संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
विस्तरान्मण्डलाच्चैव योजनैस्तन्निबोधत । शतमेकं सहस्राणां योजनाग्रात्समंततः ॥६ नानाजनपदाकीर्णः पुरैश्च विविधैश्शुभैः । सिद्धचारणसंकीर्णः पर्वतैरुपशोभितः ॥१० सर्वधातुनिबद्धश्च शिलाजालसमुद्भवैः । पर्वतप्रभवाभिश्च नदीभिः सर्वतस्ततः ॥११ जंबूद्वीपः पृथुः श्रीमान् सर्वतः पृथुमंडलः । नवभिश्चावृतः सर्वो भुवनैर्भूतभावनैः ॥१२ लवणेन समुद्रेण सर्वतः परिवारितः । जंबूद्वीपस्य विस्तारात् समेन तु समंततः ॥१३ प्रागायताः सुपर्वाणः षडिमे वर्षपर्वताः । अवगाढा ह्युभयतः समुद्रौ पूर्वपश्चिमौ ॥१४
जो प्रकृतियों से परे हैं वही चिन्तन न करने के योग्य नहीं है—ऐसा कहते हैं। नौ वर्षों से समन्वित जम्बू द्वीप को यथार्थ रूप से बतलाऊँगा ।८। उसको विस्तार से और मण्डल से योजनों के द्वारा समझ लीजिए । योजनाग्र से सभी ओर एक सौ सहस्र है। यह अनेक जनपदों से घिरा हुआ है और विविध परम शुभ नगरों से समन्वित है । यह सिद्धगण और चारणों से समाकीर्ण है और अनेक पर्वतों से उपशोभित है ।६-१०। शिलाओं के समुदायों से समुत्पन्न समस्त धातुओं से निबद्ध यह द्वीप है । इसके सभी ओर अनेक नदियाँ हैं जो पर्वत से उद्भूत हुई हैं ।११। यह जम्बूद्वीप बहुत विशाल है । श्री सम्पन्न है तथा इसका मण्डल भी महान् है । भूतों के करने वाले नौ भुवनों से यह सम्पूर्ण समावृत है ।१२। इसके चारों ओर क्षार समुद्र है जिसका भी विस्तार जम्बू द्वीप के विस्तार के ही समान है ।१३। प्रागायत सुपर्वा ये छै वर्ष पर्वत हैं जो दोनों ओर पूर्व और पश्चिम समुद्रों से अवगाढ हैं ।१४।
हिमप्रायश्च हिमवान् हेमकूटश्च हेमवान् । सर्वत्तुषु सुखश्चापि निषधः पर्वतो महान् ॥१५ चतुर्वर्णश्च सौवर्णो मेरुश्चारुतमः स्मृतः ।