संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 76, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ें८० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
कल्पस्यादौ सुबहुला यस्मात्संस्थाश्चतुर्दश ।
कल्पयामास वै ब्रह्मा तस्मात्कल्पो निरुच्यते ॥७४
स सृष्टा सर्वभूतानां कल्पादिषु पुनः पुनः ।
व्यक्ताव्यक्तो महादेवस्यस्य सर्वमिदं जगत् ॥७५
इत्येष प्रतिसंबन्धः कीर्तितः कल्पयोर्द्वयोः ।
सांप्रतं हि तयोर्मध्ये प्रागवस्था बभूव ह ॥७६
कीर्तितस्तु समासेन पूर्वकल्पे यथातथम् ।
सांप्रतं संप्रवक्ष्यामि कल्पमेतं निबोधतः ॥७७
गति के अर्थ वाली ऋषिति धातु नाम की निष्पत्ति होती है—ऐसा कहा जाता है। जिससे ऋषिति के सत्व होने से उससे महत् है अतएव महर्षि होते हैं ॥७१॥ अहर्लोक में स्थित होते हुए उन्होंने उस समय में सोये हुए काल को देखा था। जो कल्प के व्यतीत होने पर सत्त्वादि सात महर्षि थे ॥७२॥ इस प्रकार से उन-उन सहस्रों रजनियों में उस समय में आनीत महर्षियों ने सुप्तकाल को देखा था ॥७३॥ कल्प के आदि में जिससे सुबहुल चौदह संस्था हैं। ब्रह्माजी ने क्योंकि कल्पन किया था इसी कारण से कल्प कहा जाता है ॥७४॥ कल्पों के आदि काल में पुनः पुनः वही समस्त भूतों का सृजन करने वाला है। महादेव व्यक्त है। इसका ही यह सम्पूर्ण जगत है ॥७५॥ वह दोनों कल्पों का प्रति सम्बन्ध कर दिया गया है। इस समय में उन दोनों के मध्य में पूर्व की अवस्था हुई थी ॥७६॥ पूर्व में होने वाले कल्प में ठीक-ठीक कह दिया गया है। इस समय में इस कल्प के विषय में बतलाऊँगा, उसको समझ लीजिए ॥७७॥
— × —
॥ पृथ्वी व्यायाम विस्तारः ॥
सूत उवाच—एवं प्रजासन्निवेशं श्रुत्वा वै शांशपायनिः ।
पप्रच्छ नियतं सूतं पृथिव्युदधिविस्तरम् ॥१
कति द्वीपा समुद्रा वा पर्वता वा कति स्मृताः ।
कियंति चैव वर्षाणि तेषु नद्यश्च काः स्मृताः ॥२
महाभूतप्रमाणं च लोकालोकं तथैव च ।