भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

युग संख्यावर्तं

ऋषिरुवाच-चतुर्युगानि यान्यासन्पूर्वं स्वायंभुवेऽन्तरे । तेषां निसर्गं तत्त्वं च श्रोतुमिच्छामि विस्तरात् ॥१॥ सूत उवाच-पृथिव्यादिप्रसंगेन यन्मया प्रागुदीरितम् । तेषां चतुर्युगं ह्येतत्तद्वक्ष्यामि निबोधत ॥२ संख्ययेह प्रसंख्याय विस्तराच्चैव सर्वशः । युगं च युगभेदश्च युगधर्मस्तथैव च ॥३ युगसंख्यांशकश्चैव युगसंधानमेव च । षट्प्रकाशयुगाख्यैषा तां प्रवक्ष्यामि तत्वतः ॥४ लौकिकेन प्रमाणेन निष्पाद्याब्दं तु मानुषम् । तेनाब्देन प्रसंख्याये वक्ष्यामीह चतुर्युगम् । निमेषकालतुल्यं हि विद्याल्लध्वक्षरं च यत् ॥५ काष्ठा निमेषा दश पंच चैव त्रिंशच्च काष्ठा गणयेत्कलां तु । त्रिंशत्कलाश्चापि भवेन्मुहूर्तंस्तैस्त्रिंशता रात्र्यहनी समेते ॥६ अहोरात्रौ विभजते सूर्यो मानुषलौकिको ॥७

ऋषि ने कहा—जो चार युग हैं और पूर्व में स्वायम्भुव मन्वन्तर में थे। हे भगवन् ! उनका निसर्ग कैसे हुआ और उनका क्या तत्व है—यह मैं विस्तार के साथ श्रवण करना चाहता हूँ ।१। श्रीसूत जी ने कहा—पृथिवी आदि के प्रसंग से जो मैंने पूर्व में कहा था उनके चारों युगों के विषय में मैं अब बतलाऊँगा । उसको आप भली-भाँति समझ लीजिए ।२। यहाँ पर संख्या के द्वारा प्रसंख्यान करके और सब प्रकार से विस्तृत मैं कहूँगा । युग-युग का भेद-युग का धर्म-युग सन्धि का अंश-युग सन्धान-यह षट् प्रकाश युग की आख्या है । उन सबको मैं तात्विक रूप से आपको बतलाऊँगा ।३-४। लौकिक प्रमाण मनुष्य के वर्ष का निष्पादन करके उसी शब्द से प्रसंख्यान करके यहाँ पर मैं चारों युगों को बतलाऊँगा । निमेष काल उसे ही जानना चाहिए जो कि लघु अक्षर के तुल्य होता है ।५। पन्द्रहनिमेषों का जितना काल होता है उसकी एक काष्ठा होती है और तीस काष्ठाओं के समय को