूहूकाः ॥६७
त्रिगर्त्ता मंडलाश्चैव किरातास्तामरैः सह ।
चत्वारि भारते वर्षे युगानि ऋषयोऽब्रुवन् ॥६८
कृतं त्रेतायुगं चैव द्वापरं तिष्यमेव च ।
तेषां निसर्गं वक्ष्यामि उपरिष्टादशेषतः ॥६९

उत्तमों के दशार्ण-भोज-किष्किन्धक-तोशल-कोशल-त्रैपुर-वैदिश—तुहुण्ड—वर्वर—षट्पुर—नैषध—अनूप—तुण्डिकेर—वीतिहोत्र-अवन्ति—ये सब जनपद विन्ध्य गिरि के ऊपर निवास करने वाले हैं। इसके आगे मैं उन देशों का वर्णन करूँगा जो पर्वतों का आश्रय ग्रहण करके निवास किया करते हैं ।६४-६६। निहीर-हंसमार्ग-कुपथ-तङ्गण-शक-अप प्रावरण-ऊर्ण-दर्व-सहूह्क-त्रिगर्त-मण्डल-किरात-तामर-ये समस्त देश पर्वतों के ऊपर समाश्रय लेने वाले हैं। ऋषियों ने भारतवर्ष में चार युगों का होना बतलाया था। प्रथम कृतयुग अर्थात् सत्ययुग है—दूसरा त्रेता, तीसरा द्वापर और चौथा तिष्य है। इन सबका निसर्ग ऊपर से ही सम्पूर्ण मैं आपको बतलाऊँगा ।६७-६९।

६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

युग संख्यावर्तं

ऋषिरुवाच-चतुर्युगानि यान्यासन्पूर्वं स्वायंभुवेऽन्तरे । तेषां निसर्गं तत्त्वं च श्रोतुमिच्छामि विस्तरात् ॥१॥ सूत उवाच-पृथिव्यादिप्रसंगेन यन्मया प्रागुदीरितम् । तेषां चतुर्युगं ह्येतत्तद्वक्ष्यामि निबोधत ॥२ संख्ययेह प्रसंख्याय विस्तराच्चैव सर्वशः । युगं च युगभेदश्च युगधर्मस्तथैव च ॥३ युगसंख्यांशकश्चैव युगसंधानमेव च । षट्प्रकाशयुगाख्यैषा तां प्रवक्ष्यामि तत्वतः ॥४ लौकिकेन प्रमाणेन निष्पाद्याब्दं तु मानुषम् । तेनाब्देन प्रसंख्याये वक्ष्यामीह चतुर्युगम् । निमेषकालतुल्यं हि विद्याल्लध्वक्षरं च यत् ॥५ काष्ठा निमेषा दश पंच चैव त्रिंशच्च काष्ठा गणयेत्कलां तु । त्रिंशत्कलाश्चापि भवेन्मुहूर्तंस्तैस्त्रिंशता रात्र्यहनी समेते ॥६ अहोरात्रौ विभजते सूर्यो मानुषलौकिको ॥७

ऋषि ने कहा—जो चार युग हैं और पूर्व में स्वायम्भुव मन्वन्तर में थे। हे भगवन् ! उनका निसर्ग कैसे हुआ और उनका क्या तत्व है—यह मैं विस्तार के साथ श्रवण करना चाहता हूँ ।१। श्रीसूत जी ने कहा—पृथिवी आदि के प्रसंग से जो मैंने पूर्व में कहा था उनके चारों युगों के विषय में मैं अब बतलाऊँगा । उसको आप भली-भाँति समझ लीजिए ।२। यहाँ पर संख्या के द्वारा प्रसंख्यान करके और सब प्रकार से विस्तृत मैं कहूँगा । युग-युग का भेद-युग का धर्म-युग सन्धि का अंश-युग सन्धान-यह षट् प्रकाश युग की आख्या है । उन सबको मैं तात्विक रूप से आपको बतलाऊँगा ।३-४। लौकिक प्रमाण मनुष्य के वर्ष का निष्पादन करके उसी शब्द से प्रसंख्यान करके यहाँ पर मैं चारों युगों को बतलाऊँगा । निमेष काल उसे ही जानना चाहिए जो कि लघु अक्षर के तुल्य होता है ।५। पन्द्रहनिमेषों का जितना काल होता है उसकी एक काष्ठा होती है और तीस काष्ठाओं के समय को