संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपृथ्वी व्यायाम विस्तारः ] [ ८७
चत्वारिंशत्सहस्राणि योजनानां समंततः ॥४५ अष्टाभिरधिकानि स्युस्त्र्यस्रे मानं प्रकीर्त्तितम् । चतुरस्रेण मानेन परिणाहः समंततः ॥४६ चतुःषष्टिसहस्राणि योजनानां विधीयते । स पर्वतो महादिव्यो दिव्योषधिसमन्वितः ॥४७ भुवनैरावृतः सर्वो जातरूपमयैः शुभैः । तत्र देवगणाः सर्वे गंधर्वोरगराक्षसाः ॥४८ शैलराजे प्रदृश्यंते शुभाश्चाप्सरसां गणाः । स तु मेरुः परिवृतो भुवनैर्भूतभावनैः ॥४९
वह चौरासी सहस्र योजन ऊँचा है । एक योजन चार कोस का होता है । सोलह योजन नीचे की ओर प्रविष्ट है और सोलह ही योजन विस्तार वाला है ।४३। शराव संस्थित होने से बत्तीस योजन मूर्धा में विस्तृत है । विस्तार में सभी ओर उसका तिगुना परिणाम है ।४४। मण्डल प्रमाण से उसका मान त्र्यस्र अभीष्ट होता है । सब ओर चौवालीस सहस्र योजन है ।४५। त्र्यस्र में अर्थात् तीनों ओर में उसका मान आठ अधिक योजन कहा गया है । सभी ओर चतुरस्र मान से परिणाम होता है ।४६। चौंसठ सहस्र योजन कहा जाता है । वह पर्वत बहुत ही अधिक दिव्य है और दिव्य औषधियों से समन्वित है ।४७। यह सम्पूर्ण सुवर्णमय परम शुभ भुवनों से घिरा हुआ है । वहाँ पर समस्त देवों के गण—गन्धर्व—और राक्षस निवास किया करते हैं ।४८। उस शैलों के राजा के ऊपर शुभ अप्सराओं के समुदाय भी दिखलाई दिया करते हैं । वह मेरु पर्वत भूतों के भावन भुवनों से परिवृत रहा करता है ।४९।
चत्वारो यस्य देशा वै चतुः पार्श्वेष्वधिष्ठिताः । भद्राश्वा भारताश्चैव केतुमालाश्च पश्चिमाः ॥५० उत्तराः कुरवश्चैव कृतपुण्यप्रतिश्रयाः । गंधमादनपार्श्वे तु परेषाऽपरगंडिका ॥५१ सर्वर्तु रमणीया च नित्यं प्रमुदिता शिवा । द्वात्रिंशत्तु सहस्राणि योजनैः पूर्वपश्चिमात् ॥५२