संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
आयामतश्चतुस्त्रिंशत्सहस्राणि प्रमाणतः । तत्र ते शुभकर्माणः केतुमालाः प्रतिष्ठिताः ॥५३ तत्र काला नराः सर्वे महासत्त्वा महाबलाः । स्त्रियश्चोत्पलपत्राभाः सर्वास्ताः प्रियदर्शनाः ॥५४ तत्र दिव्यो महावृक्षः पनसः षड्रसाश्रयः । ईश्वरो ब्रह्मणः पुत्रः कामचारी मनोजवः ॥५५ तस्य पीत्वा फलरसं जीवंति च समायुतम् । पार्श्वे माल्यवतश्चापि पूर्वेऽपूर्वा तु गंडिका ॥५६
जिसके चार देश हैं जो चारों पाश्र्वों में समधिष्ठित हैं। जिनके नाम भद्राश्व—भरत—केतुपाल और पश्चिम है ।५०। उत्तर और कुरु कृतपुण्य प्रतिश्रय हैं। गन्धमादन के पार्श्व में तो यह पर अपर गण्डिका है ।५१। ये सभी ऋतुओं में परम रमणीय हैं और नित्य ही प्रमुदित तथा शिव हैं। पूर्व और पश्चिम से बत्तीस सहस्र योजनों से युक्त हैं ।५२। प्रमाण से इनका आयाम चौंतीस सहस्र योजनों वाला है। वहाँ पर वे परम शुभ कर्मों वाले कैतुमाल देश प्रतिष्ठित है ।५३। वहाँ पर जब नर काल हैं जो महान् सत्व वाले और महान् बल से सम्पन्न हैं और वहाँ की स्त्रियाँ कमलदल की आभा वाली तथा देखने में बहुत प्रिय लगती हैं ।५४। वहाँ पर एक बहुत ही उत्तम पनस का महान् वृक्ष है जिसमें छैरस विद्यमान रहा करते हैं। उसकी स्वामी ब्रह्मा का पुत्र कामना से चरण करने वाले मनोजव हैं ।५५। वहाँ पर समायुत काल पर्यन्त उसके फलों का रस का पान करके प्राणी जीवित रहा करते हैं। पूर्व में माल्यवान् के पार्श्व में एक अपूर्व गण्डिका है ।५६।
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॥ भारतदेश ॥
सूत उवाच—एवमेव निसर्गो वै वर्षाणां भारते शुभे । दृष्टः परमतत्त्वज्ञैर्भूय किं वर्णयामि वः ॥१ ऋषिरुवाच—यदिदं भारतं वर्षं यस्मिन्स्वायंभुवादयः । चतुर्दशैते मनवः प्रसासर्गेऽभवन्पुनः ॥२