संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपृथ्वी व्यायाम विस्तरः ] [ ८५
संततानि नदीभेदैरगम्यानि परस्परम् ॥३० वसंति तेषु सत्त्वानि नानाजातीनि सर्वशः । इदं हैमवतं वर्षं भारतं नाम विश्रुतम् ॥३१ हेमकूटं परं ह्यस्मान्नाम्ना किंपुरुषं स्मृतम् । नैषधं हेमकूटात्तु हरिवर्षं तदुच्यते ॥३२ हरिवर्षात्परं चापि मेरोश्च तदिलावृतम् । इलावृतात्परं नीलं रम्यकं नाम विश्रुतम् ॥३३ रम्यकात्परतः श्वेतं विश्रुतं तद्धिरण्मयम् । हिरण्मयात्परं चैव शृंगवत्तः कुरु स्मृतम् ॥३४ धनुः संस्थे तु विज्ञेये द्वे वर्षे दक्षिणोत्तरे । दीर्घाणि तत्र चत्वारि मध्यमं तदिलावृतम् ॥३५
उनसे दो सहस्र नब्बे और दो सहस्र अस्सी आयत हैं। उनके मध्य में जनपद हैं जो सात वर्ष है ।२६। उन प्रपातों से विषम पर्वतों से जो हैं। निरन्तर बहने वाली नदियों के बहुत से भेदों से जो परस्पर में गमन करने के अयोग्य है ।३०। उनमें अनेक जातियों वाले जीव निवास करते हैं और सभी ओर जो वहाँ रहा करते हैं। यह हैमवत वर्ष है जो भारत—इस नाम से प्रसिद्ध है ।३१। इससे आगे हेमकूट है जो नाम से किम्पुरुष कहा गया है। हेमकूट से आगे नैषध है जो हरि वर्ष कहा जाया करता है ।३२। हरिवर्ष से परे मेरु का वह इलावृत है। इलावृत से आगे नील है जो रम्यक नाम से विख्यात है ।३३। रम्यक से आगे श्वेत है जो हिरण्मय नाम से विश्रुत है। हिरण्मय से आगे शृङ्गवत् हैं जो कुरु कहा गया है ।३४। दक्षिण और उत्तर दिशा में धनुःसंस्थ दो वर्ष जानने चाहिए। वहाँ पर चार दीर्घ हैं जो मध्यम है वह इलावृत है ।३५।
अर्वाक् च निषधस्याथ वेद्यद्धं दक्षिणं स्मृतम् । परं नीलवतो यच्च वेद्यद्धं तु तदुत्तरम् ॥३६ वेद्यर्द्धं दक्षिणे त्रीणि त्रीणि वर्षाणि चोत्तरे । तयोर्मध्ये तु विज्ञेयो मेरुर्मध्य इलावृतम् ॥३७ दक्षिणेन तु नीलस्य निषधस्योत्तरेण तु ।