संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपृथ्वी व्यायाम विस्तरः ] [ ८३
द्वात्रिंशच्च सहस्राणि विस्तीर्णः स च मूर्द्धनि ॥१६ वृत्ताकृतिप्रमाणश्च चतुरस्रः समुच्छ्रितः । नानावर्णस्तु पार्श्वेषु प्रजापतिगुणान्वितः ॥१७ नाभिबंधनसंभूतो ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः । पूर्वतः श्वेतवर्णश्च ब्राह्मणस्तस्य तेन तत् ॥१८ पार्श्वमुत्तरतस्तस्य रक्तवर्णः स्वभावतः । तेनास्य क्षत्रभावस्तु मेरोर्नानार्थकारणात् ॥१९ पीतश्च दक्षिणेनासी तेन वैश्यत्वमिष्यते । भृंगपत्रनिभश्चापि पश्चिमेन समाचितः ॥२० तेनास्य शूद्रभावः स्यादिति वर्णाः प्रकीर्तिताः । वृत्तः स्वभावतः प्रोक्तो वर्णतः परिमाणतः ॥२१
हिमवान् गिरि में प्रायः हिम समूह होता है और हेमकूट पर्वत हेम से संयुत है। निषध एक महान पर्वत है जो सभी ऋतुओं में सुखदायी होता है ।१५। मरु पर्वत चार वर्णों वाला है और सुवर्ण से युक्त है यह अधिक सुन्दर कहा गया है और मूर्धा में बत्तीस सहस्र योजनों के विस्तार वाला है ।१६। यह वृत्त आकृति और प्रमाण वाला है तथा चौकोर और समुच्छ्रित अर्थात् ऊँचा है। इसके पार्श्व भागों में अनेक वर्ण हैं तथा यह प्रजापति के गुणों से संयुत है ।१७। अव्यक्त जन्म वाले ब्रह्माजी के नाभिबन्धन से यह समुत्पन्न हुआ है। उसके पूर्व की ओर यह श्वेत वर्ण वाला है इससे ब्राह्मण है ।१८। उत्तर की ओर पार्श्वभाग उसका स्वभाव से ही रक्तवर्ण है। इस कारण से मेरु के अनेक अर्थ कारण से इसका क्षत्र भाव है ।१९। यह दक्षिण दिशा की ओर पीत है इससे इसका वैश्यभाव अभीष्ट होता है। पश्चिम की ओर पीत है इससे इसका वैश्यभाव अभीष्ट होता है। पश्चिम की ओर यह भृङ्गपत्र के सदृश समाचित है ।२०। इस कारण से इसका शूद्रभाव होता है—इस तरह से इसके चार वर्ण कहे गये हैं। यह स्वभाव से वृत्त कहा है और वर्ण तथा परिमाण से भी बताया गया है ।२१।
नीलश्च वैदूर्यमयः श्वेतः शुक्लो हिरण्मयः । मयूरबर्हवर्णस्तु शातकौम्भश्च शृंगवान् ॥२२