संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
एते पर्वतराजानः सिद्धचारणसेविताः । तेषामंतरविष्कंभो नवसाहस्र उच्यते ॥२३ मध्ये त्विलावृतं नाम महामेरोः समंततः । नवैकं तु सहस्राणि विस्तीर्णं सर्वतस्तु तत् ॥२४ मध्ये तस्य महामेरुर्विधूम इव पावकः । वेद्यर्द्धं दक्षिणं मेरोरुत्तरार्द्धं तथोत्तरम् ॥२५ वर्षाणि यानि षट् चैव तेषां ये वर्षपर्वताः । द्वे द्वे सहस्रे विस्तीर्णा योजनानां समुच्छ्रयात् ॥२६ जंबूद्वीपस्य विस्तारात्तेषामायाम उच्यते । योजनानां सहस्राणि शतं द्वावायतौ गिरी ॥२७ नीलश्च निषधश्चैव ताभ्यां हीनास्तु ये परे । श्वेतश्च हेमकूटश्च हिमवाञ्छृंगवांस्तथा ॥२८
नील—वैदूर्यमय—श्वेत—हिरण्मय—मोर के वर्हण के वर्ण वाला और शातकौम्भ तथा शृङ्गवान् है ।२२। ये सब पर्वतों के शिरोमणि राजा पर्वत हैं जो कि सिद्धों और चारणों के द्वारा सेवित रहा करते हैं अर्थात् इनमें सिद्ध और चारण निवास किया करते हैं । उनका अन्तर निष्कम्भ नौ सहस्र योजन कहा जाता है ।२३। मध्य में इलावृत नाम वाला गिरि है जो महामेरु के समंतस है । यह भी इसी प्रकार से नौ सहस्र ही सब ओर से विस्तार वाला है ।२४। इसके मध्य में महा है जो धूम से रहित अग्नि के समान देदीप्यमान है । मेरु के वेदी का अर्ध दक्षिण है तथा उत्तर अर्ध भाग उत्तर है ।२५। जो छै वर्ष हैं उनके जो वर्ष पर्वत हैं ऊँचाई से दो-दो सहस्र योजन विस्तीर्ण हैं ।२६। जम्बू द्वीप के विस्तार से उनका आयाम कहा जाता है । दो गिरि सौ सहस्र योजन आयत हैं ।२७। नील और निषध उन दोनों से जो दूसरे हैं वे हीन हैं । श्वेत—हेमकूट—हिमवान् तथा शृङ्गवान् हैं ।२८।
नवती द्वे अशीती द्वे सहस्राण्यायतास्तु तैः । तेषां मध्ये जनपदास्तानि वर्षाणि सप्त वै ॥२९ प्रपाताविषमैस्तैस्तु पर्वतैरावृतानि तु ।