भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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भारतवर्ष ] [ ६१

संकल्पः पंचमानां च ह्याश्रमाणां यथाविधि । इह स्वर्गापवर्गार्थं प्रवृत्तिर्येषु मानुषी ॥१५ यस्त्वयं नवमो द्वीपस्तिर्यगायाम उच्यते । कृत्स्नं जयति यो ह्येनं सम्राडित्यभिधीयते ॥१६ अयं लोकस्तु वै सम्राडंतरिक्षं विराट् स्मृतम् । स्वराडसौ स्मृतो लोकः पुनर्वक्ष्यामि विस्तरात् ॥१७ सप्तैवास्मिन्सुपर्वाणो विश्रुताः कुलपर्वताः । तेषां सहस्रशश्चान्ये पर्वतास्तु समीपगाः ॥१८ अविज्ञाताः सारवंतो विपुलाश्चित्रसानवः । मंदरः पर्वतश्रेष्ठो वैहारो दुर्दु रस्तथा ॥२० कोलाहलः ससुरसो मैनाको वैद्युतस्तथा । वातंधमो नागगिरिस्तथा पाण्डुरपर्वतः ॥२१

पंचमान इस आश्रमों के सङ्कल्प विधि के ही अनुसार होता है । वहाँ पर जिनमें स्वर्ग प्राप्ति और मोक्ष के लिये मानुषी प्रवृत्ति रहा करती है । ।१५। जो यह नवम द्वीप है वह तिर्यग् आयाम वाला कहा जाता है । इस सम्पूर्ण द्वीप पर अपने बल-विक्रम के द्वारा विजय प्राप्त कर लेता है वह यहाँ का सम्राद् चक्रवर्ती राजा के नाम से कहा जाया करता है ।१६। यह लोक तो सम्राट है और अन्तरिक्ष विराट् कहा गया है । यह लोक स्वराट् कहा गया है । मैं फिर विस्तार के साथ बतलाऊँगा ।१७। इस द्वीप में सुपर्व सात ही कुल पर्वत प्रसिद्ध हैं । महेन्द्र—मलय—सह्य—शुक्तिमान—ऋक्ष पर्वत—विन्ध्य और पारियात्र ये ही सात कुल पर्वत है । इनके समीप में रहने वाले अन्य भी सहस्रों पर्वत हैं ।१८-१९। बहुत से पर्वतों का ज्ञान ही नहीं है और वे सार सम्पन्न तथा विचित्र शिखरों वाले हैं । पर्वतों में परम श्रेष्ठ मन्दर—वैहार—दुर्दु र—कोलाहल—समुरस—मैनाक—वैद्युत—वातंधम—नागगिरि और पाण्डुर पर्वत हैं ।२०-२१।

तुंगप्रस्थः कृष्णगिरिर्गोधनो गिरिरेव च । पुष्पगिर्युज्जयंतौ च शैलो रैवतकस्तथा ॥२२ श्रीपर्वतश्चित्रकूटः कूटशैलो गिरिस्तथा ।

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