भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृथ्वी व्यायाम विस्तारः ] [ ८१

पर्यायं परिमाणं च गति चन्द्रार्कयोस्तथा । एतत्प्रब्रूहि नः सर्वं विस्तरेण यथार्थतः ॥३ सूत उवाच—हंत वोऽहं प्रवक्ष्यामि पृथिव्यायामविस्तरम् ॥४ संख्यां चैव समुद्राणां द्वीपानां चैव विस्तरम् । द्वीपभेदसहस्राणि सप्तस्वन्तर्गतानि च ॥५ न शक्यंते क्रमेणेह वक्तुं यैः सततं जगत् । सप्त द्वीपान्प्रवक्ष्यामि चन्द्रादित्यग्रहैः सहः ॥६ तेषां मनुष्यास्तर्केण प्रमाणानि प्रचक्षते । अचिंत्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण साधयेत् ॥७

श्री सूतजी ने कहा—इस रीति से शांशपायनि ने प्रजा के सन्निवेश का श्रवण करके फिर उसने श्री सूतजी ने नियत रूप से पृथिवी और उदधि के विस्तार के विषय में पूछा था ।१। द्वीप कितने हैं, समुद्र अथवा पर्वत कितने बताये गये हैं ? कितने वर्ष हैं और उन वर्षों में नदियों कौन-कौन बतायी गयी हैं ? ।२। महाभूतों का क्या प्रमाण है तथा लोकालोक प्रमाण क्या है ? चन्द्र और सूर्य का पर्याय-परिमाण और गति क्या हैं ? हे भगवान् ! यह सब आप विस्तार पूर्वक यथार्थ रूप से हमको बतलाइए ।३। श्री सूतजी ने कहा—हर्ष की बात है, मैं आपके सामने पृथ्वी का आयाम और विस्तार बतलाऊँगा ।४। समुद्रों की संख्या और द्वीपों का विस्तार भी बतलाऊँगा । यों तो द्वीपों के सहस्रों भेद होते हैं किन्तु वे भेद सात द्वीपों के सहस्रों भेद होते हैं किन्तु वे सभी भेद सात द्वीपो के ही अन्तर्गत है ।५। जिनके द्वारा निरन्तर यह जगत है वे सब क्रम से यहाँ पर नहीं बताये जा सकते हैं । मैं इस समय में तो आपके समक्ष में सात द्वीपो को ही बताऊँगा और उनके साथ चन्द्र-सूर्य और ग्रहों का वर्णन करूंगा ।६। मानव उनका प्रमाण तर्क के द्वारा कहा करते हैं । किन्तु निश्चित रूप से जो भाव चिन्तन करने के योग्य नहीं हैं उनका तर्क के सहारे साधन कभी नहीं करना चाहिए ।७।

प्रकृतिभ्यः परं यच्च तदचिन्त्यं प्रचक्षते । नववर्षं प्रवक्ष्यामि जंबूद्वीपं यथातथम् ॥८