संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
इन्द्रद्वीपः कशेरुमांस्ताम्रवर्णो गभस्तिमान् ।
नागद्वीपस्तथा सौम्यो गांधर्वस्त्वथ वारुणः ॥६
अयं तु नवमस्तेषां द्वीपः सागरसंवृतः ।
योजनानां सहस्रं तु द्वीपोऽयं दक्षिणोत्तरात् ॥१०
आयतो ह्याकुमार्य्या वै चागंगाप्रभवाच्च वै ।
तिर्य्यगुत्तरविस्तीर्णः सहस्राणि नवैव तु ॥११
द्वीपो ह्युपनिविष्टोऽयं म्लेच्छैरंतेषु सर्वशः ।
पूर्वे किराता ह्यस्यांते पश्चिमे यवनाः स्मृताः ॥१२
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या मध्ये शूद्राश्च भागशः ।
इज्ज्यायुधवाणिज्याभिर्वर्त्तयंतो व्यवस्थिताः ॥१३
तेषां संव्यवहारोऽत्र वर्त्तते वै परस्परम् ।
धर्मार्थकामसंयुक्तो वर्णानां तु स्वकर्मसु ॥१४
इस भारत वर्ष के नौ भेद हैं उनको आप लोग भली-भाँति समझ लीजिए ? वे सब समुद्र से अन्तरित हैं—ऐसे ही जान लेने चाहिए और परस्पर में वे सब अगम्य हैं अर्थात् अज्ञेय एवं गमन न करने के योग्य हैं ।८। उनके नाम ये हैं—इन्द्रद्वीप—कशेरुमान्—ताम्रवर्ण—गभस्तिमान्—नाग द्वीप—सौम्य—गन्धर्व—वारुण ।६। यह नौवाँ उन द्वीपों में है जो सागर से संवृत है । यह द्वीप दक्षिण-उत्तर से एक सहस्र योजन है ।१०। भागीरथी गङ्गा के उद्गम स्थान से कन्या कुमारी तक यह आयत है । नौ सहस्र योजन तिरछा उत्तर की ओर विस्तीर्ण है ।११। यह द्वीप अन्तों में सभी ओर म्लेच्छों द्वारा उपनिविष्ट है । इसके अन्त में पूर्व में किरात रहा करते हैं और पश्चिम में यवन लोग वाले बताये गये हैं ।१२। मध्य के भागों में ब्राह्मण—क्षत्रिय—वैश्य और शूद्र निवास करते हैं। जो यज्ञार्चन—शस्त्र—प्रयोग—वाणिज्य से अभिवर्त्तन करते हुए व्यवस्थित हैं ।१३। यहाँ पर इन चारों वर्णों में परस्पर में समीचीन व्यवहार रहा करता है । अपने वर्ण के अनुसार जो इनके अपने कर्म हैं उन्हीं में यह व्यवहार धर्म अर्थ और काम से समन्वित होता है ।१४।