भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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भारतदेश ] [ ८६

एतद्वेदितुमिच्छामस्तन्नो निगद सत्तम ।
एतच्छ्रुतवचस्तेषामब्रवीद्रोमहर्षणः ॥३
अत्र वो वर्णयिष्यामि वर्षेऽस्मिन् भारते प्रजाः ।
इद तु मध्यमं चित्रं शुभाशुभफलोदयम् ॥४
उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमवद्दक्षिणं च यत् ।
वर्षं तद्भारतं नाम यत्रेयं भारती प्रजा ॥५
भरणाच्च प्रजानां वै मनुर्भरत उच्यते ।
निरुक्तवचनाच्चैवं वर्षं तद्भारतं स्मृतम् ॥६
इतः स्वर्गश्च मोक्षश्च मध्यश्चांतश्च गम्यते ।
न खल्वन्यत्र मर्त्यानां भूमौ कर्म विधीयते ॥७

श्रीसूतजी ने कहा—इस प्रकार से ही परम शुभ भारत में वर्षों का निसर्ग है जो कि परम तत्वों के ज्ञाताओं के द्वारा देखा गया है । अब फिर आपके सामने मैं क्या वर्णन करूं ? ।१। ऋषि ने कहा—जो यह भारतवर्ष है जिसमें ये चौदह स्वायम्भुव आदि मनुगण फिर प्रजा के सृजन करने में थे ।२। हे श्रेष्ठ पुरुषों में परमोत्तम ! हम लोग यही जानने की इच्छा करते हैं । वही आप हमारे समक्ष में वर्णन कीजिए । रोम हर्षणजी ने उन ऋषियों के इस वचन का श्रवण करके कहा था ।३। यहाँ पर इस भारतवर्ष में आप लोगों के सामने जो प्रजा हुई थी उनका मैं वर्णन करूँगा । यह तो मध्यम चित्र है जो शुभ और अशुभ फलों के उदय वाला है ।४। समुद्र के उत्तर में और हिमवान् के दक्षिण में है वह भारत नाम वाला वर्ष है जहाँ पर यह भारत की प्रजा है ।५। प्रजाओं के भरण करने से भरत मनु कहा जाया करते हैं । इसी निरुक्ति के वचन से यह वर्ष भारत—इस नाम से कहे गया है । यहाँ से स्वर्ग होता है और यहाँ से ही बारम्बार जीवन-मरण के आवागमन से मुक्त हुआ करता है और मध्य तथा अन्त का ज्ञान मनुष्यों का कर्म करने का क्षेत्र नहीं है अर्थात् कर्म करने की भूमि यही देश है ।६-७।

भारतस्यास्य वर्षस्य नव भेदान्निबोधत ।
समुद्रांतरिता ज्ञेयास्ते त्वगम्याः परस्परम् ॥८